श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1945, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/138-142 ] श्लोक-भावानुवाद—समस्त निगम-इतिहाससे उनके सार अर्थात् सर्वोत्कृष्ट भाग-स्वरूप श्रीमद्भागवतका अपने पुत्र श्रीशुकदेवको अध्ययन कराया था, इसका श्लोकके प्रथम चरणके साथ अन्वय करें ॥ 138 ॥ “ब्रह्मसूत्रका अर्थ” :- श्रीमद्भागवत (12/13/15) में— सर्ववेदान्तसारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥ 139 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतको वेदान्तका सार कहा जाता है, भागवतके रसामृतसे तृप्त व्यक्तिकी अन्य किसी शास्त्रमें रति नहीं होती ॥ 139 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत शौनकादि ऋषियोंसे श्रीमद्भागवतका वर्णन समाप्त करके अठारह महापुराणोंके श्लोकोंकी संख्याका निर्देश करके उपसंहारमें श्रीमद्भागवतकी महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— सर्ववेदान्तसारं (सकलोपनिषद्ब्रह्मसूत्राणाम् उत्कृष्टभागः) हि श्रीभागवतम् इष्यते (अभिधीयते) यतः तद्रसामृत-तृप्तस्य (तस्य भागवतस्य रस एव अमृतं तेन तृप्तस्य जनस्य) अन्यत्र (शास्त्रादौ भागवतेतर-जनादिषु वा) क्वचित् (कदाचिदपि) रतिः न स्यात् (न सम्भवेत्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139 ॥ “गायत्री-भाष्यरूप” :- गायत्रीर अर्थे एइ ग्रन्थ-आरम्भन। “सत्यं परं”—सम्बन्ध, “धीमहि”—साधने प्रयोजन ॥ 140 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 140 ॥ अनुभाष्य—इस श्रीमद्भागवत ग्रन्थके प्रारम्भिक श्लोकमें ही गायत्रीका अर्थ है। परम सत्य ही 'सम्बन्ध', ध्यानचेष्टा अथवा साधनभक्तिका अनुष्ठान ही 'अभिधेय' और प्राप्त-फल ध्यान अथवा प्रेमभक्ति ही अभिधेयका प्राप्य 'प्रयोजन' फल है ॥ 140 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/1-2)— जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 141 ॥ अनुवाद—इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि—सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य-तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 141 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/265 संख्या देखें ॥ 141 ॥ धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवापरैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ 142 ॥ अनुवाद—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों)के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और । 499