श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1989, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद सूची श्रीरूप-सहाय ] श्रीरूप-हृदये प्रभु शक्ति १९/११७ | 'सनकादि', 'नारद', 'पृथु' २०/३६७ | 'सरखेल' हञा तुमि करिह १५/९६ श्रीरूपे शिक्षा दिल शक्ति १९/१३५ | सनकादिर मन हरिल २४/४४ | 'सरस्वती' एइ वाक्ये 'सत्य' १८/९७ श्री, लज्जा, दया, कीर्त्ति २१/१२१ | सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे २०/३६९ | सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम २४/५५ षड्दर्शन-व्याख्या बिना १७/९६ | सनातन-मुखे कृष्ण आमा १७/७४ | सर्व-आदि, सर्व-अंशी २०/१५३ षडैश्वर्य्यपूर्ण कृष्ण हय १८/११२ | सनातने कहिला,-"तुमि २५/१७५ | सर्वकर्म त्याग करि' से २२/६० 'षाठी राण्डी हउक'-इहा १५/२५२ | सनातनरे वैराग्ये प्रभुर २०/८२ | सर्व-जन-देश-काल २५/११८ षोलक्रोश वृन्दावन,-शास्त्रेर २१/२९ | सनोड़िया-घरे संन्यासी १७/१७९ | सर्वजीवेर पाप प्रभु देह' १५/१६२ स | संन्यासी-चित्कण जीव १८/११२ | 'सर्वज्ञ' आसि' दुःख देखि' २०/१२७ | 'संन्यासी'-नाम-मात्र, १७/१२० | सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर २०/१३१ संसार भ्रमिते कोन भाग्ये २२/४३ | संन्यासीर सङ्ग-भये ना १७/१०३ | सर्वज्ञ मुनिर वाक्य २०/३५१ संहारार्थे माया-सङ्गे रुद्र २०/३०७ | सप्तग्रामे बारलक्ष मुद्रार १६/२१७ | सर्वज्ञेर वाक्ये करे २०/१२९ सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह १५/१६३ | सप्त गौण 'आगन्तुक' १९/१८८ | सर्वज्ञेर वाक्ये मूलधन २०/१३० सकलसाधन-श्रेष्ठ एइ २२/१२६ | सवंशे सेइ जल मस्तके १९/८६ | सर्वतत्त्व-निरूपिया 'प्रवीण' १९/११७ सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' २४/९७ | सब कहा ना याय २२/७४ | सर्वतीर्थे हैल ताँर परम १८/२१२ सकारण लिखि आदौ २४/३२४ | सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर' १८/१९६ | सर्वत्र गाहिया बुले १८/२११ सङ्कर्षणेर विलास-उपेन्द्र २०/२०५ | सब गोपी हैते राधा कृष्णेर १८/७ | सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण २४/३३८ सङ्कर्षणेर मूर्त्ति-गोविन्द २०/१९६ | सब छाड़ि' कृष्णभक्ति २४/१८२ | सर्व-देश-काल-दशाय २५/१२० सखागणेर रति हय 'अनुराग' २४/३३ | सब तत्त्व जान, तोमार २०/१०४ | सर्व महागुणगण वैष्णव २२/७२ सख्य-वात्सल्य-रति पाय २३/५१ | सब त्यजि' तबे तिँहो २४/३०५ | सर्व मुक्त करिते कृष्णेर १५/१७१ सख्य-भक्त-श्रीदामादि १९/१९० | सब फल देय भक्ति २४/८७ | सर्वशास्त्र खण्डि' प्रभु २५/२० सख्यभावे धार्ष्ट्य क्षमापय १९/१९८ | सब ब्रह्माण्ड सह यदि १५/१७८ | सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा २५/२६३ सख्ये, वात्सल्ये, मधुर-रसे १९/१९५ | सब शिखाइल प्रभु भागवत १९/११५ | सर्वशास्त्रे उपदेशे, 'श्रीकृष्ण' २०/१३० सख्येरे असङ्कोच, लालन १९/२३० | सब साधि' अवशेषे एइ २२/५९ | सर्वश्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर १८/१९३ सख्येर गुण-'असङ्कोच' १९/२२६ | सबारे उपदेश करे १८/८१ | सर्वाकर्षक, सर्वान्हादक २४/३८ सगर्भ, निगर्भ,-एइ हय २४/१४९ | सबे 'एक'-मत नहे, भिन्न १७/१८४ | 'सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य १८/१९१ सङ्गे केने आनियाछ एइ २०/२५ | सबे 'कृष्ण' कहे, सबार १८/२०६ | सर्वेन्द्रिय-फल,-एइ २०/६० सच्चिदानन्द-देह, पूर्णब्रह्म १८/१९१ | सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर २१/२२ | 'सर्वैश्वर्य्यपूर्ण' तँहो-श्याम १८/१९० सञ्चय ना कैले कुटुम्ब १५/९५ | समस्त ब्रह्माण्डगणेर इँहो २०/२८२ | सर्वैश्वर्य्यपूर्ण याँर गोलोक २०/१५५ सत्सङ्ग, कृष्णसेवा, भागवत २४/१८७ | समुत्कण्ठा हय सदा २३/२८ | 'सर्वोत्तम' आपनाके 'हीन' २३/२५ सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' २४/२०८ | 'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे २३/५८ | सर्वोपरि कृष्णलोके 'कर्णिकार' २१/७ "सत्यं परँ"-सम्बन्ध २५/१४० | सम्भोगे 'मादन', विरहे २३/५४ | सहजे आमार किछु अर्थ २४/९ 'सत्य' शब्दे कहे ताँर २०/३५८ | सम्मान करिते नारि १५/१९७ | सहजे निर्मल एइ ब्राह्मण १५/२७४ सत्ययुगे ध्यान-कर्म कराय २०/३३२ | सयुक्तिक वाक्ये मन २५/२० | सहाय हइल दैव, कैल १५/२६७ । 543