श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2015, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय-विवरण महाप्रभुका महाप्रसाद ग्रहण और सात्त्विक-विकार, किन्तु ऐश्वर्यमिश्रित श्रीजगन्नाथके सेवकोंके दर्शनसे उसका सङ्कोपन, महाप्रभुका फेलामृत-माहात्म्य और चिद्बलका वर्णन एवं सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ प्रसादका सम्मान करनेका आदेश, श्रीरामानन्दका महाप्रभुकी आज्ञासे श्लोकका पाठ, महाप्रभुकी उत्कण्ठा और श्रीकृष्णाधरामृतके चिद्बल एवं परम महिमाका कीर्तन, महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद। सतरहवाँ अध्याय— 419-430 महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप, महाप्रभुके नित्यसङ्गी श्रीस्वरूपका गान और श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ, बीच-बीचमें स्वयं श्रीमहाप्रभुका श्लोक पाठ, महाप्रभुका उच्चनाम-सङ्कीर्तन, महाप्रभुका दिव्योन्माद, बन्द द्वार कमरेके मध्यसे ही महाप्रभुकी वहाँ अप्राप्ति, सभीके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और तैलङ्गी गायोंके बीचमें महाप्रभुकी प्राप्ति, महाप्रभुकी कूर्माकार अवस्था, उच्च सङ्कीर्तनसे महाप्रभुका चेतन और अर्धबाह्य-दशामें आगमन, श्रीस्वरूपको महाप्रभुका अपनी अवस्थाका वर्णन, महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्लोक-पाठ और महाप्रभुका श्लोकके अर्थका वर्णन, भावशाबल्य, पिङ्गलाके वचनकी स्मृति, शाखा-चन्द्र-न्याय, महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव— मर्त्यबुद्धिसे अगोचर, श्रीचैतन्यभजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति। अठारहवाँ अध्याय— 431-448 शारदीय ज्योत्स्ना रात्रिमें महाप्रभुका रासलीलाका उद्दीपन, समस्त रासपञ्चाध्यायका पाठ और व्याख्यामें महाप्रभुको एक साथ हर्ष और विषाद, भक्तप्रेमनिर्धारण और आस्वादन-परिमाणके लिये श्रीकृष्णका भक्तभाव स्वीकार, श्रीकृष्णप्रेमका अद्भुत विक्रम, चित्-परमाणुकण जीवका अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुके बिन्दुमात्र स्पर्शमें ही अधिकार, श्रीस्वरूप-रामानन्दादि कृष्ण-शक्तिवर्गका ही महाप्रभुके भावोंकी अनुभूतिमें अधिकार, गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी जलकेलि-श्लोकपाठ और महाप्रभुकी मूर्च्छा, यमुना जानकर समुद्रमें महाप्रभुका कूदना और मूर्च्छा, मूर्च्छित अवस्थामें ही तैरते हुए कोणार्ककी ओर गमन, भक्तोंका उनको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते समुद्रके तटपर गमन और महाप्रभुके न मिलनेसे उनके अन्तर्धान होनेका अनुमान, प्रियके हृदयमें प्रियके अदर्शनसे अमङ्गलकी आशङ्का, मछुआरेके साथ साक्षात्कार और मछुआरेके वाक्यसे महाप्रभुके सन्धान-प्राप्ति विषयमें श्रीस्वरूपका यथार्थ अनुमान, श्रीनृसिंहके स्मरणसे समस्त विपद्-विनाश, मछुआरेके साथ भक्तोंका महाप्रभुके निकट गमन और उन्हें चेतन करनेके लिये महाप्रभुकी सेवा, सभीके द्वारा उच्च सङ्कीर्तन और महाप्रभुका अर्धबाह्यदशामें आगमन, महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय, अर्धबाह्यदशामें महाप्रभुका चित्रजल्प, अर्धबाह्यसे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन एवं श्रीस्वरूपादिके निकट अपने वृत्तान्तका वर्णन। उन्नीसवाँ अध्याय— 449-474 महाप्रभुका दिव्योन्माद, अपनी वात्सल्य-उक्तिके ज्ञापनके लिये महाप्रभुका श्रीजगदानन्दको नवद्वीपमें भेजना, श्रीपरमानन्दपुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके निकट वस्त्र और प्रसाद भेजना, अप्राकृत वात्सल्यप्रेमके वशमें भगवान्, श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें आगमन और श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके सन्देशका ज्ञापन, श्रीपण्डितका नवद्वीपमें और शान्तिपुरमें अवस्थान करनेके बाद विदा लेनेकी याचना, श्रीअद्वैताचार्यका श्रीपण्डितके द्वारा महाप्रभुके पास एक पहेली भेजना, श्रीपण्डितका पुरीमें जाकर महाप्रभुको पहेली-ज्ञापन और महाप्रभुका थोड़ासा मुस्कुरानेके बाद मौनका अवलम्बन, श्रीस्वरूपके अनुरोधसे महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत, महायोगेश्वर श्रीअद्वैत प्रभु, भक्तोंका विस्मय और श्रीस्वरूपको उद्वेग, महाप्रभुकी कृष्णविरह-दशाकी वृद्धि, उद्घूर्णा और प्रलाप, महाप्रभुका नामकीर्तनमें रात्रि व्यतीत करना, महाप्रभुका दीवारोंसे मुख-घर्षणरूपी दिव्योन्माद, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणोंके