भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 22

“ब्रह्माके सात जन्मोंमें वास्तव सत्यका प्रकाश” ब्रह्माके सात विभिन्न जन्मोंमें यह वास्तव-सत्य पुनः पुनः प्रकाशित हुआ था। कालके प्रभावसे उस सत्यने न्यूनाधिक लुप्त होकर कलियुगमें अनेक तर्कपन्थाओंको आह्वान किया है। ब्रह्माके पहले मानस जन्ममें श्रीनारायणसे फेनपगण वास्तव-सत्यकी कथासे अवगत हुए। फेनपगणसे वैखानसगण तथा उनसे चन्द्रने वास्तव-सत्यको लाभ किया। ब्रह्माके दूसरे चाक्षुष जन्ममें नारायणकी कृपासे ब्रह्मा और रुद्र तथा रुद्रसे बालखिल्यगण उस सत्यसे परिचित हुए। ब्रह्माके तीसरे वाचिक जन्ममें नारायणसे सुपर्णने ऋग्वेदका मूल मन्त्र प्राप्त किया। उस समय वायुसे विघशासि-सम्प्रदाय तथा विघशासिगणसे महोदधिने ऐकान्तिक धर्मके विषयमें अभिज्ञता प्राप्त की। ब्रह्माके चौथे श्रवणज जन्ममें आरण्यकके साथ वेदशास्त्रसे सात्वतधर्म प्रचारित हुआ। उस समय ब्रह्मासे स्वारोचिष मनु, मनुसे उनके पुत्र शङ्खपदने तथा शङ्खपदके पुत्र सुवर्णाभने सात्वतधर्मकी शिक्षा प्राप्त की। ब्रह्माका मानसजन्म, चाक्षुषजन्म, वाचिकजन्म और श्रवणज-जन्म-इन चार प्रकारके आविर्भावोंके द्वारा सत्ययुगमें धर्मप्रचार हुआ था। उस समयमें त्रेतायुगके समान वर्णाश्रम-धर्म और वैदिक कर्मकाण्डका प्रचार आरम्भ नहीं हुआ था। “वास्तव सत्यके उपासकोंका वर्णाश्रमसे अतीत एकायन-शाखामें गणन” फेनप, वैखानस, सोम, रुद्र, बालखिल्य, सुवर्ण, वायु, महोदधि, स्वारोचिष मनु, शङ्खपद और सुवर्णाभ आदि पूर्व युगोंके हरिजनगण सभी एकायन-शाखी थे। उस समयमें वैदिक शाखाका कोई भी विभाग नहीं होनेके कारण वैदिक ऋषिगण ‘एकायन-शाखी’ नामसे जाने जाते थे। फेनप, वैखानस, बालखिल्य और परवर्त्ती समयमें उडुम्बरगण पूर्व चारों सम्प्रदायोंके अनुसरणसे वर्णाश्रमधर्ममें प्रतिष्ठित होनेके समयमें भी वानप्रस्थकी शाखाविशेषमें पर्यवसित हुए थे। “सभी शास्त्रोंमें प्रसिद्ध ब्रह्माके पाद्म-जन्मसे भक्तिका इतिहास” त्रेताके प्रारम्भमें वर्णाश्रम गुण-कर्मके विभागानुसार चार-चार भागोंमें विभक्त हुआ। उस समय ब्रह्माके पाँचवें नासत्य जन्ममें नारायणसे सनत्कुमार ऐकान्तिक धर्ममें प्रविष्ट हुए। सनत्कुमारसे वीरण, वीरणसे रैभ्य, रैभ्यसे कुक्षि ऐकान्तिक धर्ममें प्रविष्ट हुए। उस समय ब्रह्माके छठे अण्डज जन्ममें ब्रह्मासे बर्हिषत् और उनके अग्रज (बड़े भाई) अविकम्पन आदि ऐकान्तिक सात्वत-धर्ममें प्रविष्ट हुए। ब्रह्माके छठे जन्मसे ही सर्वप्रथम सामवेद-गानकी ध्वनि उद्गीत हुई। ब्रह्माके सातवें पाद्म-जन्ममें ही नारायणसे ब्रह्मा, ब्रह्मासे दक्ष, आदित्य, विवस्वान, मनु और इक्ष्वाकु आदिने भागवतधर्ममें अवस्थित होकर प्रसिद्धि लाभ की। xiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत