भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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“चारों सात्वत-सम्प्रदायोंका इतिहास” ‘श्रीसम्प्रदाय’—रत्नाकरसे उद्भूत हुआ है। रत्नाकर प्राचीन विघशासि-सम्प्रदायसे और उक्त सम्प्रदाय फिर वायुसे ब्रह्माके तीसरे वाक्यज जन्ममें प्रकटित हुआ। ‘ब्रह्म-सम्प्रदाय’ने और ‘रुद्र-सम्प्रदाय’ने ब्रह्माके चाक्षुष जन्ममें नारायणसे कृपा प्राप्त की। उनके अधस्तन बालखिल्यगणोंने ही ब्रह्म और रुद्र सम्प्रदायका संरक्षण किया। ‘सनत्कुमार’ने ब्रह्माके पाँचवे नासत्य जन्ममें श्रीनारायणसे त्रेताके प्रारम्भमें ऐकान्तिक धर्म प्राप्त किया। “सात्वत, भक्त और भागवतगणोंका सुप्राचीनत्व तथा सनातनत्व” पाद्मकल्पकी भगवदावतारावलीकी कथा शास्त्रोंमें कही गयी है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, भार्गव (परशुराम), राम, बलदेव, बुद्ध और कल्कि—ये दस विष्णु-अवतार उपास्यरूपमें ग्रहण किये गये, ऐसा विभिन्न सात्वत-श्रेणीके अनुष्ठानसमूह पुराण, महाभारतादि प्रमुख ग्रन्थोंमें लिपिबद्ध देखा जाता है। यद्यपि ये सभी शास्त्रग्रन्थ देवभाषा संस्कृतमें रचित हैं, तथापि पूर्व युगोंके सात्वतधर्मकी कथा इङ्गितसे और कुछ परिमाणमें ही वर्णित हुई है, ऐसा देखनेमें आता है। भगवान्‌के दशावतारके उपासकगण ‘भक्त’, ‘भागवत’ या ‘सात्वत’ कहलाते हैं। पार्थिव विचारसे जिस स्थानपर नश्वर, परिवर्तनशील खण्डकालकी अनुभूति तथा प्राकृत खण्डित पात्रानुभूति आरम्भ होती है, उस स्थानपर भगवान्‌के दो गुणावतार (ब्रह्मा और शिव) भगवान्‌के समान गिने जाते हैं। “अश्रौत पन्थासे आवृत्त गौण दर्शन और भागवत विपर्यय धर्म” अधोक्षज विज्ञान ब्रह्माके हृदयमें सब समय प्रकटित रहनेपर भी ब्रह्माके अधीनस्थ लोगोंमें इन्द्रियज्ञान-प्रवृत्तिके वशमें होकर नाना प्रकारकी तात्कालिक प्रतीति नित्य सत्य श्रेणीमें अवैध रूपसे गणित हुई है। इसलिये ही जगत्‌में भगवद्विषयमें नाना प्रकारकी विवादमयी धारणाकी प्रवृत्ति देखी जाती है। कहींपर ग्राम्यदेवतावाद (ग्राम्य देवताओंकी पूजा), भूत-प्रेतवाद, वशीकरण, पञ्चपक्षी-साधन (ज्योतिष), पञ्चमकार-साधनके द्वारा जड़ोन्मुखी शाक्तेयमतवाद [मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन—इन पाँच मकारोंके तामसिक, राजसिक और सात्त्विक तान्त्रिक विचारोंसे विभिन्न अर्थ हैं], कहींपर सत्त्व-रजोमिश्रित गुण-प्रभावित सौरवाद तथा कहींपर सत्त्व-तमोगुणसे उत्पन्न गाणपत्यमत (गणपतिकी पूजा) के गगन-भेदी-निनाद सात्वतमतके विरोधके उद्देश्यसे प्रतिद्वन्द्विताका अभिनय दिखा रहे हैं। ब्रह्माके चित्तमें उदित अधोक्षजकी सेवा-प्रणालीकी अमर्यादा करके अन्याभिलाष-कर्म और ज्ञानके पथपर उनके अधस्तनोंने बद्धजीवोंकी चित्तवृत्तिको प्रभावित किया है। यह सब तात्कालिक उदित चित्तवृत्ति तमोगुण-सेव्य भूमिका | xv