भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1955

पचीसवाँ अध्याय 25/204-211 ] मथुरामें रायके साथ मिलन और रूप-अनुपमके वृत्तान्तका श्रवण :- मथुराते सुबुद्धिराय ताहारे मिलिला। रूप-अनुपम-कथा सकलि कहिला ॥ 204 ॥ अनुवाद—मथुरामें जब श्रीसनातन गोस्वामीकी श्रीसुबुद्धिरायसे भेंट हुई, तब श्रीसुबुद्धिरायने उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीअनुपमके विषयमें बतलाया॥ 204 ॥ तीनों भाइयोंके नहीं मिलनेका कारण :- गङ्गापथे दुइभाइ, राजपथे सनातन। अतएव ताँहा सने ना हैल मिलन ॥ 205 ॥ अनुवाद—(श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम) ये दोनों भाई तो गङ्गाके तटवाले मार्गसे मथुरासे प्रयाग गये और श्रीसनातन गोस्वामी राजमार्गसे प्रयागसे मथुरा आये, इसलिये उनकी आपसमें भेंट नहीं हुई ॥ 205 ॥ श्रीसनातनके प्रति रायका पूर्व-आश्रमोचित व्यवहार, श्रीसनातनकी उसके प्रति अप्रीति अथवा उदासीनता :- सुबुद्धि-राय बहु स्नेह करे सनातने। व्यवहार-स्नेह सनातन नाहि माने ॥ 206 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धि राय श्रीसनातन गोस्वामीसे बहुत स्नेह करते थे, किन्तु श्रीसनातन गोस्वामीको वैसा सांसारिक-स्नेह अच्छा नहीं लगा ॥ 206 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'व्यवहार-स्नेह'—संसार-सम्बन्धी स्नेह ॥ 206 ॥ श्रीकृष्णको ढूँढ़नेवाले महावैरागी श्रीसनातन प्रभु :- महा-विरक्त सनातन भ्रमेन वने वने। प्रतिवृक्षे, प्रतिकुञ्जे रहे रात्रि-दिने ॥ 207 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी परम विरक्त थे। वे श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए वन-वनमें भ्रमण करते थे। वे एक-एक वृक्ष और एक-एक कुञ्जमें एक रात और एक दिन रहते थे ॥ 207 ॥ श्रीसनातनके द्वारा साम्प्रदायिक आचार्य-कार्यका सम्पादन :- मथुरा-माहात्म्य-शास्त्र संग्रह करिया। लुप्ततीर्थ प्रकट कैला वनेते भ्रमि या ॥ 208 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने मथुराके माहात्म्यका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका संग्रह किया। उन ग्रन्थोंके आधारपर उन्होंने वन-वनमें भ्रमण करके लुप्ततीर्थोंका उद्धार किया ॥ 208 ॥ श्रीसनातनका वृन्दावनमें और श्रीरूप और श्रीअनुपमका काशीमें अवस्थान :- एइमत सनातन वृन्दावनेते रहिला। रूप-गोसाञि दुइभाइ काशीते आइला ॥ 209 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनमें रह गये और श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई काशीमें पहुँच गये ॥ 209 ॥ काशीमें तीन भक्तोंके साथ उनका मिलन :- महाराष्ट्र तिनजन सह रूप करिला मिलन ॥ 210 ॥ अनुवाद—वहाँ श्रीरूप गोस्वामीने महाराष्ट्र श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र—इन तीनोंसे भेंट की॥ 210 ॥ छोटे भाईके साथ श्रीरूपका भी श्रीशेखरके गृहमें रहना और श्रीतपनमिश्रके घर भिक्षा :- शेखरेर घरे वासा, मिश्र-घरे भिक्षा। मिश्रमुखे सुने, सनातने प्रभुर 'शिक्षा' ॥ 211 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी श्रीअनुपमके साथ श्रीचन्द्रशेखरके घरपर रहे और वे भिक्षा (भोजन) श्रीतपनमिश्रके घरपर ग्रहण करते। इस प्रकार उन्होंने श्रीतपनमिश्रके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीको दी गयी 'शिक्षा'को श्रवण किया ॥ 211 ॥ । 509