श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुणावतार रुद्रके विक्रमसे स्तब्ध होती है। प्राकृत जगत्में निर्गुण विष्णुके रजोगुणावतार ब्रह्माके विविध अधिष्ठान उन-उन स्वभाववाले लोगोंके द्वारा कल्पित, उद्भावित और प्रकटित हुए हैं तथा वैसी राजसिक प्रवृत्ति तमोगुणमें लीन होनेसे पूर्व तक गुणमय विष्णुकी उपासना प्रपञ्चमें अपना विक्रम प्रकाशित करती है। वास्तविक रूपमें सगुण और निर्गुण उपासनाकी धारणा प्राकृत विचारमें संश्लिष्ट है।
“अभक्ति मार्ग—अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान”
प्राकृत विचारोंका अतिक्रम करके प्रपञ्चमें अवस्थित सगुण और निर्गुण उपासना भक्ति-प्रतिकूल अन्यभिलाष, कर्म और ज्ञानके आश्रयमें प्रपञ्चमें अपना-अपना प्रभाव विस्तार करती है। अप्राकृत भगवत्-सेवा निर्गुण या सगुण उपासनासे प्रापञ्चिक विकारसे विकृत होने योग्य नहीं है। तथापि हम कलिकी प्रबलता या विवादयुगकी प्रवृत्तिमें नाना प्रकारके भक्तिविरोधी मतवाद देख रहे हैं। श्रीचैतन्यदेवने जगद्गुरुके आसनपर अधिष्ठित होकर कुतार्किकोंके अनेक प्रकारके कुतर्कोंको जड़से ही नष्ट किया है।
“चार-युगोंका धर्म”
सत्ययुगके विष्णु-ध्यान, त्रेताके विष्णुयज्ञ, द्वापरकी विष्णुपरिचर्या ओर कलिका भगवन्नामकीर्तन कुतर्कग्रस्त बद्धजीवोंके भगवद्दर्शनमें और सेवा कार्योंमें विशेष रूपसे उपयोगी हैं। तथापि विष्णुमायाकी विक्षेपात्मिका और आवरणात्मिका शक्तिके प्रभावसे वास्तविक सत्यानुसरण सभीके भाग्यमें घटित नहीं हो सकता।
“भक्तिका प्राकट्य-काल”
योग्यताके अभावमें कलिहत जीवोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हुए वराहपुराणमें कहा गया है,—“कलि-प्रवृत्तिके दस हजार वर्ष तक विष्णु-उपासना जगत्में प्रबल रहेगी। उसके आधे समय तक विष्णुके पादोदककी (चरणामृतकी) महिमा जगत्में आदरणीय होगी। साधारण ग्रामवासियोंकी प्राकृत धारणासे जो सब उपास्य कल्पित होंगे, उन-उन ग्राम्यदेवताओंको भगवान् मानना ढाई हजार वर्ष तक चलता रहेगा।” किन्तु सात्वत-शास्त्र कहते हैं,—“पद्मज ब्रह्माके सातवें अधिष्ठानमें विष्णुके साथ अधिकारिक देवताओंके साम्य-प्रयासकी वासना ढाई हजार वर्ष तक कर्मराज्यके पथिकोंमें भ्रम उत्पादन करेगी। विष्णु-पादोदकमें साधारण जलबुद्धि पाँच हजार कल्यब्द तक चलती रहेगी। और दस हजार वर्ष तक विष्णुको अन्य देवताओंके साथ समान मानकर अमङ्गल-पथके पथिक उसे ध्रुवसत्य मानकर ग्रहण करेंगे।”
xvi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत