श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवतरणके आन्तरिक-उद्देश्य लिखे गये हैं। आठवें अध्यायमें ग्रन्थकी भूमिका और ग्रन्थकारका अपना परिचय प्राप्त होता है। नवें अध्यायमें महाप्रभुका भक्ति-काननके मालीके रूपमें वर्णन तथा दसवेंसे बारहवें अध्याय तक तीन अध्यायोंमें महाप्रभुके निज-पार्षदोंकी शाखा, श्रीनित्यानन्द-शाखा एवं श्रीअद्वैत और श्रीगदाधर-शाखाकी तालिका दी गयी है। आदिलीलाके पहले अध्यायसे बारहवें अध्याय तक सभी अध्यायोंको श्रीचैतन्य-चरितामृतका प्रारम्भिक 'उद्घाटन' या 'पूर्वलक्षण' कहा जा सकता है। आदिलीलाके तेरहवेंसे सतरहवें अध्याय तक अन्तिम पाँच अध्यायोंमें भगवान्के गृहस्थ-चरित्रकी लीला कही गयी है। तेरहवें अध्यायमें जन्मलीला, चौदहवेंमें बाल्यलीला, पन्द्रहवेंमें पौगण्ड-लीला, सोलहवेंमें कैशोर-लीला तथा सतरहवेंमें यौवन-लीलाकी घटनाओंका वर्णन हुआ है। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिलीलामें कही गयी कथाएँ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचैतन्यभागवतमें विशेषरूपसे वर्णित होनेपर इस ग्रन्थमें पुनः इन लीलाओंका विस्तारसे उल्लेख नहीं हुआ है। श्रीचैतन्यभागवतको श्रीचैतन्यचरितामृतका पूर्वभाग और श्रीचैतन्यचरितामृतको श्रीचैतन्यभागवतका उत्तरभाग कहा जा सकता है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास आश्रममें अवस्थित-कालकी लीलाएँ विशेष रूपसे वर्णन की गयी हैं। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्य और अन्त्यलीलाके सम्पूर्ण अध्यायों अर्थात् पैंतालिस अध्यायोंमें श्रीकृष्णचैतन्यकी संन्यास-लीला तथा आदिलीलाके अन्तिम पाँच अध्यायोंमें महाप्रभु विश्वम्भरकी बाल्यलीला और गृहस्थलीला वर्णित हैं। इसलिये तत्त्वानुकूल लीलाग्रन्थ पचास अध्यायोंमें है तथा उनकी भूमिकारूपमें तत्त्व-परिचय बारह अध्यायोंमें है, - इस प्रकार बासठ अध्यायोंमें ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ है।
“मध्यलीलाका विवरण"
मध्यलीलाके पहले अध्यायमें प्रचार-कार्यमें व्रती श्रीरूप-सनातनका कथा प्रसङ्ग, मध्य और अन्त्यलीलाका अनुवाद-सूत्र-कथन तथा दूसरे अध्यायमें अन्त्यलीलामें कही गयी शेष बारह वर्षोंकी लीलामालाका संक्षिप्त परिचय लिपिबद्ध हुआ है। तीसरे अध्यायमें संन्यास ग्रहणके उपरान्त हुई घटनाओंका वर्णन करते हुए राढ़देश और शान्तिपुरमें गमन तथा चौथे और पाँचवें अध्यायोंमें नीलाचलके पथमें रेमुणा, याजपुर, कटक, साक्षीगोपाल और भुवनेश्वर आदि स्थानोंकी कथा तथा दण्डभङ्ग-लीला वर्णित हुई है। छठे अध्यायमें महाप्रभुका पुरीमें आगमन और सार्वभौम-मिलन, सातवेंमें दक्षिण यात्रा, आठवेंमें रामानन्द-मिलन, नौवेंमें दक्षिण भारतमें भ्रमणकी कथा, दसवें और ग्यारहवेंमें पुनः पुरी आगमन, गौड़देशसे आये भक्तोंका उत्कलके भक्तोंके साथ मिलनका चित्राङ्कन हुआ है। बारहवें, तेरहवें और चौदहवें-तीन अध्यायोंमें महाप्रभुका पुरुषोत्तममें अवस्थान और जगन्नाथदेवकी रथयात्रादिका प्रसङ्ग तथा पन्द्रहवेंमें भक्तोंको विदायी आदिको अङ्कित किया गया है। सोलहवेंमें महाप्रभुकी वृन्दावन यात्रा और बीचमेंसे ही लौटकर आना तथा शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथदासका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। सतरहवेंमें वन-पथसे पुनः वृन्दावन यात्रा, अठारहवेंमें वृन्दावन भ्रमण, उन्नीसवेंमें प्रयागमें श्रीरूपशिक्षा तथा बीसवेंसे
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