श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2009, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय-विवरण तीसरा अध्याय— 67-120 विधवा ब्राह्मणीके पुत्रके प्रति महाप्रभुका कृपा-स्नेह और महाप्रभुको श्रीदामोदर पण्डितका वाक्यदण्ड, श्रीदामोदरको महाप्रभुकी कृपा प्राप्ति और नवद्वीपमें शचीमाताके पास जानेका आदेश, धर्मरक्षा करनेके लिये निरपेक्षताकी आवश्यकता, श्रीदामोदरके द्वारा माताको अनेक प्रकारके संवाद भेजना, शचीमाताके घरमें महाप्रभुका आविर्भाव और भोजन-लीलाका दृष्टान्त। श्रीदामोदर पण्डितके आगे किसीकी भी स्वतन्त्रता नहीं चलती थी, चैतन्यलीला महा-गम्भीर रहस्यमयी है, महाप्रभु और श्रीहरिदास ठाकुरका संवाद, महाप्रभुका श्रीहरिदास ठाकुरके मुखसे नाम, नामाभास, नामापराधके फल और उच्च सङ्कीर्तनके माहात्म्यका कथन, श्रीहरिदास ठाकुरका बेनोपोलमें अवस्थान करनेके समयमें मायादेवीके प्रति कृपालीला तक-का संक्षिप्त विवरण, उसके मध्यमें वैष्णवके चरणाश्रय ग्रहण करनेवालेकी परमागति और वैष्णव- अपराधीके भयानक परिणामका वर्णन एवं 'रामनाम' और 'कृष्णनाम'के माहात्म्यके वैशिष्ट्यका कथन। चौथा अध्याय— 103-138 श्रीसनातन गोस्वामीका मथुरामण्डलसे होकर झारिखण्डके मार्गसे नीलाचलमें आगमन, बाहरसे देखनेपर श्रीसनातन गोस्वामीके सभी अङ्गोंमें फोड़ोंका दिखलायी देना, श्रीसनातन गोस्वामीका देहत्यागका सङ्कल्प और उनका श्रीहरिदास और महाप्रभुके साथ मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीका आलिङ्गन और उन्हें अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिका समाचार देना। श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा अनुपमकी रामनिष्ठाका वर्णन, महाप्रभुका मुरारिगुप्तकी रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन, एकान्तिक भक्त और भगवान्, एकान्तिक भक्तवात्सल्य, श्रीसनातन गोस्वामीको श्रीहरिदासके साथ रहनेकी महाप्रभुकी आज्ञा, श्रीसनातन गोस्वामीके देहत्यागके सङ्कल्पको निषेध करनेको उपलक्ष्य करके मनोधर्मसे चालित अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा कृष्णप्राप्तिके उपायकी शिक्षा देना, सिद्धकी चेष्टा साधकके लिये अनुकरणीय नहीं है, गाढ़ानुरागका वियोग असहनीय, कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश, नाम-सङ्कीर्तन ही भक्तिका सर्वश्रेष्ठ अङ्ग, अपराधशून्य होकर निरन्तर नाम-सङ्कीर्तनके फलसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति, भक्तकी देह प्रभुका अपना धन है, श्रीसनातनके द्वारा महाप्रभुके चार प्रकारके मनोऽभीष्टका सम्पादन, महाप्रभुका श्रीहरिदासको श्रीसनातनकी देहका भार-अर्पण, श्रीहरिदासका जीवको महाप्रभुके आनुगत्यका शिक्षादान, महाप्रभुका श्रीहरिदासके द्वारा नाम महिमाका प्रचार, आचार एवं प्रचार, चातुर्मास्य कालमें गौड़ीय और उड़िया भक्तोंके साथ श्रीसनातन गोस्वामीका मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीकी परीक्षा, मर्यादाकी रक्षा ही साधुका आभूषण, मर्यादा उल्लङ्घनसे इहलोक और परलोकका नाश, श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीजगदानन्द पण्डितके साथ मिलन और उनको अपने दुःखको बतलाना, श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन जानेका परामर्श देना, महाप्रभुके द्वारा प्रदत्त देश वृन्दावन ही श्रीसनातन गोस्वामीका स्थान, महाप्रभुसे श्रीसनातन गोस्वामीका अपने दुःखका निवेदन करना और श्रीजगदानन्द पण्डितके दिये गये परामर्शको बतलाना, महाप्रभुका श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति क्रोध प्रकाश करना और श्रीसनातन गोस्वामीके प्रति कृपासहित गौरव-उक्ति, अपने और श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति महाप्रभुके स्नेहकी तुलना करके श्रीसनातन गोस्वामीको दुःख और महाप्रभुका उनको सांत्वना देना, विशेष पात्रसे ही विषयकी प्रीतिका वैशिष्ट्य, वैष्णव-देह अप्राकृत, अप्राकृत राज्यमें जड़ीय विधि-निषेधका कोई विचार नहीं, महाभागवतका सर्वत्र विष्णु प्रतीतिके कारण जड़भेदसे उत्पन्न वैषम्यहीन समदर्शन, भक्त और भगवान्के मध्य परस्परका व्यवहार, वासुदेव विप्रकी घटना, दीक्षाकालमें कृष्णके चरणोंमें आत्म-समर्पणकारी भक्तका चिन्मय देह प्राप्त करना, महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शके फलसे श्रीसनातन गोस्वामीके शरीरके फोड़ोंका दूर होना, श्रीसनातन