भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1983, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1983

पद्य सूची नाम-प्रति ] 'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप' 17/131 | निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 23/11 | 'पाठान-वैष्णव' बलि हैल 18/211 नाम-सङ्कीर्त्तन-प्रेमे सेह 19/130 | नीच जाति, नीच सङ्गी 20/99 | 'पातअल' कहे, - 'ईश्वर 25/51 ना मागिलेह कृष्ण तारे 22/37 | नीवि खसाय पति-आगे 21/143 | पादपीठ-मुकुटाग्र-संघट्टे 21/72 नायक-नायिका, - दुइ 23/87 | नीलाचले आछि मुञि 15/52 | पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस 19/137 नायिकार शिरोमणि-राधा 23/62 | नौकाते कालीय-ज्ञान 18/106 | पालनार्थ स्वांश विष्णुरूपे 20/314 नारायणे माने, तारे 25/77 | 'न्याय' कहे, - 'परमाणु 25/50 | पालनार्थे विष्णु-कृष्णेर 20/317 'न्याय' कहे, - 'परमाणु 25/50 | | पाले-पाले व्याघ्र, हस्ती 17/26 निकटे यमुना बहे 18/77 | पक्षी, मृग, वृक्ष, लता 24/54 | पिछल्दा पर्यन्त सब 16/159 निज-कृत सूत्रेर निज 25/136 | पङ्गु नाचाइते यदि हय 23/117 | पितृ-मातृ-स्नेह आदि 24/33 निज-चिच्छक्त्ये कृष्ण 21/96 | पञ्चविध-भक्ते गौण सप्तरस 19/187 | 'पीत'-वर्ण धरि' तबे 20/338 निज-भ्रमे मूर्ख लोक 18/101 | पञ्चम-पुरुषार्थ-एइ 23/96 | पुण्य, अर्थ,-दुइ लाभ 20/8 निज-सम सखा-सङ्गे 21/108 | पञ्चरस 'स्थायी', व्यापी' 19/188 | पुनः कृष्णरति हय दुइत 19/192 निज-ज्ञाने सत्य छाड़ि' 18/98 | पञ्चरात्रे, भागवते एइ 19/169 | पुनः सेइ निन्दकेर मुख 15/263 निजाभीष्ट कृष्णप्रेष्ठ पाछे 22/155 | पञ्चलक्ष चारिसहस्र 20/322 | पुनरपि देशे बहि लञोया 25/162 निजांश-कलाय कृष्ण 20/307 | पण्डित कहे,-"याँहा तुमि 16/131 | पुरी-गोसाञि तोमार घरे 17/177 नित्य दुइ फूल हय 15/129 | पण्डितेर गौराङ्गप्रेम बुझने 16/137 | पुरी-गोसाञिर ये आचरण 17/185 'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते 22/12 | 'पतित' हइले भर्त्ता 15/264 | पुरीद्वये, परव्योमे-'पूर्णतर' 20/396 'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे 22/11 | 'परंब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान 19/217 | पुरीद्वये, वैकुण्ठाद्ये-ऐश्वर्य 19/193 नित्य याइ' देखि मुञि 15/53 | पर्वते ना चड़े दुइ 18/45 | पुरी मधुपरी वरा-कहे 19/102 'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि 22/12 | परव्योम-मध्ये वैसे 20/192 | पुरीर आवरणरूपे पुरीर 20/241 नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' 22/104 | परव्योमे वासुदेवादि-निज 20/226 | पुरुषार्थ-शिरोमणि-प्रेम 20/125 नित्यानन्द कहे,-"आमि 16/66 | परम ईश्वर कृष्ण स्वयं 21/34 | पुरुषोत्तम, अच्युत 20/204 नित्यानन्दे आज्ञा दिल 15/42 | परम उदार इँहो, ये 15/94 | पूतना-वधादि यत लीला 20/379 निमाइर प्रिय मोर-एसब 15/56 | परम कारण ईश्वरे केह 25/54 | पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर 18/195 निरन्तर कर कृष्णनाम 15/104, 25/191 | परम पवित्र स्थान अपवित्र 15/275 | 'पूर्णैश्वर्यप्रभु-ज्ञान' अधिक 19/218 निरन्तर गाय मुखे, ना 21/12 | परम मधुर, गुप्त ! व्रजेन्द्र 15/138 | पूर्व आज्ञा,-वेद-धर्म 22/59 निरन्तर सेवा करे 22/155 | परमात्मा यँहो, तँहो 20/161 | पूर्वदिके ताते माटी अल्प 20/135 'निर्गुण'-व्यतिरेके, तिँहो 25/53 | परमार्थ-विचार गेल, करि 25/42 | पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर' 18/197 'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे 24/16 | परम्पराय 'वैष्णव' हइल 17/49 | पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल 15/138 निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 23/48 | परशुरामे 'दुष्टनाश 20/370 | प्रकृति क्षोभित करि' 20/272 निषिद्ध पापाचारे तार 22/138 | परित्याग कैलुँ तार नाम 15/263 | प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते 25/92 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी' 19/159 | 'पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 20/133 | “प्रतापरुद्र-संन्नाता” नाम 16/108 'निष्ठा' हैते उपजय प्रेमेर 22/130 | पाँच सहस्र मुद्रा दिब 20/8 | 'प्रतिज्ञा', 'श्रीकृष्णसेवा' 16/137 | 537

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1983, कुल 2549 में से · BharatKosha