भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1984, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1984

[ प्रति-ब्रह्मा श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'प्रतिज्ञा' 'सेवा' छाड़िबे 16/139 | प्रभुर चरणे किछु कैल 15/102 | ब प्रत्यब्द आसिबे यात्राय 15/98 | प्रभुर चरणे पड़े प्रेमाविष्ट 16/224 | बन्धु देखि' बन्धु येन 17/201 प्रथमेइ उपशाखार करये 19/161 | प्रभुर दरशने शुद्ध हञाछे 17/123 | बहुग्रन्थ-कलाभ्यास 22/115 प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,–मुख्य 20/186 | प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव 19/76 | बहुत संन्यासी यदि 15/197 प्रद्युम्नेर विलास–नृसिंह 20/206 | प्रभुर सहित करे कीर्त्तन 16/47 | बहुधन दिया दुइ ब्राह्मणे 19/4 प्रद्युम्नेर मूर्ति–त्रिविक्रम 20/197 | प्रभुर स्वभाव,–येबा देखे 25/8 | 'बापेर धन आछे'–जाने 20/131 प्रपञ्च ये देख सब 25/109 | प्रभुरे मिलिया गेला आपन 19/3 | बालक-दोष ना लय पिता 15/291 प्रभु-आगे दुःखी हञा 17/123 | प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री 18/90 | बालगोपाल किंवा खाइल 15/59 प्रभु कहे,–“अन्यावतार 20/350 | प्रलये अवशिष्ट आमि 25/110 | बाल्यकाल हैते ताँहो 16/222 प्रभु कहे,–“अमोघ शिशु 15/287 | 'प्र'-शब्दे–मोक्षवाञ्छा 24/96 | बाल्य, पौगण्ड, कैशोरे 19/103 प्रभु कहे,–“उठ, कृष्णनाम 18/205 | प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे 24/313 | बाह्य, अन्तर,–इहार दुइ 22/152 प्रभु कहे,–“उपाध्याय, श्रेष्ठ 19/101 | प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ 23/20 | बाह्य वैराग्य, वातुलता 16/243 प्रभु कहे,–कह 'कृष्ण' 17/29 | प्राकृत प्रपञ्च पाय 25/110 | बाह्ये राजवैद्य इँहो 15/120 प्रभु कहे,–“काँहा पाइला 18/109 | प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय 17/134 | 'बाह्ये' साधकदेहे करे 22/152 प्रभु कहे,–“कृष्ण-कृपा 20/104 | प्राणीमात्रे मनोवाक्ये उद्वेग 22/117 | बुद्धिमान्-अर्थे–यदि 24/86 प्रभु कहे,–“के तुमि 18/85 | प्रातःकाले भव्य-लोक 18/103 | बुद्धि, स्वभाव,–एइ 24/11 प्रभु कहे,–“क्षौर कराह 20/68 | प्राते कुमारहट्टे आइला 16/205 | ब्रह्म-अङ्गकान्ति ताँर 20/159 प्रभु कहे,–“तुमि 'गुरु' 17/170 | प्राते वृन्दावने कैला 18/75 | ब्रह्म, आत्मा, भगवान् 20/157 प्रभु कहे,–“तोमा स्पर्शि 20/56 | प्राभवविलास-वासुदेव 20/186 | 'ब्रह्म' 'आत्मा' 'चैतन्य' 17/129 प्रभु कहे,–“तोमार शास्त्र 18/189 | प्राभव-वैभव-भेदे 20/185 | ब्रह्मज्ञानी आकर्षिया करे 17/137 प्रभु कहे,–“धर्म নহে 15/188 | 'प्राभव'-'वैभव'रूपे 20/167 | 'ब्रह्म'-शब्दे कहे 25/33 प्रभु कहे,–“पूज्य एइ 15/234 | प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव' 22/161 | 'ब्रह्म'-शब्देर अर्थ–तत्त्व 24/66 प्रभु कहे,–“वैष्णव-सेवा 16/70 | 'प्रेमफल' पाकि' पड़े 19/162 | ब्रह्मा आइला,–द्वारपाल 21/59 प्रभु कहे,–“मायावादी कृष्णे 17/129 | प्रेम वृद्धिक्रमे नाम 19/178 | ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि 15/167 प्रभु कहे,–“याँर मुखे 15/106 | 'प्रेमवैचित्त्य' श्रीदशमे 23/60 | ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन 19/151 प्रभु कहे,–“ये करिते 24/323 | प्रेमसुख-भोग-मुख्य 20/142 | ब्रह्माण्डानुरूप ब्रह्मार 21/86 प्रभु कहे,–“सेवा छाड़िबे 16/133 | प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय 23/38 | ब्रह्मादि कीटपर्यन्त–ताँर 24/302 प्रभु कहेन,–“कृष्णसेवा' 15/104 | प्रेमादिक स्थायिभाव 23/43 | ब्रह्मादि रह–सहस्रवदने 21/12 प्रभु जले कृत्य करे 17/31 | प्रेमे कृष्णास्वाद हैले 20/141 | ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द 17/139 प्रभु ताँरे विदाय दिया 16/227 | प्रेमे प्रभु करे राधाकुण्डेर 18/6 | ब्रह्मा, विष्णु, शिव 20/291, 20/301 प्रभु देखि' वृन्दावनेर 17/202 | 'प्रेमेर विवर्त्त' इहा शुने 16/149 | ब्रह्मा, विष्णु, हर 21/36 प्रभुर उपदेशामृत शुने 23/121 | फ | ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति 20/369 प्रभुर गम्भीर-स्वरे येन 17/206 | फूल-फल भरि' डाल 17/201 | ब्रह्मार एकदिने हय 20/320 538 ।