श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविचारकी बात ही पारमहंस्य-सम्प्रदायके पूर्वगुरु श्रीकविराज गोस्वामीने अपने उपास्यवस्तु श्रीचैतन्यचरितामृत-लीला-विग्रहमें सुष्ठु रूपसे लिपिबद्ध की है। “ब्रह्मसूत्रभाष्य-श्रीभागवतवेद्य अचिन्त्य-भेदाभेद सत्य-संस्थापनके द्वारा चारों सात्वत-सम्प्रदायोंकी सम्पूर्णता और सौष्ठव सम्पादन” श्रीगौरसुन्दरने तत्त्ववादी-शाखास्थित एकदण्डियोंके साथ जिस तत्त्ववादशाखाकी असम्पूर्णता प्रदर्शितकी है, वह श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थमें सुष्ठुरूपसे लिपिबद्ध है। दक्षिण भारतमें परिभ्रमणके समय श्रीलक्ष्मणदेशिक क्षेत्रमें अवस्थित मूलकेन्द्र श्रीरङ्गक्षेत्रमें विशिष्टाद्वैतवादको सम्पूर्ण करनेके उद्देश्यसे श्रीगौरसुन्दरने जो सब कथाएँ अपनी लीलार्मे गौड़ीय भक्तोंके साधनको सुचारु बनानेके लिये प्रकटित की थीं, उनका भी श्रीचैतन्यचरितामृतमें स्थान-स्थानपर उल्लेख हुआ है। श्रीनियमानन्द मुनिके 'पारिजात', 'दशश्लोकी' आदि ग्रन्थोंमें जो सब अभाव उनके अनुगत सम्प्रदायमें कृष्णभजनके बाधारूपमें परिगणित होते थे, वे सब अभाव काश्मीरदेशके केशवाचार्यके साथ विचारके समय श्रीगौरकृष्णने परिपूर्ण किये थे। बौद्धमतवाद-विनाशक पाण्ड्यदेशीय सर्वज्ञ आदि-विष्णुस्वामीके अधस्तन श्रीधरस्वामीको 'भक्त्यैकरक्षक'-रूपमें दर्शन करके श्रीगौरसुन्दरने उनके सम्प्रदायके अभावको पूर्ण किया है। श्रीनृसिंह उपासनाके अन्दर श्रीकृष्णोपासनाका सौन्दर्य प्रकाशित कराकर द्वितीय विष्णुस्वामी काञ्ची निवासी बाल-गोपाल त्रिदण्डीस्वामी और उनके अनुगत श्रीबिल्वमङ्गलके श्रीकृष्णकर्णामृतके भावसमूहको सम्वर्द्धित किया है। इन्हीं बालगोपालने काञ्चीश्वर और द्वारकेशकी स्थापना की थी, यह बात द्वितीय विष्णुस्वामी-सम्प्रदायमें प्रचलित थी, बादमें श्रीरामानुजाचार्यके प्रभाव बढ़नेसे वे काञ्चीश्वर ही राजगोपाल या वरदराजके नामसे प्रसिद्ध हुए। तृतीय आन्ध्रविष्णुस्वामी-सम्प्रदायके शिष्य-वंश-परम्परामें उदित श्रीवल्लभाचार्य-रचित 'सुबोधिनी' टीकामें जो सब अभाव थे, उनके परिपूर्णकी लीला भी श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थमें सब प्रकारसे उदाहृत है। “उपसंहार” श्रीचैतन्यदेवने जो अति-उन्नत श्रीकृष्णभजन-प्रणाली अपने अनुगत गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदायमें प्रदानकी है, उसको देखकर बहुत लोग ही चारों साम्प्रदायिक-आचार्योंसे श्रीगौरसुन्दरके मतभेदको लक्ष्य करके उनको स्वतन्त्र विचारमय सम्प्रदाय-प्रवर्त्तक कहते हैं। वास्तविक रूपमें श्रीगौरसुन्दर केवल आचार्यमात्र ही नहीं हैं, वे चारों आचार्योंके सिद्धान्तोंके अभावोंके परिपूरण-कर्त्ता भी हैं। वे स्वयंरूप भगवत्-वस्तु हैं, इसलिये केवलाद्वैतवादके विचारदौर्बल्यको (विचारकी कमियोंको) प्रदर्शन करना उनमें दोषरूपमें दिखायी नहीं देता। अचिन्त्य-भेदाभेदवाद ही श्रीकृष्णने ब्रह्माके हृदयमें प्रकाशित किया था। श्रीचैतन्यचरित-लेखनमें अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दनकी भूमिका | xix