श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“असंख्य दोषोंके मूल कलियुगका अपूर्व महागुण” सात्वतशास्त्र कहते हैं,—कलियुगके सैकड़ों दोष रहनेपर भी एक महान गुण यह है कि गौरविहित कीर्तन-श्रवणसे जीवोंको प्राकृत बुद्धिसे मुक्ति प्राप्त होती है। कर्म और ज्ञान-काण्डीय विचारकोंके सङ्कीर्ण विचारोंसे श्रीकृष्णकीर्तनके प्रभावसे ही कलिजीवोंको नाना मतवादोंसे मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिये श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखकने ग्रन्थके प्रारम्भके दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्यदेवके अलौकिक और सर्वव्यापी अनुग्रहकी बातका उच्चस्वरसे कीर्तन करते हुए प्रचार किया है। “आनुगत्य-माहात्म्य” दुःसङ्गरूप कुसिद्धान्तके हाथसे एकमात्र श्रीचैतन्यदेवके अनुगतजन ही मुक्त होनेमें समर्थ हैं। श्रीचैतन्य-कृपासे वञ्चित लोग कुसिद्धान्तके गड्ढेमें कुँएके मेंढकके समान विचारसे प्रापञ्चिक दर्शनमें आबद्ध रहेंगे। वे किसी भी समय अधोक्षजकी सेवामें नियुक्त होनेका अधिकार नहीं पायेंगे। “श्रीचैतन्यदेवकी अमन्दोदया-दया” जो हरिसेवाविमुख होकर कुसिद्धान्तको भक्तिसिद्धान्तके समान मानते हैं, उनके सङ्गसे जीवोंको छुड़ाकर सेवोन्मुख करनेके लिये ही श्रीचैतन्यदेवने प्रपञ्चमें लीला प्रकटकी है। “नाना प्रकारके मतरूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त संसार” श्रीचैतन्यदेवने कितने प्रकारके हरिविमुख सम्प्रदायोंकी चित्तवृत्तिकी व्याधिको दूर किया है, उसकी एक संक्षिप्त तालिका नीचे दी जा रही है:— (१) वेदविद्वेषी अन्याभिलाषी आध्यक्षिक गुणोपासक नास्तिक चार्वाक। (२) क्षणिकवादी गुणोपासक नास्तिक तार्किक बौद्ध। (३) स्यात्वादी गुणोपासक जैन तार्किक अर्हत्। (४) निरीश्वर निर्गुणात्मवादी तार्किक सांख्य। (५) सेश्वर निर्गुणात्मवादी तार्किक पातञ्जल। (६) समन्वयवादी श्रौतब्रुव केवलाद्वैतविचारपर हरिविमुख शाङ्कर। (७) पदार्थवादी श्रौतब्रुव सगुणोपासक वैयाकरण। भूमिका | xvii