भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2013, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2013

अध्याय–विवरण

[बायाँ स्तम्भ]

मन्दिरमें आगमन, स्वयं महाप्रभुके द्वारा प्रसादकी भिक्षा, निर्याण-महामहोत्सव, उत्सवमें जिस किसी प्रकारसे योगदान देनेवालेको 'कृष्णप्राप्ति'के वरकी प्राप्ति। श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन और जयगान। बारहवाँ अध्याय— 305–322 महाप्रभुके प्रेमविकार, प्रतिवर्षकी भाँति गौड़ीय भक्तोंकी सपरिवार महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरी-यात्रा, श्रीशिवानन्द सेनका कर देनेका समाधान, महाप्रभुके मना करनेपर भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा, श्रीशिवानन्दके नित्यानन्द-पदाघात सौभाग्यका वर्णन, श्रीकान्तका अभिमान और सबसे पहले महाप्रभुके निकट आगमन, श्रीगोविन्दका श्रीकान्तको भगवद्विग्रहके विषयमें मर्यादा-विधिका उपदेश, अन्तर्यामी महाप्रभुका श्रीकान्तके मनोभावका ज्ञापन, श्रीकान्तका महाप्रभुसे पदाघात-संवादको गोपन रखना, पुत्रसहित श्रीशिवानन्दपर महाप्रभुकी कृपा, परमानन्द या पुरीदासका महाप्रभुके चरणोंके अँगूठेको चूसना, परमेश्वर मोदकका वृत्तान्त और उसके प्रति महाप्रभुकी कृपा, स्त्रियोंका नाम श्रवण करनेसे ही जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुका सङ्कोच-बोध, गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य, भक्तोंके साथ चातुर्मास्य-यापन, भक्तके दुःखमें भगवान्का दुःख, भक्तोंको सांत्वना और विदायी-दान, श्रीनित्यानन्दको गौड़में ही रहनेका आदेश, श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें शचीमाताके पास गमन और महाप्रभुके द्वारा दिये गये द्रव्यादिको प्रदान करना, श्रीजगदानन्दसे शचीमाताका निमाइकी कथाका श्रवण, श्रीजगदानन्दका चन्दनादि-तेलका संग्रह, पुरीमें जाकर महाप्रभुको प्रदान करना, महाप्रभुकी तेल-व्यवहार अस्वीकारकी उक्तिसे श्रीजगदानन्दका प्रणयाभिमान-रोष, तेलपात्रका भञ्जन और उपवासादि, महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दके कोपकी शान्ति और इस प्रसङ्गसे महाप्रभुका लोकशिक्षा दान। तेरहवाँ अध्याय— 323–348 महाप्रभुका केलेकी छालपर शयन, इससे


[दायाँ स्तम्भ]

श्रीजगदानन्दके मनमें कष्ट और तकिये एवं गद्देका निर्माण, महाप्रभुके द्वारा उसे अस्वीकार करना और श्रीस्वरूपके द्वारा केलेके छिलकेसे निर्मित शय्याको स्वीकार करना, श्रीजगदानन्दके मनमें दुःख, श्रीजगदानन्दकी वृन्दावन गमन-इच्छाका प्रकाश और महाप्रभुकी अनुमतिकी प्राप्ति, श्रीजगदानन्दको महाप्रभुके द्वारा पथके विषयमें और ऐश्वर्यज्ञानहीन रागमार्गीय भक्तसङ्गके विषयमें सतर्क करना एवं सदा श्रीसनातनके साथमें रहनेका उपदेश देना, श्रीसनातनको महाप्रभुके आगमनका संवाद बतलाने और उनके लिये भजन-स्थानके निर्वाचन करनेका आदेश, श्रीजगदानन्द पण्डितका काशीसे होकर मथुरामैं आगमन और श्रीसनातनके साथ मिलन, दोनोंका एक ही स्थानपर रहना, किन्तु पृथक् अभ्यासके कारण पृथक् भोजन ग्रहण करना, सबको मान देनेवाले श्रीसनातनके द्वारा श्रीपण्डितकी सेवा, श्रीसनातनके मस्तकपर लाल वस्त्र देखकर पहले श्रीपण्डितको सन्तोष, बादमें वस्त्र प्राप्तिका कारण जानकर श्रीसनातनके प्रति क्रोध और उन्हें मारनेकी चेष्टा, इसे देखकर श्रीसनातनका सन्तोष, रागमार्गीय परमहंसका कषाय-वस्त्र पहनना निषिद्ध, श्रीजगदानन्दकी पुरीयात्रा और महाप्रभुके लिये श्रीसनातनके द्वारा प्रदान किये गये द्रव्यादि ग्रहण, श्रीसनातनका महाप्रभुके लिये स्थान निर्वाचन और संस्कार-साधन, श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके साथ मिलन और श्रीसनातनके द्वारा दी गयी भेंट प्रदान करना, पीलूफल भोजनलीला, देवदासीके गानके श्रवणसे महाप्रभुका आवेश और श्रीगोविन्दका महाप्रभुको सावधान करना, 'गौरनागरवाद'-निवारण, श्रीरघुनाथ भट्टगोस्वामीका वृत्तान्त, रामानन्दी सम्प्रदायके अन्तर्गत रामदास विश्वासकी कथा, श्रीभट्टके प्रति महाप्रभुकी कृपा, रामदासके प्रति महाप्रभुकी उदासीनता और उसका कारण, श्रीभट्टके प्रति महाप्रभुका आदेश, माता-पिताके धाम प्राप्ति तक श्रीभट्टको काशीमें ही रहनेका आदेश, उसके बादमें पुरी गमन और महाप्रभुके आदेशसे वृन्दावन गमन, महाप्रभुका भट्टको तुलसी माल्यादि प्रदान करना, श्रीभट्टका वृन्दावनमें