भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1988, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1988

[ वृद्ध-श्रीरूप श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वृद्धकाले रूप-गोसाञि ना 18/46 | व्रजवासी लोक 'गोलोक' 18/136 | शास्त्रे लिखियाछे, केह 18/199 वृन्दावन देखिं यबे आसिब 16/240 | व्रजे कृष्ण—सर्वैश्वर्यप्रकाशे 20/396 | 'शिव'—मायाशक्तिसङ्गी 20/311 वृन्दावन याइते पथे हैल 17/226 | व्रजे गोपभाव रामेर, पुरे 20/187 | शिवानन्द-सेनेर पुत्र 19/118 वृन्दावन याइवार एइ नहे 16/266 | व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक 23/62 | 'शिष्य' करि' ताँर भिक्षा 17/180 वृन्दावन याब काँहा 16/274 | व्रजेन्द्रनन्दने इहा अधिक 20/178 | शीघ्र याइ' मुञि सब 15/58 वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार 18/77 | व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण 18/62 | शुकदेवेर मन हरिल 24/44 वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य 21/28 | व्रजे वास,—एइ पञ्चसाधन 24/187 | शुक्ल-रक्त-कृष्ण-पीत 20/330 वृन्दावने 'कृष्ण' आइला 18/107 | श | 'शुद्धभक्ति' हैते हय 'प्रेमा' 19/166 वृन्दावने कृष्णसेवा 23/99 | शक्ति कम्पयुक्त परिपाट्ये 24/20 | शुनि' 'कृष्ण' 'कृष्ण' 15/278 वृन्दावने हइला तुमि कृष्ण 18/110 | शक्त्यावेश दुइरूप—'मुख्य' 20/366 | शुनियांछि गौड़देशेर 17/116 वेदनिषिद्ध पाप करे, धर्म 19/146 | शची-माता मिलि' ताँर 16/210 | शुनिलेओ भाग्यहीनेरे ना 18/225 वेदनिष्ठ-मध्ये अर्द्धेक वेद 19/146 | शतेक वत्सर हय 'जीवन' 20/322 | 'शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त' 24/125 वेदमते कहे ताँरे—'स्वयं 25/51 | शर्करा, सिता-मिछरि 19/179 | शुष्कवैराग्य-ज्ञान सब 23/100 वेदशास्त्र कहे—'सम्बन्ध' 20/124 | शरण लञा करे कृष्णे 22/99 | शुष्क रुटी-चाना चिबाय 19/128 वेदशास्त्रे उपदेशे, कृष्ण 22/3 | शरणागतेर, अकिञ्चनेर 22/96 | शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति 20/370 वेदशास्त्रे कहे सम्बन्ध 20/143 | शान्त, दास्य, सख्य 19/185 | शैल देखि' मने हय 17/55 वेदादि सकल शास्त्रे कृष्ण 20/144 | शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य 19/195 | 'श्याममेव परं रूपं'—कहे 19/101 'वेदान्त'-मते,—ब्रह्म 'साकार' 25/53 | शान्तभक्त—नवयोगेन्द्र 19/189 | 'श्याम'-रूपेर वासस्थान 19/102 वेदेर प्रतिज्ञा केवल कहये 20/146 | शान्त-भक्तेर रति बाड़े 24/32 | श्रद्धावान् जन हय भक्ति 22/64 वैकुण्ठ, ब्रह्माण्डगण 20/150 | शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति 19/183 | 'श्रद्धा'-शब्दे विश्वास कहे 22/62 वैकुण्ठे 'शेष'—धरा 20/368 | शान्तरसे शान्ति-रति 23/50 | श्रवण-कीर्त्तन-जले करये 19/152 वैदिक, याज्ञिक तुमि 19/69 | शान्तरसे—'स्वरूपबुद्धये 19/210 | श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण 22/118 'वैधी-भक्ति' बलि' तारे 22/106 | शान्तादि रसेर 'योग' 23/52 | श्रवणादि-क्रिया—तार 22/103 वैभवप्रकाश कृष्णेर 20/174 | 'शान्तिपुराचार्य'-गृहे ऐछे 16/210 | श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये 22/104 वैभवप्रकाश यैछे देवकी 20/175 | शान्तेर गुण दास्ये आछे 19/220 | श्रवणाद्येर फल 'प्रेमा' 24/58 वैभवप्रकाशे आर प्राभव 20/188 | शान्तेर गुण, दास्येर सेवन 19/221 | श्रीअङ्ग-रूपे हरे 24/47 वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर 15/169 | 'शास्त्र'-'गुरु'-'आत्म'-रूपे 20/123 | श्रीकृष्णचैतन्य-वाक्य दृढ़ 25/28 व्यर्थ मोर एइ देह 16/182 | शास्त्र छाड़ि' कुकल्पना 25/41 | श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी 25/57 व्याख्या शिखाइल यैछे 23/113 | शास्त्र-युक्ति नाहि जाने 22/66 | श्रीकृष्णचैतन्य हय 'साक्षात् 25/24 व्याघ्र-मृगी मिलि' चले 17/37 | शास्त्रयुक्ति नाहि माने 22/149 | श्रीचैतन्यसम आर कृपालु 25/261 व्याध हञा हय पूज्य 24/222 | शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण, दृढ़ 22/65 | श्रीमुखे करेन आज्ञा, निवेदि 15/103 व्यासकृपाय शुकदेवेर 24/111 | शास्त्रेर सहज अर्थ नहे 25/48 | श्रीरघुनाथ-चरण छाड़ान 15/150 'व्याससूत्रेर्' अर्थ करेन 25/24 | | श्रीरूप-सनातन रहे 19/3 542 ।

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1988, कुल 2549 में से · BharatKosha