श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2010, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला
[चतुर्थ अध्याय - अवशिष्ट]
गोस्वामीको उस वर्ष नीलाचलमें ही रहनेकी आज्ञा, दोलयात्राके बाद श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावनमें भेजना। महाप्रभु और श्रीसनातन गोस्वामीका विच्छेद, वृन्दावनके मार्गमें महाप्रभुके लीलास्थानके दर्शनसे सनातन गोस्वामीमें प्रेमका आवेश, श्रीसनातन और श्रीरूपका वृन्दावनमें मिलन, श्रीरूपका धन-विभाग, श्रीरूप-सनातनके द्वारा गौर-आज्ञाका पालन, वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार, सेवाप्रकाश एवं ग्रन्थ-रचना आदिका कार्य, श्रीजीवका परिचय और ग्रन्थ-रचनादिका कार्य, श्रीजीवके प्रति श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और कविराज गोस्वामीके चार शिक्षागुरु। शुद्धा सरस्वतीकी श्रीकृष्णसेवा, अक्षजज्ञानी इन्द्रकी, विद्वेषी जरासन्ध और शिशुपालकी निन्दा उक्तियोंके दृष्टान्त, दारुब्रह्म और जङ्गमब्रह्मका अभेदत्व स्थापन, कविके द्वारा वैष्णवके चरणोंमें आत्मसमर्पण करनेके कारण उसे महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति, कविका संन्यास-ग्रहण और नीलाचलमें वास।
पाँचवाँ अध्याय— (139-164)
महाप्रभुसे कृष्णकथा श्रवण करनेके इच्छुक श्रीप्रद्युम्न मिश्रको महाप्रभुके द्वारा श्रीराय रामानन्दके निकट भेजना, श्रीराय रामानन्दका वृत्तान्त, श्रीमिश्रका श्रीराय रामानन्दकी सभामें जाना और पुनः लौटकर आना, महाप्रभुसे मिश्रके द्वारा श्रीराय रामानन्द-वृत्तान्तका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्द-तत्त्वका विशेष रूपमें प्रकाश, श्रीरामानन्द एकमात्र अद्वितीय अधिकारी, 'रागात्मिका' भक्तियाजी नित्यसिद्ध श्रीराय रामानन्दके निकट श्रीमिश्रको शिक्षा प्राप्त करनेके लिये महाप्रभुका पुनः भेजना, श्रीराय रामानन्दका श्रीमिश्रके निकट कृष्णकथाका कीर्तन, कृष्णकीर्तनकारी गुरुमें मर्त्यबुद्धिका निषेध, श्रीराय रामानन्दके मुखसे स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभु वक्ता, महत्-व्यक्तिका स्वभाव, जगद्गुरु श्रीगौराङ्ग महाप्रभुका लोकशिक्षा-रहस्य, प्राकृत वर्णाश्रम और पाण्डित्यादि सत्यधर्मका वक्तव्य देनेका लक्षण नहीं, पूर्व बङ्गवासी एक ब्राह्मणवेशी प्राकृत कविका दृष्टान्त, श्रीस्वरूपका क्रोध करनेके कारण—(1) श्रीविष्णुमें जीवबुद्धि नरक-जननी, (2) ईश्वरमें देह-देहीभेद माननेका अपराध ही प्रमाद; श्रीस्वरूप गोस्वामीका बङ्गदेशीय कविको वैष्णवके निकट जाकर भागवत पढ़नेका उपदेश, मूर्ख या विद्वेषीकी कृष्णनिन्दा-उक्तिके द्वारा भी
छठा अध्याय— (165-208)
विप्रलम्भ-दशामें श्रीराय रामानन्दकी कृष्णकथा और श्रीस्वरूपका गान ही महाप्रभुका जीवातु (प्राण), श्रीकृष्णके लिये जैसे सुबलसखा, महाप्रभुके लिये भी वैसे ही श्रीराय रामानन्द, श्रीराधाके लिये जैसे श्रीललिता, महाप्रभुके लिये भी वैसे ही श्रीस्वरूप-दामोदर, महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीके मिलनका प्रसङ्ग, श्रीरघुनाथके प्रति श्रीनित्यानन्दकी अहैतुकी कृपा, चिड़ा-दधि महोत्सव, श्रीनित्यानन्दकी कृपासे ही श्रीचैतन्यकी कृपाकी प्राप्ति, श्रीरघुनाथका गृहत्याग और बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें तीन दिन मात्र प्रसाद-सेवन, महाप्रभु और भक्तोंके साथ श्रीरघुनाथका मिलन, महाप्रभुके द्वारा कृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-गोवर्धनके चरित्रका कथन, नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषय-भोग न रहनेपर भी अनर्थयुक्त साधकोंके लिये महाप्रभुका उपदेश, महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथका स्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पण, महाप्रभुके तीन रघुनाथ, श्रीरघुनाथ दासका 'स्वरूपेर रघु' नाम, श्रीरघुनाथको महाप्रभुके द्वारा समुद्रमें स्नान और जगन्नाथ दर्शनका आदेश। श्रीरघुनाथकी सिंहद्वारपर अयाचक-वृत्ति, क्षेत्रमें निष्किञ्चन विरक्त भक्तके व्यवहारका वर्णन, महाप्रभुके द्वारा वैरागी या गृहत्यागीके वैध या अवैध आचारका वर्णन, श्रीस्वरूपको शिक्षागुरुरूपमें वरण करनेके लिये महाप्रभुका श्रीरघुनाथको आदेश, श्रीस्वरूप ही साध्य-साधन तत्त्वके आचार्य, महाप्रभुके द्वारा 'रागानुगा'-भक्तियाजीके आचारका वर्णन, श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके कठोर वैराग्यको श्रवण करके उनके पिताके द्वारा धन और