भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2016, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2016

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर पण्डितको चुनना, श्रीविदुरके समान श्रीशङ्करकी सेवाका सादृश्य, श्रीशङ्करकी महाप्रभुकी सेवा, महाप्रभुका जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें गमन और अन्तर्दशामें कृष्ण-अन्वेषणकी लीला, श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुकी बाह्यदशा, भ्रमरगीतमें श्रीराधाके प्रलाप एवं महिषीगीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पोक्ति। बीसवाँ अध्याय— 475-504 पुरीमें निरन्तर विप्रलम्भ भावमें व्याकुल महाप्रभु, परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग दो नित्यसङ्गी, महाप्रभुमें आठ सात्त्विक और तैंतीस व्यभिचारी भावोंका उदय, स्वयं और दोनों भक्तोंके साथ उन-उन भावोद्दीपक श्लोकोंका पाठ एवं श्रवण, महाप्रभुका श्रीनामकीर्तन-माहात्म्यका वर्णन, कृष्णकीर्तनकारी ही एकमात्र सुबुद्धिमान्, नामाभास एवं शुद्धनामका फल—अनर्थ-निवृत्ति और कृष्णप्रेमोदय, महाप्रभुके मुखसे निःसृत शिक्षाष्टक और उसकी व्याख्या, कोढ़ग्रस्त ब्राह्मणकी पत्नीके पातिव्रत्य-धर्मका वर्णन, महाप्रभु स्वयं ही शिक्षाष्टकके आस्वादक और स्वयं ही उसके प्रचारक, श्रीशिक्षाष्टक श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति, अन्तिम बारह वर्षोंमें अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमास्वादन, ग्रन्थका आकार बढ़नेके भयसे ग्रन्थकारका महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विराम। ग्रन्थकारका ठाकुर वृन्दावनके माहात्म्यका वर्णन एवं नाना प्रकारसे अपने दैन्यका ज्ञापन, ग्रन्थकारके उपास्य विग्रहगण और श्रीमदनमोहनकी कृपा प्राप्तिरूपी सुसौभाग्यका ज्ञापन, भागवतमें व्यासदेवकी रीतिके अनुसार अन्त्यलीलाके अध्यायोंकी संक्षेपमें पुनरावृत्ति, अनुवाद (संक्षिप्त वर्णन), पुनः आलोचन या पुनरावृत्ति फलसे ही लीलास्मरणोदय, गौड़ियोंके नाथ एवं ग्रन्थकारके द्वारा श्रीहरि-गुरु-वैष्णवोंकी चरण-वन्दना करते हुए ग्रन्थकी समाप्ति और ग्रन्थसमाप्तिके कालका निर्देश।