श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1951, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/171-181 ] अनुवाद—रात्रिके समय उठकर जब महाप्रभु जाने लगे, तब श्रीतपन मिश्र, श्रीरघुनाथ भट्ट, महाराष्ट्र ब्राह्मण, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और कीर्तनीया परमानन्द—ये पाँच भक्त भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ 171-172 ॥ सभीकी ही महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरी जानेकी इच्छा होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा उन्हें विदायी देना :— सबे चाहे प्रभु-सङ्गे नीलाचल याइते। सबारे विदाय दिला प्रभु यत्न-सहिते ॥ 173 ॥ अकेले झारिखण्डके मार्गसे पुरी जानेकी इच्छा :— "याँर इच्छा, पाछे आइस आमारे देखिते। एबे आमि एका यामु झारिखण्ड-पथे॥" 174 ॥ अनुवाद—सभी महाप्रभुके साथ नीलाचल जाना चाहते थे, किन्तु महाप्रभुने बड़े प्रेमसे उन्हें समझाकर विदायी देते हुए कहा, —"जिनकी इच्छा हो, वे बादमें मुझसे मिलनेके लिये पुरी आ जाँय। अभी तो मैं अकेला ही झारिखण्डके पथसे जाऊँगा॥" 173-174 ॥ श्रीसनातनको वृन्दावनमें श्रीरूप-अनुपमके पास भेजना :— सनातने कहिला, —"तुमि याह' वृन्दावन। तोमार दुइ भाइ तथा करियाछे गमन ॥ 175 ॥ करुणासे विगलित स्वरसे भक्तवत्सल भगवान्का अपने वृन्दावन-यात्री भक्तोंके सुख-विधानके लिये श्रीसनातनको आदेश :— काँथा-करङ्गिया मोर काङ्गाल भक्तगण। वृन्दावने आइले ताँदेर करिह पालन॥" 176 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा, — "तुम वृन्दावन जाओ। तुम्हारे दोनों भाई रूप और अनुपम भी वहीं गये हैं। वृन्दावन जानेवाले मेरे अधिकांश भक्त कंगाल (गरीब) होते हैं, उनके पास तो केवल काँथा (फटे-पुराने कपड़ोंसे बने कम्बल) और करोंया (जलके पात्र) होता है। वे जब वृन्दावन आयेंगे, तब तुम उन सबको रहनेका स्थान देना और उनका पालन करना॥" 175-176 ॥ सभीको आलिङ्गन करके निरपेक्ष महाप्रभुकी यात्रा, भक्तोंका मूर्च्छित होना :— एत बलि' चलिला प्रभु सबा आलिङ्गिया। सबेइ पड़िला तथा मूर्च्छित हञा ॥ 177 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु सबका आलिङ्गन करके वहाँसे चल पड़े। सभी भक्त मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 177 ॥ इन पाँच भक्तोंका काशीमें आगमन, श्रीसनातनकी वृन्दावन यात्रा :— कतक्षणे उठि' सबे दुःखे घरे आइला। सनातन-गोसाञि वृन्दावनरे चलिला ॥ 178 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बाद जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे सभी भक्त दुःखी होकर घर लौट आये। श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनकी ओर चल दिये॥ 178 ॥ श्रीरूप-गोस्वामीके साथ श्रीसुबुद्धि रायका मिलन :— एथा रूप-गोसाञि यबे मथुरा आइला। ध्रुवघाटे ताँरे सुबुद्धिराय मिलिला ॥ 179 ॥ अनुवाद—इधर जब श्रीरूप गोस्वामी मथुरा पहुँचे, तब वहाँ ध्रुवघाटपर उन्हें श्रीसुबुद्धिराय मिले॥ 179 ॥ पूर्वे यबे सुबुद्धि-राय छिला गौड़े 'अधिकारी'। हुसेन-खाँ 'सैयद' करे ताहार चाकरी ॥ 180 ॥ अनुवाद—पहले जब श्रीसुबुद्धिराय गौड़देशके अधिकारी थे, तब हुसेन-खाँ 'सैयद' उनका दास था॥ 180 ॥ दीघि खोदाइते तारे 'मुन्सीफ' कैला। छिद्र पाञा राय तारे चाबुक मारिला ॥ 181 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धिरायने हुसेन-खाँ सैयदको तालाब खुदवानेके कार्यका दायित्व सौंपा। उस कार्यमें कुछ त्रुटि देखनेपर श्रीसुबुद्धिरायने उसे चाबुकसे मारा॥ 181 ॥ । 505