श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1986, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ माघ-यैछे श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला माघ-मास लागिल, एबे 18/145 | 'मुनि'-शब्दे मननशील 24/15 | याँहा नदी देखे, ताँहा 17/56 'मात्सर्य'-चण्डाल केने 15/275 | मुनि सब जानि' करे 20/352 | याँहा विप्र नाहि, ताँहा 17/60 माधवदास-गृहे तथा 16/208 | मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे 24/122 | याँहार दर्शने मुखे आइसे 16/74 माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' 17/172 | 'मुमुक्षु' अनेक जगते 24/117 | याँहा लञा याह तुमि, ताँहाइ 18/154 माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे 21/110 | 'मूर्ख'-लोक करिबेक 17/183 | याँर सङ्गे हय एड 16/266 माधुर्यशक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये 24/22 | मूर्खेर वाक्ये 'मूर्ख' हैला 18/100 | याँहा हैते कृष्णभक्ति सेइ 15/117 माया-कार्य, माया हैते 25/114 | मृगमद वस्त्रे बान्धे, तबु 18/119 | यार एकबिन्दु-पाने 25/271 मायाजाल छुटे, पाय 22/25 | मृगी व्याधिते आमि 18/184 | याहार कोमल श्रद्धा 22/67 मायातीत परव्योमे सबार 20/264 | मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय 24/116 | युक्तवैराग्य स्थिति सब 23/100 मायातीत हैले हय आमार 25/116 | मोक्षादि आनन्द यार नहे 18/195 | येइ कुण्डे नित्य कृष्ण 18/9 माया-द्वारे सृजे तेंहो 20/259 | मोर इच्छा हय,-हड 18/86 | येइ ग्रन्थकर्त्ता चाहे 25/48 'माया' निमित्तहेतु, 'प्रधान' 20/271 | मोर ध्याने अश्रुजले भरिल 15/57 | येइ ग्रामे दिया यान 17/47 मायाबन्ध हैते कृष्ण तारे 22/33 | मोर वाङ्मानसेर गम्य 21/26 | येइ तर्क करे इँहा 18/227 मायावादिगण याते महा 17/143 | मोर मन धुँइते नारे 23/116 | येइ ताँरे देखे, सेइ 17/118 मायावादी कृष्णे अपराधी 17/129 | मोर यदि बोल धरे 21/134 | येइ मूढ़ कहे,-जीव 18/115 'मायावादी'—निर्विशेष-ब्रह्मे 25/50 | मोर सुख चाह यदि 16/141 | येइ येइ कहिल, प्रभु 18/188 मायामुग्ध जीवेर नाहि 20/122 | मोरे खाओयाइते करे 15/64 | येइ सूत्रकर्त्ता, से यदि 25/91 मायार 'आश्रय' हय, तबु 20/293 | मोरे तुमि भिक्षा देह 17/177 | येइ सूत्रे येइ ऋक् 25/97 मायार ये दुइ वृत्ति 20/271 | 'मोरे ना छुँइह'—कहे 20/52 | ये कहे,—'कृष्णेर वैभव 21/25 मायासङ्ग-विकारे रुद्र 20/308 | मोरे प्रसाद देह' भिन्न 15/231 | ये-काले द्विभुज, नाम 20/176 मायिक विभूति—एकपाद 21/55 | मोरे शिष्य करि' मोर 17/167 | ये-काले संन्यास कैलुँ 15/51 मार्गशीर्षे—केशव, पौषे 20/198 | मौषल-लीला, आर कृष्ण 23/112 | ये खण्डिल कुविषय-भोग 20/93 माली हञा करे सेइ 19/152 | म्लेच्छेर हृदये येन लागे 18/178 | ये-दिवस प्रभु संन्यासीरे 25/18 मिलने 'रसाला' हय अमृत 19/182 | य | ये देखिबे कृष्णानन, तार 21/134 'मीमांसक' कहे,—ईश्वर 25/49 | यत्नाग्रह बिना भक्ति ना 24/165 | ये 'विग्रह' नाहि माने 25/113 मुकुन्द कहे,—"रघुनन्दन 15/115 | यथायोग्य विषय भुञ्ज' 16/238 | ये येइ दोष करे, देह' 19/26 मुक्ताहार—वकपाँति 21/109 | यदि वैष्णव-अपराध उठे 19/156 | ये रूपेर एक कण, डुबाय 21/102 मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिकामी 22/35 | यद्यपि असृज्य नित्य 20/257 | ये लीला-अमृत बिने 25/271 'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे 24/117 | यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर 19/82 | यैछे आमार गुण, कर्म 25/105 मुखे मुख दिया करे 17/42 | यद्यपि 'सनोड़िया' हय सेइत' 17/179 | यैछे आमार 'स्वरूप' 25/105 मुखे 'हय' 'हय' करे 25/27 | याँर आगे तृण-तुल्य 19/164 | यैछे इक्षुरस-बीज—गुड़ 23/39 मुख्य-गौण-वृत्ति, किंवा 20/146 | याँर यत शक्ति तत 17/233 | यैछे तैछे येहि कोहि 24/56 मुञि ये शिखाइ तोरे 23/118 | याँहा कृष्ण, ताँहा नाहि 22/31 | यैछे दधि, सिता, घृत 19/182 540 |