श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवें तक छह अध्यायोंमें काशीमें सनातन शिक्षाका प्रसङ्ग-बीसवें और इक्कीसवेंमें सम्बन्ध-ज्ञान, बाइसवेंमें अभिधेय, तेइसवेंमें प्रयोजन, चौबीसवेंमें 'आत्मारामारच'-श्लोकके अर्थका विवरण तथा पच्चीसवेंमें मायावादी-विमोचन लीला वर्णित हुई है। “अन्त्यलीलाका विवरण" अन्त्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीरूपके साथ दूसरी बार मिलनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित ग्रन्थका श्रवण तथा शिवानन्दके कुत्तेकी कथा, दूसरेमें छोटे हरिदासके प्रसङ्गमें स्त्री-सङ्गीके त्यागकी लीला, तीसरेमें हरिदासठाकुर-महिमा और नाम-महिमा तथा दामोदरका वाग्दण्ड, चौथेमें श्रीसनातनके साथ द्वितीय मिलन, पाँचवेंमें प्रद्युम्न मिश्रका रामानन्दरायसे सङ्ग और बङ्गालके कविकि तत्त्व-भ्राँति, छठेमें दास-गोस्वामीकी कथा और महोत्सव, सातवेंमें वल्लभभट्ट-मिलन, आठवेंमें रामचन्द्रपुरीके कटाक्षसे भिक्षामें सङ्कोच, नौवेंमें राजाके धनका हरण करनेवालेकी निन्दा, दसवेंमें राघवकी झालि, सेवककी सेवावृत्तिकी परीक्षा तथा नृत्य, ग्यारहवेंमें हरिदास ठाकुरका निर्याण, बारहवेंमें जगदानन्दके द्वारा लाये गए तेलकी उपेक्षा तथा श्रीनित्यानन्दके द्वारा शिवानन्द सेनपर क्रोध प्रकाश, तेरहवेंमें जगदानन्दकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके द्वारा देवदासीके गीतका श्रवण तथा रघुनाथभट्ट-संवाद, चौदहवें और पन्द्रहवेंमें दिव्योन्माद, अन्तर्दशामें वृन्दावनकी उपलब्धि और श्रीकृष्णान्वेषण, सोलहवेंमें कालिदासका वैष्णव-उच्छिष्ट पानेका प्रसङ्ग, कविकर्णपूरकी शैशवकालकी कथा और श्रीकृष्णधरामृतफल-माहात्म्य, सतरहवेंमें गायोंके बीचमें अन्तर्दशा, अठारहवेंमें समुद्रके बीचमें अन्तर्दशा, उन्नीसवेंमें विप्रलम्भावस्था तथा बीसवेंमें शिक्षाष्टक, अन्त्यलीलाका सूत्रवर्णन और ग्रन्थ समाप्त तथा ग्रन्थकारके दैन्यका वर्णन हुआ है। “श्रीचैतन्य-प्रचारित वास्तव सत्यधर्मकी सुप्राचीनता और पूर्व युगोंका इतिहास” श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित धर्ममतको कोई-कोई आधुनिक और नव-रचित कहनेकी धृष्टता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु सभी शास्त्र ही उनके स्वरमें उनकी बात ही न्यूनाधिक बोलनेके लिये गर्दन उठाकर भी सुष्ठुरूपसे वर्णन नहीं कर पाते हैं। भगवान् श्रीचैतन्यदेवने वास्तव-सत्यके विषयमें जो सब बातें कही हैं, वही उन्होंने प्राकृत-सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माके हृदयमें प्रकट की थीं। ब्रह्माने समय-समयपर जिन सभी व्यक्तियोंके निकट इन बातोंको प्रकाशित किया था, वे क्रमशः कालके प्रभावसे अनेक प्रकारसे लुप्त हो गयी थीं। ब्रह्माके द्वारा कथित वास्तव-सत्य श्रुति-परम्परासे परवर्त्ती ऋषिसमाजमें प्रकाशित होनेपर भी मायाके तीन गुणोंके आक्रमणसे श्रौतवाणी अनेक प्रकारसे रूपान्तरित हुई है। श्रौतवाणीकी विकृत धारणा जिस समय वास्तव सत्यको आवृत और विपरीत करनेका प्रयास करती है, उस समय ही श्रौतपन्थाके आदिपुरुष भगवान् विष्णु अपने नैमित्तिक लीलावतारसमूहकी अवतारणा करते हैं अर्थात् जगत्में अवतरित होते हैं।