भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2008, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2008

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला अध्याय-विवरण पहला अध्याय— 1-42 श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा गौड़में महाप्रभुके वृन्दावनसे पुरी आगमनका संवाद भेजना, सभी भक्तोंके साथ शिवानन्द सेनकी नीलाचल यात्रा। शिवानन्द सेनके द्वारा मार्गमें कर आदि देना और उनके साथमें आये कुत्तेका उपाख्यान, श्रीरूपका वृन्दावनमें आगमन और नाटककी रचना आरम्भ करना, छोटे भ्राताके साथ श्रीरूपकी गौड़यात्रा और गौड़में श्रीअनुपमकी गङ्गा-प्राप्ति, वहाँसे श्रीरूपकी पुरी यात्रा, सत्यभामापुरमें स्वप्नमें सत्यभामा देवीका उपदेश प्राप्त करना ही ललितमाधव रचनाका मूल सूत्रपात, पुरीमें ठाकुर श्रीहरिदासके वासस्थानपर श्रीरूपका आगमन, भक्तोंके साथ श्रीरूपका मिलन, महाप्रभुका कृपादेश ही विदग्धमाधवकी रचनाका मूल सूत्रपात्र, श्रीरूपके द्वारा नाटकका विभाग करना, रथके आगे नृत्यकालमें महाप्रभुके द्वारा पाठ किये गये 'यः कौमारहरः' श्लोकके अनुरूप श्रीरूपके द्वारा श्लोक लिखना, महाप्रभुके द्वारा रूपके द्वारा लिखित श्लोकको पढ़ना, महाप्रभुका श्रीस्वरूप दामोदरसे श्लोकका वृत्तान्त कहना, श्रीरूपकी लिखावटकी प्रशंसा और श्रीरूपके द्वारा 'नाम-महिमा' श्लोकका पाठ करना, श्रीरूपके गुणोंका वर्णन, श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा श्रीरूपकृत श्लोकका पाठ, महाप्रभुका श्रीराय रामानन्द और श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ श्रीरूपके नाटककी भूमिकाका श्रवण, श्रीराय रामानन्दके द्वारा श्रीरूपकृत नाटकके अङ्ग-प्रत्यङ्गादिका विचार करके उसकी सर्वश्रेष्ठताका निर्धारण, वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति सिद्धान्त रस-पाण्डित्यके विषयमें श्रीराय रामानन्दके साथ श्रीसनातनकी समानताको कहना, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्र प्रचार करनेकी इच्छा, चातुर्मासके अन्तमें भक्तोंके द्वारा गौड़में वापस लौटना, दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके चरणोंमें अवस्थान करना, श्रीरूपमें महाप्रभुके द्वारा शक्ति सञ्चार और चार प्रकारकी सेवा प्रदान करना एवं श्रीरूपका वृन्दावनमें गमन। दूसरा अध्याय— 43-66 महाप्रभुका तीन प्रकारसे प्राकट्य—महाप्रभुका साक्षात् दर्शन, योग्य जीवमें आवेश और उसके समक्ष आविर्भाव, तीन प्रकारके प्राकट्यके फलोंका वर्णन, नकुल ब्रह्मचारीकी देहमें आवेश और श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आविर्भावके उपाख्यानका वर्णन, महाप्रभुका चार स्थानोंमें नित्य आविर्भाव, श्रीकान्तके प्रति कृपा, श्रीप्रद्युम्नका नृसिंहानन्द-नाम प्राप्तिका कारण, श्रीप्रद्युम्नको महाप्रभुके द्वारा सभी विष्णु-तत्त्वोंके साथ उनके अभेद और ऐक्यका प्रदर्शन, भक्तके प्रेममें वशीभूत भगवान्, भगवान् आचार्यके पास मायावादी भाई गोपाल भट्टाचार्यका आगमन और महाप्रभुके साथ मिलन, आचार्यका श्रीस्वरूप गोस्वामीसे मायावाद भाष्य सुननेका अनुरोध, श्रीस्वरूपके द्वारा मायावादके दोषोंका वर्णन, निन्दा और आचार्यके भाईको स्वदेशमें वापस भेजना, भगवान् आचार्यके आदेशसे छोटे हरिदासकी माधवीदेवीसे चावलकी भिक्षा और छोटे हरिदासके प्रति महाप्रभुकी दण्ड प्रदान करनेकी लीला, माधवीदेवीका परिचय, स्त्रीके साथ वार्तालाप करनेवाले वैरागीके प्रति महाप्रभुका व्यवहार, छोटे हरिदासकी गति, स्त्रीसे वार्तालाप करनेका प्रायश्चित और छोटे हरिदास-दण्डलीलाके प्रसङ्गमें शिक्षा ग्रहण करने योग्य सात विषय।