श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1957, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/220-229 ] अनुवाद - श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती उनके गुरुके गुरु-भ्राता थे, इसलिये महाप्रभुने उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। उन दोनोंने महाप्रभुका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 220 ॥ दामोदर-स्वरूप, पण्डित गदाधर। जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द, वक्रेश्वर ॥ 221 ॥ काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, पण्डित-दामोदर। हरिदास ठाकुर, आर पण्डित-शङ्कर ॥ 222 ॥ भक्त और भगवान्के मिलनसे दोनोंमें ही प्रेमका आवेश :- आर सब भक्त प्रभुर चरणे पड़िला। सबा आलिङ्गिया प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ॥ 223 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप-दामोदर गोस्वामी, श्रीगदाधर-पण्डित, श्रीजगदानन्द-पण्डित, श्रीकाशीश्वर-पण्डित, श्रीगोविन्द, श्रीवक्रेश्वर-पण्डित, श्रीकाशी-मिश्र, श्रीप्रद्युम्न-मिश्र, श्रीदामोदर-पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीशङ्कर-पण्डित तथा अन्य सब भक्त महाप्रभुके श्रीचरणोंमें पड़ गये, उन सब भक्तोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 221-223 ॥ सभीको साथ लेकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- आनन्द-समुद्रे भासे सब भक्तगणे। सबा लञा चले प्रभु जगन्नाथ-दरशने ॥ 224 ॥ अनुवाद-सभी भक्त आनन्दके समुद्रमें डूब गये। महाप्रभु उन सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये चल पड़े ॥ 224 ॥ महाप्रभुका प्रेमावेश और नृत्यगीत :- जगन्नाथ देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हैला। भक्तसङ्गे बहुक्षण नृत्य-गीत कैला ॥ 225 ॥ अनुवाद - श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके महाप्रभु प्रेमाविष्ट हो गये। बहुत देर तक वे भक्तोंके साथ नृत्य और कीर्तन करते रहे ॥ 225 ॥ श्रीजगन्नाथकी प्रसादी-मालाकी प्राप्ति, पड़िछाओंके द्वारा प्रणाम :- जगन्नाथ-सेवक आनि' माला-प्रसाद दिला। तुलसी पड़िछा आसि' चरण वन्दिला ॥ 226 ॥ अनुवाद- श्रीजगन्नाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुको प्रसादी माला पहनायी। तुलसी-पड़िछाने आकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 226 ॥ चारों ओर महाप्रभुके आगमनके संवादका विस्तार, कटकसे श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके द्वारा आकर महाप्रभुका दर्शन :- 'महाप्रभु आइला'-ग्रामे कोलाहल हैल। सार्वभौम, रामानन्द, वाणीनाथ मिलिल ॥ 227 ॥ अनुवाद-'महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं'-सर्वत्र यह बात फैल गयी। कटकसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय और श्रीद्विज-वाणीनाथने आकर महाप्रभुसे भेंट की ॥ 227 ॥ महाप्रभुका काशीमिश्रके गृहमें वास और सार्वभौमका निमन्त्रण :- सबा सङ्गे लञा प्रभु मिश्र-वासा आइला। सार्वभौम-पण्डित गोसाञिरे निमन्त्रण कैला ॥ 228 ॥ भक्तोंके साथ प्रसादके सेवनकी इच्छाके लिये प्रसाद लानेका आदेश :- प्रभु कहे,-"महाप्रसाद आन' एइ स्थाने। सबा-सङ्गे इँहा आजि करिमु भोजने ॥ " 229 ॥ अनुवाद-महाप्रभु सभीको अपने साथ लेकर श्रीकाशीमिश्रके घरपर आ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको स्वीकार करके उन दोनोंसे कहा, - "महाप्रसाद यहाँपर ही ले आइये। आज मैं सबके साथ बैठकर यहींपर ही भोजन करूँगा ॥ " 228-229 ॥ | 511