भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1954, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1954

[ 25/194-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके श्रीसुबुद्धिराय वृन्दावनकी ओर चल दिये। वे प्रयाग और अयोध्यासे होते हुए नैमिषारण्य आ पहुँचे ॥ 194 ॥ इसी बीच महाप्रभुका वृन्दावनसे लौटकर पुनः प्रयागमें आगमन :- कतक दिवस राय नैमिषारण्ये रहिला। प्रभु वृन्दावन हैते प्रयाग आइला ॥ 195 ॥ अनुवाद—कुछ दिनों तक श्रीसुबुद्धिराय नैमिषारण्यमें ही रहे। इसी बीच महाप्रभु वृन्दावनमें कुछ समय रहकर वहाँसे प्रयाग चले गये ॥ 195 ॥ मथुरामें महाप्रभुका दर्शन नहीं पाकर श्रीरायको दुःख :- मथुरा आसिया राय प्रभुवार्त्ता पाइल। प्रभुर लाग् ना पाञा मने बड़ दुःख हैल ॥ 196 ॥ अनुवाद—मथुरामें आकर श्रीसुबुद्धिरायको महाप्रभुकी यात्राका संवाद मिला। मथुरामें महाप्रभुके दर्शन नहीं होनेसे उनको मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 196 ॥ रायका वैराग्य और दैन्य-आचरण :- शुष्ककाष्ठ आनि' राय बेचे मथुराते। पाँच छय पयसा हय एक एक बोझाते ॥ 197 ॥ आपने रहे एक पयसार चाना चाबाञा। आर पयसा बाणिया-स्थाने राखेन धरिया ॥ 198 ॥ दुःखी वैष्णव देखि' ताँरे करान भोजन। गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल-मर्द्दन ॥ 199 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धिराय जङ्गलमें सूखी लकड़ियाँ एकत्रित करके लाकर मथुरामें बेचने लगे। एक गट्ठर लकड़ी बेचनेपर उन्हें पाँच-छः पैसे मिल जाते थे। श्रीसुबुद्धिराय स्वयं तो एक पैसेका चना खाकर जीवन यापन करते और बचे हुए पैसे वे बनियेके पास जमा कर देते। वे किसी दुःखी वैष्णवको देखकर उसे भोजन कराते थे। बङ्गालसे आये किसी भक्तको देखकर उसे दही, चावल तथा शरीरपर लगानेके लिये तेल ले देते ॥ 197-199 ॥ उन्हें लेकर श्रीरूपका वृन्दावनमें द्वादश वनोंके दर्शन कराना :- रूप-गोसाञि आसि' ताँरे बहु प्रीति कैला। आपनसङ्गे लञा 'द्वादश वन' देखाइला ॥ 200 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके वृन्दावन आनेपर श्रीसुबुद्धिरायने उनसे बहुत प्रीति की और उन्हें अपने साथ ले जाकर द्वादश वनोंका दर्शन कराया ॥ 200 ॥ श्रीरूपका श्रीसनातनको ढूँढ़नेके उद्देश्यसे वृन्दावनसे प्रयागमें आगमन :- मासमात्र रूपगोसाञि रहिला वृन्दावने। शीघ्र चलि' आइला सनातनानुसन्धाने ॥ 201 ॥ गङ्गातीर-पथे प्रभु प्रयागरे आइला। ताहा शुनि' दुइभाइ से पथे चलिला ॥ 202 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी केवल एक मास तक मथुरा और वृन्दावनमें रहे। वहाँसे श्रीसनातन गोस्वामीको ढूँढ़नेके लिये चल पड़े। जब उन्होंने सुना कि महाप्रभु गङ्गाके तटवाले मार्गसे प्रयाग गये थे, तब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई भी उसी मार्गपर चल दिये ॥ 201-202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ताहा शुनि'—रूप गोस्वामीने मथुरामें सुना कि पहले महाप्रभु गङ्गाके तटके मार्गसे मथुरा आये थे, अब उस मार्गको देखनेके उत्साहसे वे अनुपमके साथ उस मार्गसे आये ॥ 202 ॥ इसी बीच श्रीसनातनका प्रयागसे मथुरामें आगमन :- एथा सनातन गोसाञि प्रयागे आसिया। मथुरा आइला सनातन राजपथे दिया ॥ 203 ॥ अनुवाद—इधर श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसीसे चलकर प्रयाग आये। तब महाप्रभुके निर्देशानुसार वे प्रयागसे राजमार्गपर चलते हुए मथुरा आये ॥ 203 ॥ 508 |