श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(८) वाक्यार्थवेदी श्रौतब्रुव सगुणोपासक मीमांसक। (९) उत्पत्ति-साधनादृष्टवादी शब्द-प्रमाणान्तर अङ्गीकारी सगुणोपासक नैयायिक। (१०) उत्पत्ति-साधनादृष्टवादी शब्द-प्रमाणान्तर अनङ्गीकारी सगुणोपासक वैशेषिक। (११) निरस्ततर्क शैव भोग-साधनादृष्टवादी जीवन्मुक्त विचारपर सगुणोपासक सेश्वर। (१२) भोगसाधनदृष्टवादी विदेहमुक्तिवादी आत्मैक्यवादी सगुणोपासक प्रत्यभिज्ञ। (१३) भोगसाधनादृष्टवादी आत्मभेदवादी विदेहमुक्तिवादी कर्मानपेक्ष ईश्वरवादी सगुणोपासक नकुलीश-पाशुपत शैव-सम्प्रदाय। (१४) भोगसाधनादृष्टवादी विदेहमुक्तिवादी आत्मभेदवादी कर्मसापेक्ष ईश्वरवादी सगुणोपासक शैव-सम्प्रदाय। “वर्णाश्रमी-गुरु परमहंस अथवा वैष्णव-पूजा रूपी कर्त्तव्यता” श्रीचैतन्यलीलाके लेखक परमहंसलीलाभिनयकारी श्रील कविराज गोस्वामी प्रभुने “नानामतग्राहग्रस्तान दाक्षिणात्यजनद्विपान्। कृपारिणा विमुच्यैतान् गौरश्चक्रे स वैष्णवान्॥' श्लोकके द्वारा प्रापञ्चिक तर्कपन्थियोंको श्रीव्यासका आनुगत्य प्राप्त करनेके लिये परामर्श दिया है। त्रिदण्डिपाद श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती आश्रमीके वेशमें उस पारमहंस्य-धर्मको ग्रहण करनेके लिये दैववर्णाश्रमियोंके जगत् उपदेशक हुए हैं। उनकी विजय-वैजयन्ती-वहन करते हुए श्रीचैतन्याश्रित प्रचारक-सम्प्रदायको श्रीरूपानुग कहनेपर किसीको भी विरोध उपस्थित न हो,—यही मेरी सकातर प्रार्थना है। “परमहंस वैष्णव अथवा उनके दासोंके प्राकृत दर्शनमें निषिद्धता” बाह्य प्रापञ्चिक धारणाके वशीभूत हो परमहंसानुगत वैष्णवदासानुदासोंका आनुष्ठानिक क्रियाकलाप किसीके भी सत्यदर्शनमें बाधा न दे। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रकाशित साधनतत्त्व-अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञानसे आबद्ध नहीं है, किन्तु न्यूनाधिक रूपमें सभी सम्प्रदायोंमें ही इसका साधनरूपमें बहुत आदर है। “ग्रन्थकारका जगद्गुरुत्व या वैष्णवाचार्यत्व” अन्यभिलाषीका ऐहिक (सांसारिक) फल लाभ, कर्मीका पारलौकिक (उच्च लोकोंमें) नश्वर फल लाभ, निर्भेद ब्रह्मके अनुसन्धानके द्वारा ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृत्व-भावके लिये स्वरूप-विनाशचेष्टा आदि साध्यवस्तुओंकी भगवत्-प्रेमके साथ तुलना नहीं की जा सकती। जिनके लिये भगवत्-प्रेम साध्य-वस्तुरूपमें नित्यकाल होनेके स्थानपर परिवर्तनशील प्रतीत होता है, उनका साध्यविचार प्रापञ्चिक या औपाधिक अज्ञानकी श्रेणीका ही है। इस साध्य-साधन xviii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत