भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1990, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1990

[ सहिते-स्व श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सहिते ना पारि आमि 18/148 | सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ 25/26 | सेइ माया अवलोकिते 20/265 सहिते ना पारिमु सेइ 17/183 | सूत्रेर परिणामवाद, ताहा 25/40 | सेह मोर प्रिय, अन्य 15/284 ‘सांख्य’ कहे,—‘जगतेर 25/49 | सूर्य बिना स्वतः तार 25/115 | सेइ ‘रति’ गाढ़ हैले 23/13 साक्षात्शक्त्ये ‘अवतार’ 20/366 | सूर्य येन चर्मचक्षे 20/159 | सेइ सब गुण हय 22/74 सात दिन रहि’ तथा लोक 16/209 | सूर्यांशु-किरण, येन 20/109 | सेइ सब सूत्र लञा 25/52 साधक, ब्रह्ममय, आर 24/103 | सृष्टि करि’ तार मध्ये 25/109 | सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण 24/119 साधन करिले प्रेम उत्पन्न 19/175 | ‘सृष्टिर पूर्वे षडैश्वर्यपूर्ण 25/108 | सेइ सेइ सेवनेर इँहा 19/225 साधनभक्ति हैते हय 19/177 | सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा 18/192 | सेइ स्वाराज्यलक्ष्मी करे 21/97 साधनभक्त्ये हय 23/10 | सृष्टि-हेतु येइ मूर्ति 20/263 | सेकजल पाञा उपशाखा 19/160 साधनेर फल—‘प्रेम’ मूल 25/102 | से अक्षर ‘चन्द्र’ हय 21/125 | से केने राखिबे तोमार 20/91 साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा 25/270 | सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण 24/71 | से चैतन्यलीला हय 25/264 साधु-शास्त्र-कृपाय यदि 20/120 | सेइ अमोघ हैल प्रभुर 15/296 | से-छल सेकाले कृष्ण 16/241 साधुसङ्ग-कृपा किंवा 24/92 | सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते 25/92 | से जानुक,—कायमने मुञि 21/25 साधुसङ्ग, कृष्णकृपा, भक्तिर 24/99 | सेइ कुण्डे येइ एकबार 18/10 | ‘सेवा’ करि’ कृष्णे सुख 19/219 साधुसङ्ग, नामकीर्त्तन 22/125 | सेइ ‘कृष्ण’ ‘कृष्ण’ करे 17/32 | सेवा-नामापराधादि दूरे 22/114 ‘साधुसङ्ग’ ‘साधुसङ्ग’ 22/54 | सेइ कृष्ण भज तुमि 15/142 | से विघ्न करिबे,—धने हात 20/133 साधुसङ्ग हैते हय 23/10 | सेइ गोवर्द्धनेर पुत्र—रघुनाथ 16/222 | से माधुरी आस्वादिते 20/179 साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये 22/49 | सेइ जलबिन्दु-कणा लागे 17/32 | से सिद्ध हइल—छाड़ि’ 16/139 साधुसङ्गे तप छाड़ि’ 24/210 | सेइ जीव निस्तारे, माया 20/120 | सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य 20/178 साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति 22/45 | सेइत ‘पाषण्डी’ हय, दण्डे 18/115 | सौभाग्यादि-प्राय सेइ 20/169 साधु, साधु, गुप्त! तोमार 15/153 | सेइ त’ वैष्णव, करिह 15/111 | स्तब्ध हञा मूलशाखा 19/160 ‘साध्य’, ‘साधन’-तत्त्व 20/103 | सेइ त’ माधुर्य-सार 21/117 | स्त्री-बाल-वृद्ध, आर 18/121 ‘साध्य-साधन-वस्तु’ 18/202 | सेइ दिने व्यय करे 15/94 | ‘स्त्री-सङ्गी’—एक असाधु 22/84 सार्वभौम! कर ‘दारुब्रह्म’ 15/136 | सेइ प्रेमा—‘प्रयोजन’ सर्वानन्द 23/13 | स्थाणु-पुरुषे यैछे विपरीत 18/108 सार्वभौम-गृहे दास-दासी 15/284 | सेइ प्रेमे पाय जीव 25/102 | स्थावर-जङ्गम मिलि’ 17/206 सार्वभौम-सङ्गे तोमार 15/276 | सेइ वपु भिन्नाभासे किछु 20/183 | स्थायिभाव ‘रस’ हय एइ 23/44 सार्वभौम-सम्बन्धे तुमि 15/283 | सेइ वपु, सेइ आकृति 20/171 | स्थायिभावे मिले यदि विभाव 19/180 सिद्धान्त शिखाइला,—येइ 23/115 | सेइ बिजली-खाँन हैल 18/212 | स्थिर हञा घरे याओ 16/237 सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति 24/28 | सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ 22/10 | स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तेंहो 18/192 सुखभोग हैते दुःख आपनि 20/140 | सेइ बुद्धि देन ताँरे 24/185 | स्नान-भिक्षादि-निर्वाह करेन 17/229 सुखे प्रेमफल-रस करे 19/163 | सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज 16/72 | स्फूर्त्ति-ज्ञाने तेंहो ताहा 15/53 सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त 23/51 | सेइ ‘ब्रह्म’-शब्दे कहे 24/69 | स्वकर्म करिते से रौरवे 22/26 सुबुद्धि जनेर हय 24/188 | सेइ भिते हात दिया 15/83 | स्व-चरण दिया करे 24/97 544 ।