श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2012, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला नौवाँ अध्याय— 251-270 मनुष्य वेशमें देवताओंका महाप्रभुका दर्शन, श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको राजदण्डसे छुटकारा दिलवानेके लिये लोगोंकी महाप्रभुसे प्रार्थना, महाप्रभुकी निरपेक्षता और गोपीनाथका तिरस्कार, गोपीनाथका दण्डमोचन, महाप्रभुकी विषयकथामें अनिच्छाका ज्ञापन और अलालनाथ जानेकी इच्छा, लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुकी कठोर निरपेक्षता, श्रीकाशीमिश्रका महाप्रभुको आश्वासन, जड़ेन्द्रिय-तर्पणके लिये विष्णुभजनकी चेष्टा मूर्खता, प्रभुके प्रीतिकामी निष्किञ्चन शुद्धभक्तगण, गोपीनाथ सकाम व्यापारी नहीं, गोपीनाथके प्राणदण्डके आयोजनको देखकर उनके हितैषियोंकी महाप्रभुसे कृपा-याचना, शुद्धभक्तकी संज्ञा और आचार-व्यवहार, श्रीप्रतापरुद्रके द्वारा अपने गुरु श्रीकाशीमिश्रकी नित्य चरण दबानेकी सेवा, राजासे श्रीमिश्रका गोपीनाथ-वृत्तान्त वर्णन करना और महाप्रभुके अलालनाथ जानेकी इच्छा बताना, पुरीमें महाप्रभुके अवस्थानके उद्देश्यसे राजाकी सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा और गोपीनाथको पुनः राजसम्मान प्रदान, पाँचों पुत्रोंके साथ श्रीभवानन्दकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति, श्रीगौरस्मरणका मुख्यफल—'गौर-प्रीति' और गौणफल—'विषय-सुख' और गोपीनाथके प्रति महाप्रभुका उपदेश। दसवाँ अध्याय— 271-290 भक्तोंका नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शनके लिये गमन, दमयन्तीके द्वारा प्रदान की गयी झालीके साथ श्रीराघवका महाप्रभुके पास गमन और श्रीगोविन्दको झालीका समर्पण करना, श्रीराघवकी झालीका विवरण, श्रीराघव और दमयन्तीकी महाप्रभुके प्रति प्रगाढ़ प्रीति, भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नरेन्द्र-सरोवरमें जलक्रीड़ा, सात सम्प्रदायोंमें बेड़ा-सङ्कीर्तनका वर्णन, महाप्रभुका परिमुण्डा-नृत्य, महाप्रभुके द्वारा महैश्वर्यका प्रकाश, रानियोंके साथ राजाका सङ्कीर्तन दर्शन, गम्भीरामें श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुका पाद-सम्वहन, महाप्रभुके शरीरके ऊपर बर्हिवास देकर श्रीगोविन्दका महाप्रभुको पार करना और पाद-सम्वहनादिकी सेवा, श्रीगौरकृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छा ही सेवकका एकमात्र लक्ष्य, भक्तोंके साथ महाप्रभुका गुण्डिचा-मार्जन, महाप्रभुका भक्तोंके द्वारा प्रदान किये गये नानारूप नैवेद्यका भोजन, महाप्रभुका भक्तोंके साथ चातुर्मास्य-यापन, महाप्रभुके प्रिय अनेक प्रकारके व्यञ्जन, सब भक्तोंका महाप्रभुको निमन्त्रण, श्रीशिवानन्दके पुत्रका निमन्त्रण, श्रीशिवानन्दके बड़े पुत्र चैतन्यदासके प्रति महाप्रभुकी कृपाका वर्णन, गौड़ीय भक्तोंका गौड़में गमन और पुरीवासियोंका पुरीमें ही अवस्थान। ग्यारहवाँ अध्याय— 291-304 श्रीहरिदास-निर्याण-वर्णन-प्रसङ्ग, महाप्रभुका कृष्ण विरहमें काल-यापन, अप्राकृत विप्रलम्भ-लीलामें महाप्रभुके दो नित्य सङ्गी, श्रीगोविन्दका श्रीहरिदास ठाकुरको प्रसाद देनेके लिये जाना, श्रीठाकुरके अप्रकट कालकी अवस्था, श्रीठाकुरके साथ महाप्रभुका साक्षात्कार और श्रीठाकुरके कुशलकी जिज्ञासा, संख्या-नामकीर्तनके अभावसे जनित अपने दुःखको बतलानेपर महाप्रभुका सिद्धदेह श्रीठाकुरको साधन-अभिनय कम करनेका आदेश, महाप्रभुसे अपने अभिप्रायका ज्ञापन, महाप्रभुके द्वारा श्रीठाकुरकी वाञ्छाको पूर्ण करना, श्रीठाकुरके सामने भक्तोंके साथ महाप्रभुका महाकीर्तन प्रारम्भ, महाप्रभुका परमानन्दसे श्रीठाकुरके गुणोंका कीर्तन, अपने सामने महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुके नाम कीर्तनके साथ ही श्रीठाकुरका निर्याण, भीष्मकी इच्छामृत्युका स्मरण, श्रीठाकुरकी देहको गोदमें लेकर महाप्रभुका नृत्य, श्रीठाकुरको समुद्रमें लाना और समुद्रमें स्नान कराना, समुद्रका महातीर्थ हो जाना, भक्तगणोंका श्रीठाकुरके चरणामृतका पान, कीर्तनके साथ ही समाधि प्रदान करनेकी रीति, महाप्रभुका अपने श्रीहस्तसे श्रीठाकुरको समाधिस्थ करना, समाधि-पीठका निर्माण, भक्तोंके साथ कीर्तन-नृत्यके अन्तमें समुद्र स्नानके बाद समाधि-पीठकी प्रदक्षिणा करके श्रीजगन्नाथ