भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2014, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2014

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला श्रीरूपगोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ एवं श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर निर्माण आदि। चौदहवाँ अध्याय— 349-374 महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़ दिव्योन्माद, महाप्रभुकी कृपाके बिना महाप्रभुके दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता, श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथदास—इन दो प्रभुओंके कड़चा ही श्रीगौरलीला-वर्णनके मूलग्रन्थ, श्रीस्वरूप-सूत्रकर्त्ता, श्रीरघुनाथ—वृत्तिकार, (चौदहवें अध्यायसे बीसवें अध्याय तक) सर्वत्र 'गौरनागर'-वादका खण्डन, महाप्रभुका अधिरूढ़ महाभावमें दिव्योन्माद, अभ्याससे ही नित्यकृत्य- सम्पादन, उड़िया स्त्रीकी श्रीजगन्नाथ-दर्शनमें आर्त्ति, अक्षजज्ञानसे कृष्ण-सेवकको स्त्री-पुरुषादि बाह्य परिचयसे दर्शननिषेध—शिक्षादान, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, दस-दशा, समस्त रात्रि जागकर महाप्रभुका उच्चःस्वरसे नामसङ्कीर्तन, तीनों द्वार बन्द, तथापि कमरेके भीतर महाप्रभुकी अप्राप्ति, महाप्रभुकी सिंहद्वारपर अचेतन अवस्थामें प्राप्ति, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कानोंमें कृष्णनामका उच्चारण और महाप्रभुकी बाह्यदशाका आना, महाप्रभुका गोवर्धन जानकर चटक-पर्वतकी ओर दौड़ना, श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना, मार्गमें स्तम्भादि विकार और भूमिपर गिरना, सबके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दके द्वारा उनपर जल छिड़कना, महाप्रभुकी अर्धबाह्यदशा, श्रीपुरी और श्रीभारतीके दर्शनसे महाप्रभुकी बाह्यदशा और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीका श्रीचैतन्यस्तव- कल्पवृक्ष ग्रन्थ। पन्द्रहवाँ अध्याय— 375-392 अप्राकृत कृष्णविरह-प्रेमावेशमें महाप्रभुका अचेतन होना, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, स्वभाव और अभ्यासके द्वारा ही नित्य कृत्यादि, महाप्रभुका श्रीजगन्नाथमें साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दनका दर्शन, महाप्रभुकी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीगोविन्द-सेवाकी शिक्षा, उपभोगके बाद भक्तोंका महाप्रभुको घरमें लाना और महाप्रभुका विलाप, गोपियोंके द्वारा अप्राकृत पुष्पबाणके माधुर्यबलका वर्णन, महाप्रभुका श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्दके गलेमें हाथ डालकर विलाप, महाप्रभुका सर्वत्र कृष्णलीलाका दर्शन और उनको ढूँढ़नेकी लीला-प्रसङ्गमें पुष्पोद्यानमें कृष्ण-अन्वेषण-लीलाका वर्णन, श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ और श्रीस्वरूपका गीत गोविन्दका गान, महाप्रभुका प्रेमावेशमें नृत्यादि। सोलहवाँ अध्याय— 393-418 गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदासका श्रीक्षेत्रमें आगमन, श्रीकालिदासके गुण, पूर्व-परिचय, महाप्रसादमें विश्वास और वैष्णवमें जातिबुद्धिका न होना, श्रीकालिदास और झडुठाकुरका वृत्तान्त, श्रीकालिदासका वैष्णव-माहात्म्य-सूचक श्लोकका पाठ, कृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय, कृष्णभक्त स्वयं अमानी और सबको मान देनेवाला, झडुठाकुरके द्वारा वैष्णवोंके अनुव्रज्या (पीछे जानेका) शिक्षादान, श्रीकालिदासके द्वारा छिपकर झडुठाकुरकी पदधूलिको ग्रहण करना और उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासका गौड़देशके सभी वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुकी निष्कपट महाकृपा, लोकशिक्षक आचार्यरूपी श्रीमहाप्रभुकी कठोरता, अन्तरङ्ग भक्तोंके अतिरिक्त अन्योंका महाप्रभुके चरणामृतमें अनाधिकार, श्रीकालिदासका महाप्रभुके चरणामृतका पान, महाप्रभुका श्रीनृसिंह-प्रणाम, श्रीकालिदासको महाप्रभुकी इच्छासे श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुका उच्छिष्ट-दान, वैष्णव-प्रसादसे ही कृष्णकृपाकी प्राप्ति, श्रीकृष्ण-उच्छिष्ट और भक्तोंके उच्छिष्टकी संज्ञा, साधकके 'तीन साधनके बल', पत्नी और पुत्रके साथ श्रीशिवानन्दका महाप्रभुका दर्शन करना, पुरीदासका मौन रहना और श्रीस्वरूपके द्वारा उसके तात्पर्यकी व्याख्या, सात वर्षके शिशु पुरीदासके द्वारा श्लोक-रचना, चातुर्मासके अन्तमें भक्तोंका गौड़में जाना और श्रीमहाप्रभुका दिव्योन्माद, द्वारपालको श्रीकृष्णके दर्शन करानेके लिये अनुरोध, द्वारपालका महाप्रभुका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथके सामने लाना और महाप्रभुका श्यामसुन्दर दर्शन, गोपालवल्लभ-भोग,