भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1987, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1987

पद्य सूची                                यैछे–वृक्ष ]


स्तम्भ १

यैछे बीज, इक्षु-रस — 19/179 यैछे सूर्येर स्थाने भासये — 25/115 'योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु — 15/11 योगमाया चिच्छक्ति — 21/103 योगमाया-दासी, याँहा — 21/44 योगमार्गे-अन्तर्यामि — 24/79 'योगारुरुक्षु', 'योगारूढ़' — 24/152

रघुनाथेर पाय मुञि — 15/149 रति गाढ़ हैले तार — 19/177 रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त — 22/68 रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे — 19/184 रसगण-मध्ये तुमि श्रेष्ठ — 19/104 राग, अनुराग, भाव — 19/178, 23/38 रागभक्ति, विधिभक्ति हय — 24/80 रागभक्त्ये व्रजे स्वयं — 24/81 रागमयी भक्तिर हय — 22/148 रागहीन जन भजे शास्त्रेर — 22/106 रागात्मिका-भक्ति—'मुख्या' — 22/145 राजमन्त्री सनातन-बुद्धये — 20/348 राजा मोरे प्रीति करे — 19/13 रात्रि-दिने करे व्रजे — 22/153 राधाकृष्णे लागाञाछ — 15/228 'राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र — 20/201 राधिकाद्ये 'पूर्वरोग' प्रसिद्ध — 23/60 'रामदास' बलि' प्रभु ताँर — 18/207 रुचि हैते भक्ति हय — 23/12 'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव — 23/53 'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष — 24/78 रूप-गुण-श्रवणे रुक्मिण्यादिर — 24/47 रूप-गोसाञिर छोटभाइ — 19/36 रूप-गोसाञिरे शिक्षा करा'न — 19/114 रूप देखि' आपनार, कृष्णेर — 21/104


स्तम्भ २

रूप-सनातन-सबार कृपा — 19/123 रोग खण्डि' सवैद्य ना — 20/91

लता अवलम्बि' माली — 19/162 लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि — 22/54 ललाटे अष्टमी-इन्दु — 21/127 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठादि' — 19/159 लोक कहे, — “रात्र्ये — 18/104 लोक कहे, —“संन्यासी — 18/109 लोक-भिड़-भये प्रभु — 19/114 लोके कहे, — “कृष्ण — 18/94 लोभे व्रजवासीर भावे — 22/149

वंशी-गीते हरे कृष्ण — 24/50 वंशीध्वनि-चक्रवात, नारीर — 21/113 वंशीस्वरादि-उद्दीपन — 23/46 वन देखि' भ्रम हय — 17/55 वनपथे आनि' आमाय बड़ — 17/69 'वयः कैशोरकं ध्येयं'-कहे — 19/103 वर्णमात्र-भेद, सब-कृष्णेर — 20/174 वर दिला-'एइ सब स्फुरुक — 23/119 वर देह' मोर माथे धरिया — 23/117 वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण — 19/196 वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे — 22/29 वाचस्पति ! कर जलब्रह्मोरे — 15/136 वात्सल्य-भक्त-माता — 19/190 वात्सल्यरति, मधुररति, -ए — 19/184 वात्सल्ये शान्तेर गुण, दास्येर — 19/225 वातुल बालकेर माता — 15/50 'वातुल' ना हइओ, घरे — 18/102 वादियार वाजि पाति' — 16/272 वाराणसी हैल द्वितीय — 25/160


स्तम्भ ३

वासुदेव-दत्तेर तुमि — 15/93 वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश — 20/177 वासुदेवेर विलास दुइ — 20/205 वासुदेवेर मूर्त्ति-केशव — 20/195 विचार करिया यबे भजे — 24/185 विजया-दशमी-दिने करिल — 16/94 विजया-दशमी-लङ्गा — 15/32 विज्ञ-जनेर हय यदि — 22/94 विधि-धर्म छाड़ि' भजे — 22/138 विधिभक्त्ये पार्षददेहे — 24/81 विधि मोरे हिन्दुकुले केने — 16/181 बिना पाप-भोगे हबे — 15/167 विप्र कहे, — “श्रीपाद माधवेन्द्र — 17/166 विप्रगृहे गोपालेर निभृते — 18/30 विप्रगृहे स्थूलभिक्षा, काँहा — 19/128 'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वरोग — 23/59 'विवर्त्तवाद' स्थापे, 'व्यास भ्रान्त' — 25/40 विभाव, अनुभाव, सात्त्विक — 23/44 विभुरूपे व्यापे, शक्त्ये — 24/22 'विरजा', 'ब्रह्मलोक' भेदि' — 19/153 विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके — 23/57 विराट् व्यष्टि-जीवेर — 20/295 विलास, स्वांशेर भेदे — 20/184 विलासेर विलास-भेद — 20/185 विशुद्ध-निर्मल-प्रेम — 15/139 विश्रम्भ-प्रधान सख्य — 19/223 विश्वसृष्ट्यादि कैल, वेद — 20/359 'विश्वास' आसिया प्रभु — 16/170 विश्वे अवतारि' धरे — 20/264 विषयकूप हैते तोमा — 19/49 विषय-रोग खण्डाइल — 20/90 विष्णुवैष्णव-निन्दा — 22/117 वृक्षलता-प्रफुल्लित, सेइ — 17/45


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