भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2011, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2011

अध्याय-विवरण सेवकोंको भेजना, श्रीरघुनाथका धन आदिको अस्वीकार करना, और बादमें महाप्रभुको निमन्त्रणके लिये उसमें-से कुछ अंशको स्वीकार करना, दो वर्षोंके बाद महाप्रभुके निमन्त्रण कार्यका भी त्याग, विषयीके अन्नके प्रति महाप्रभुके वचन, श्रीरघुनाथके द्वारा सिंहद्वारका भी त्याग और माधुकरी भिक्षा स्वीकार करनेका वर्णन, श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा गोवर्धनकी शिला और गुञ्जामाला प्रदान करना, महाप्रभुका श्रीरघुनाथको शिला-पूजाकी प्रणाली बतलाना, श्रीरघुनाथके शिलामें व्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन, श्रीरघुनाथका सब समय कृष्णभजन, छह वेगोंको जय करनेवाले श्रीरघुनाथका जीवन-निर्वाहके लिये जितना आवश्यक उतना ही ग्रहण करना और श्रीरघुनाथके द्वारा 'सड़ा' प्रसाद-चावल ग्रहण करना। सातवाँ अध्याय— 209-234 श्रीवल्लभ भट्टके साथ महाप्रभुका मिलन, श्रीभट्टके द्वारा 'युगधर्म-प्रचारक' आदि कहकर महाप्रभुकी स्तुति, महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टको श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीराम force? -> श्रीरामानन्द राय, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीहरिदास ठाकुर आदि भक्तोंकी महिमाका गान करना, श्रीभट्टका विस्मय और गर्वनाश, श्रीभट्टकी भक्तोंके दर्शनकी इच्छा और भक्तोंके सहित महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान, भक्त-संन्यासियोंका एक पंक्तिमें बैठना, रथयात्रा कालमें सात-सम्प्रदायोंमें सात कीर्तनकारी और चौदह मृदङ्ग, कीर्तनके बीचमें महाप्रभुका अलातचक्रकी भाँति भ्रमण, श्रीभट्टका विस्मय, महाप्रभुसे श्रीभट्टकी स्वरचित भागवत-टीका श्रवण करनेका आवेदन, महाप्रभुकी उसमें उदासीनता, श्रीभट्टकी कृष्णनामकी व्याख्या प्रकाश करनेकी इच्छा और महाप्रभुकी उसमें असम्मति, पण्डित गोस्वामीकी अनिच्छा होनेपर भी श्रीभट्टका उनके निकट कृष्णनाम-व्याख्याका पाठ करना, श्रीअद्वैताचार्य आदिके साथ श्रीभट्टका कुतर्क करना, श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीभट्टके सभी सिद्धान्तोंका खण्डन, पतिरूपी श्रीकृष्णके आदेशसे ही प्रकृतिरूपी जीवके द्वारा सदा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेकी विधि, नाम-उच्चारणके फलसे श्रीकृष्णचरणकमलोंमें प्रेमका उदय होना, प्रतिष्ठाका नाश होनेपर श्रीभट्टको दुःख, श्रीभट्टके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा और महाप्रभुके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा करनेवालेकी वेश्याके मध्य गणना, श्रीभट्टका गर्व चूर्ण होना और महाप्रभुके चरणोंमें शरण ग्रहण करना, महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टको श्रीधरस्वामीके आनुगत्यमें भागवत-व्याख्या और निरपराध होकर कृष्णनाम ग्रहण करनेका आदेश, सत्यभामाके अवतार श्रीजगदानन्दका वाम्य-स्वभाव, रुक्मिणीके अवतार श्रीगदाधर पण्डितका दक्षिण-स्वभाव, महाप्रभुके द्वारा श्रीगदाधरकी प्रेम-परीक्षा और श्रीगदाधरका भय, महाप्रभुका 'गदाधर-प्राणनाथ'-नाम, भक्तोंके द्वारा 'गदाइ-गौराङ्ग'-नामका गान, श्रीभट्टके द्वारा श्रीगदाधर पण्डितसे मन्त्र-दीक्षा प्राप्त करना। आठवाँ अध्याय— 235-250 महाप्रभुका श्रीपरमानन्द पुरी और रामचन्द्रपुरीके साथ मिलन, वैष्णव-संन्यासियोंका साम्प्रदायिक व्यवहार, श्रीजगदानन्दका भिक्षा प्रदान करना, रामचन्द्रपुरीका निन्दक स्वभाव, श्रीमाधवेन्द्रपुरीका रामचन्द्रका वर्जन और श्रीईश्वरपुरीपर कृपा, अप्राकृत विप्रलम्भ अवस्थामें श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीका अन्तर्धान होना, रामचन्द्रपुरीका स्वयं महाप्रभुको मर्त्य मानकर उनके दोषोंको ढूँढ़ना, महाप्रभुका भिक्षा सङ्कुचित करना और भक्तोंका रामचन्द्रपुरीके प्रति क्रोध, अपना निजजन जानकर श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वरको महाप्रभुके द्वारा कहीं ओर भोजनका आदेश, रामचन्द्रपुरीकी महाप्रभुको वैराग्यकी शिक्षा देनेकी धृष्टता, जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा संन्यास-धर्मकी विधिका निर्णय, अभक्त वर्ण-ब्राह्मण और पांक्तेय ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा ग्रहण करनेकी रीतिका वैशिष्ट्य, रामचन्द्रपुरीका क्षेत्रत्याग करनेपर महाप्रभुके द्वारा सङ्कोचका परित्याग, भक्तोंके आनन्दमें महाप्रभुका सन्तोष और गुरुकी उपेक्षाके फलसे जीवका विष्णु-विरोधी या पाखण्डी होना।