भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1952, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1952

[ 25/181-189 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुन्सीफ'-'इन्साफ' शब्दसे 'मुन्सीफ' शब्दकी उत्पत्ति हुई है; जो जिस विषयको समझ लेता है, उसे 'मुन्सीफ' कहते हैं। 'छिद्र पाञा'-दोष देखकर॥ 181॥ पाछे यबे हुसेन-खाँ गौड़े 'राजा' हइल। सुबुद्धि-रायेर तिँहो बहु बाड़ाइल ॥ 182 ॥ अनुवाद-बादमें जब हुसेन-खाँ सैयद गौड़देशका 'राजा' बना, तब उसने श्रीसुबुद्धिरायके द्वारा पूर्व किये गये उपकारोंके लिये उनकी सम्पत्तिमें बहुत वृद्धि की॥ 182॥ तार स्त्री तार अङ्गे देखे मारणेर चिह्ने। सुबुद्धि-रायरे मारिते कहे राजा-स्थाने ॥ 183 ॥ अनुवाद-हुसेन-खाँकी पत्नीने जब उनके शरीरपर चाबुक मारनेके निशानको देखा, तो उसने हुसेन-खाँसे श्रीसुबुद्धिरायको जानसे मारनेके लिये कहा॥ 183॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तार स्त्री'-हुसेन-शाहकी बेगम; 'मारणेर चिह्ने'-श्रीसुबुद्धि-रायने जो चाबुक मारे थे, उसके चिह्न॥ 183॥ राजा कहे, - "आमार पोष्टा राय हय 'पिता'। ताहारे मारिमु आमि, - भाल নহে कथा॥" 184॥ स्त्री कहे, - जाति लह', यदि प्राणे ना मारिबे। राजा कहे,-जाति निले इँहो नाहि जीवे॥ 185॥ स्त्री मरिते चाहे, राजा सङ्कटे पड़िल। करौँ यार पानि तार मुखे देओयाइल ॥ 186 ॥ अनुवाद-राजा हुसेन-खाँने कहा,-"श्रीसुबुद्धिराय मेरा पालन-पोषण करनेवाले होनेके कारण मेरे पिताके समान है। मैं उन्हें मारूँ,-यह तो कोई अच्छी बात नहीं है।" अन्तमें बेगमने कहा, - 'यदि तुम सुबुद्धिरायको प्राणोंसे नहीं मारना चाहते हो, तो फिर तुम उसे जातिसे भ्रष्ट कर दो।' राजाने कहा, - 'यदि मैं उनको जातिसे भ्रष्ट कर दूँगा, तो वे जीवित नहीं रहेंगे।' बेगमने कहा कि यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो मैं मर जाऊँगी। उसकी बात सुनकर राजा धर्म-सङ्कटमें फँस गया। अन्तमें उसने जलपात्रके जलको जिसे मुसलमानने स्पर्श किया था, श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें बलपूर्वक डलवा दिया॥ 184-186॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'करौँ यार पानि'-जिस पात्रमें मुसलमानोंका जल रहता है, उसे 'करौँया' कहते हैं। उस 'करौँया'से मुसलमानके द्वारा स्पर्श किया गया जल श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें दिया गया था॥ 186॥ श्रीसुबुद्धि-रायका अकेले काशीमें आगमन :- तबे सुबुद्धि-राय सेइ 'छद्म' पाञा। वाराणसी आइला, सब विषय छाड़िया॥ 187॥ अनुवाद-तब श्रीसुबुद्धि-राय इस सुयोगको प्राप्त करके सब विषयोंको छोड़कर वाराणसी आ गये॥ 187॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छद्म'-छल। श्रीसुबुद्धिरायकी पहलेसे ही विषय-त्यागकी इच्छा थी; जातिनाशके छलसे उन्होंने परिवारादि सम्बन्धियोंका त्याग कर दिया॥ 187॥ स्मार्त्त पण्डितोंसे प्रायश्चितके विषयमें पूछनेपर अनेक लोगोंके द्वारा अनेक विधान :- प्रायश्चित्त पुछिला तिँहो पण्डितेर गणे। ताँरा कहे, - तप्त-घृत खाञा छाड़' प्राणे॥ 188॥ अनुवाद-श्रीसुबुद्धिरायने वाराणसीके पण्डितोंसे इसका प्रायश्चित पूछा। तब उन पण्डितोंने कहा, - गर्म घी पीकर तुम अपने प्राण त्याग दो॥ 188॥ श्रीसुबुद्धि-रायको प्रायश्चितकी व्यवस्थाओंके प्रति सन्देह :- केह कहे, - एइ নহে, अल्प दोष हय। शुनिया रहिला राय करिया संशय ॥ 189 ॥ 506 ।