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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला श्रीरूपगोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ एवं श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर निर्माण आदि। चौदहवाँ अध्याय— 349-374 महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़ दिव्योन्माद, महाप्रभुकी कृपाके बिना महाप्रभुके दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता, श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथदास—इन दो प्रभुओंके कड़चा ही श्रीगौरलीला-वर्णनके मूलग्रन्थ, श्रीस्वरूप-सूत्रकर्त्ता, श्रीरघुनाथ—वृत्तिकार, (चौदहवें अध्यायसे बीसवें अध्याय तक) सर्वत्र 'गौरनागर'-वादका खण्डन, महाप्रभुका अधिरूढ़ महाभावमें दिव्योन्माद, अभ्याससे ही नित्यकृत्य- सम्पादन, उड़िया स्त्रीकी श्रीजगन्नाथ-दर्शनमें आर्त्ति, अक्षजज्ञानसे कृष्ण-सेवकको स्त्री-पुरुषादि बाह्य परिचयसे दर्शननिषेध—शिक्षादान, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, दस-दशा, समस्त रात्रि जागकर महाप्रभुका उच्चःस्वरसे नामसङ्कीर्तन, तीनों द्वार बन्द, तथापि कमरेके भीतर महाप्रभुकी अप्राप्ति, महाप्रभुकी सिंहद्वारपर अचेतन अवस्थामें प्राप्ति, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कानोंमें कृष्णनामका उच्चारण और महाप्रभुकी बाह्यदशाका आना, महाप्रभुका गोवर्धन जानकर चटक-पर्वतकी ओर दौड़ना, श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना, मार्गमें स्तम्भादि विकार और भूमिपर गिरना, सबके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दके द्वारा उनपर जल छिड़कना, महाप्रभुकी अर्धबाह्यदशा, श्रीपुरी और श्रीभारतीके दर्शनसे महाप्रभुकी बाह्यदशा और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीका श्रीचैतन्यस्तव- कल्पवृक्ष ग्रन्थ। पन्द्रहवाँ अध्याय— 375-392 अप्राकृत कृष्णविरह-प्रेमावेशमें महाप्रभुका अचेतन होना, महाप्रभुकी अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा, स्वभाव और अभ्यासके द्वारा ही नित्य कृत्यादि, महाप्रभुका श्रीजगन्नाथमें साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दनका दर्शन, महाप्रभुकी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीगोविन्द-सेवाकी शिक्षा, उपभोगके बाद भक्तोंका महाप्रभुको घरमें लाना और महाप्रभुका विलाप, गोपियोंके द्वारा अप्राकृत पुष्पबाणके माधुर्यबलका वर्णन, महाप्रभुका श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्दके गलेमें हाथ डालकर विलाप, महाप्रभुका सर्वत्र कृष्णलीलाका दर्शन और उनको ढूँढ़नेकी लीला-प्रसङ्गमें पुष्पोद्यानमें कृष्ण-अन्वेषण-लीलाका वर्णन, श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ और श्रीस्वरूपका गीत गोविन्दका गान, महाप्रभुका प्रेमावेशमें नृत्यादि। सोलहवाँ अध्याय— 393-418 गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीकालिदासका श्रीक्षेत्रमें आगमन, श्रीकालिदासके गुण, पूर्व-परिचय, महाप्रसादमें विश्वास और वैष्णवमें जातिबुद्धिका न होना, श्रीकालिदास और झडुठाकुरका वृत्तान्त, श्रीकालिदासका वैष्णव-माहात्म्य-सूचक श्लोकका पाठ, कृष्णभक्तकी पदवीका निर्णय, कृष्णभक्त स्वयं अमानी और सबको मान देनेवाला, झडुठाकुरके द्वारा वैष्णवोंके अनुव्रज्या (पीछे जानेका) शिक्षादान, श्रीकालिदासके द्वारा छिपकर झडुठाकुरकी पदधूलिको ग्रहण करना और उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासका गौड़देशके सभी वैष्णवोंके उच्छिष्टका सम्मान, श्रीकालिदासके प्रति महाप्रभुकी निष्कपट महाकृपा, लोकशिक्षक आचार्यरूपी श्रीमहाप्रभुकी कठोरता, अन्तरङ्ग भक्तोंके अतिरिक्त अन्योंका महाप्रभुके चरणामृतमें अनाधिकार, श्रीकालिदासका महाप्रभुके चरणामृतका पान, महाप्रभुका श्रीनृसिंह-प्रणाम, श्रीकालिदासको महाप्रभुकी इच्छासे श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुका उच्छिष्ट-दान, वैष्णव-प्रसादसे ही कृष्णकृपाकी प्राप्ति, श्रीकृष्ण-उच्छिष्ट और भक्तोंके उच्छिष्टकी संज्ञा, साधकके 'तीन साधनके बल', पत्नी और पुत्रके साथ श्रीशिवानन्दका महाप्रभुका दर्शन करना, पुरीदासका मौन रहना और श्रीस्वरूपके द्वारा उसके तात्पर्यकी व्याख्या, सात वर्षके शिशु पुरीदासके द्वारा श्लोक-रचना, चातुर्मासके अन्तमें भक्तोंका गौड़में जाना और श्रीमहाप्रभुका दिव्योन्माद, द्वारपालको श्रीकृष्णके दर्शन करानेके लिये अनुरोध, द्वारपालका महाप्रभुका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथके सामने लाना और महाप्रभुका श्यामसुन्दर दर्शन, गोपालवल्लभ-भोग,

अध्याय-विवरण महाप्रभुका महाप्रसाद ग्रहण और सात्त्विक-विकार, किन्तु ऐश्वर्यमिश्रित श्रीजगन्नाथके सेवकोंके दर्शनसे उसका सङ्कोपन, महाप्रभुका फेलामृत-माहात्म्य और चिद्बलका वर्णन एवं सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ प्रसादका सम्मान करनेका आदेश, श्रीरामानन्दका महाप्रभुकी आज्ञासे श्लोकका पाठ, महाप्रभुकी उत्कण्ठा और श्रीकृष्णाधरामृतके चिद्बल एवं परम महिमाका कीर्तन, महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद। सतरहवाँ अध्याय— 419-430 महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप, महाप्रभुके नित्यसङ्गी श्रीस्वरूपका गान और श्रीरामानन्दका श्लोक पाठ, बीच-बीचमें स्वयं श्रीमहाप्रभुका श्लोक पाठ, महाप्रभुका उच्चनाम-सङ्कीर्तन, महाप्रभुका दिव्योन्माद, बन्द द्वार कमरेके मध्यसे ही महाप्रभुकी वहाँ अप्राप्ति, सभीके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और तैलङ्गी गायोंके बीचमें महाप्रभुकी प्राप्ति, महाप्रभुकी कूर्माकार अवस्था, उच्च सङ्कीर्तनसे महाप्रभुका चेतन और अर्धबाह्य-दशामें आगमन, श्रीस्वरूपको महाप्रभुका अपनी अवस्थाका वर्णन, महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्लोक-पाठ और महाप्रभुका श्लोकके अर्थका वर्णन, भावशाबल्य, पिङ्गलाके वचनकी स्मृति, शाखा-चन्द्र-न्याय, महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव— मर्त्यबुद्धिसे अगोचर, श्रीचैतन्यभजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति। अठारहवाँ अध्याय— 431-448 शारदीय ज्योत्स्ना रात्रिमें महाप्रभुका रासलीलाका उद्दीपन, समस्त रासपञ्चाध्यायका पाठ और व्याख्यामें महाप्रभुको एक साथ हर्ष और विषाद, भक्तप्रेमनिर्धारण और आस्वादन-परिमाणके लिये श्रीकृष्णका भक्तभाव स्वीकार, श्रीकृष्णप्रेमका अद्भुत विक्रम, चित्-परमाणुकण जीवका अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुके बिन्दुमात्र स्पर्शमें ही अधिकार, श्रीस्वरूप-रामानन्दादि कृष्ण-शक्तिवर्गका ही महाप्रभुके भावोंकी अनुभूतिमें अधिकार, गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी जलकेलि-श्लोकपाठ और महाप्रभुकी मूर्च्छा, यमुना जानकर समुद्रमें महाप्रभुका कूदना और मूर्च्छा, मूर्च्छित अवस्थामें ही तैरते हुए कोणार्ककी ओर गमन, भक्तोंका उनको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते समुद्रके तटपर गमन और महाप्रभुके न मिलनेसे उनके अन्तर्धान होनेका अनुमान, प्रियके हृदयमें प्रियके अदर्शनसे अमङ्गलकी आशङ्का, मछुआरेके साथ साक्षात्कार और मछुआरेके वाक्यसे महाप्रभुके सन्धान-प्राप्ति विषयमें श्रीस्वरूपका यथार्थ अनुमान, श्रीनृसिंहके स्मरणसे समस्त विपद्-विनाश, मछुआरेके साथ भक्तोंका महाप्रभुके निकट गमन और उन्हें चेतन करनेके लिये महाप्रभुकी सेवा, सभीके द्वारा उच्च सङ्कीर्तन और महाप्रभुका अर्धबाह्यदशामें आगमन, महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय, अर्धबाह्यदशामें महाप्रभुका चित्रजल्प, अर्धबाह्यसे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन एवं श्रीस्वरूपादिके निकट अपने वृत्तान्तका वर्णन। उन्नीसवाँ अध्याय— 449-474 महाप्रभुका दिव्योन्माद, अपनी वात्सल्य-उक्तिके ज्ञापनके लिये महाप्रभुका श्रीजगदानन्दको नवद्वीपमें भेजना, श्रीपरमानन्दपुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके निकट वस्त्र और प्रसाद भेजना, अप्राकृत वात्सल्यप्रेमके वशमें भगवान्, श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें आगमन और श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके सन्देशका ज्ञापन, श्रीपण्डितका नवद्वीपमें और शान्तिपुरमें अवस्थान करनेके बाद विदा लेनेकी याचना, श्रीअद्वैताचार्यका श्रीपण्डितके द्वारा महाप्रभुके पास एक पहेली भेजना, श्रीपण्डितका पुरीमें जाकर महाप्रभुको पहेली-ज्ञापन और महाप्रभुका थोड़ासा मुस्कुरानेके बाद मौनका अवलम्बन, श्रीस्वरूपके अनुरोधसे महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत, महायोगेश्वर श्रीअद्वैत प्रभु, भक्तोंका विस्मय और श्रीस्वरूपको उद्वेग, महाप्रभुकी कृष्णविरह-दशाकी वृद्धि, उद्घूर्णा और प्रलाप, महाप्रभुका नामकीर्तनमें रात्रि व्यतीत करना, महाप्रभुका दीवारोंसे मुख-घर्षणरूपी दिव्योन्माद, श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणोंके

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर पण्डितको चुनना, श्रीविदुरके समान श्रीशङ्करकी सेवाका सादृश्य, श्रीशङ्करकी महाप्रभुकी सेवा, महाप्रभुका जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें गमन और अन्तर्दशामें कृष्ण-अन्वेषणकी लीला, श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुकी बाह्यदशा, भ्रमरगीतमें श्रीराधाके प्रलाप एवं महिषीगीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पोक्ति। बीसवाँ अध्याय— 475-504 पुरीमें निरन्तर विप्रलम्भ भावमें व्याकुल महाप्रभु, परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग दो नित्यसङ्गी, महाप्रभुमें आठ सात्त्विक और तैंतीस व्यभिचारी भावोंका उदय, स्वयं और दोनों भक्तोंके साथ उन-उन भावोद्दीपक श्लोकोंका पाठ एवं श्रवण, महाप्रभुका श्रीनामकीर्तन-माहात्म्यका वर्णन, कृष्णकीर्तनकारी ही एकमात्र सुबुद्धिमान्, नामाभास एवं शुद्धनामका फल—अनर्थ-निवृत्ति और कृष्णप्रेमोदय, महाप्रभुके मुखसे निःसृत शिक्षाष्टक और उसकी व्याख्या, कोढ़ग्रस्त ब्राह्मणकी पत्नीके पातिव्रत्य-धर्मका वर्णन, महाप्रभु स्वयं ही शिक्षाष्टकके आस्वादक और स्वयं ही उसके प्रचारक, श्रीशिक्षाष्टक श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति, अन्तिम बारह वर्षोंमें अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमास्वादन, ग्रन्थका आकार बढ़नेके भयसे ग्रन्थकारका महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विराम। ग्रन्थकारका ठाकुर वृन्दावनके माहात्म्यका वर्णन एवं नाना प्रकारसे अपने दैन्यका ज्ञापन, ग्रन्थकारके उपास्य विग्रहगण और श्रीमदनमोहनकी कृपा प्राप्तिरूपी सुसौभाग्यका ज्ञापन, भागवतमें व्यासदेवकी रीतिके अनुसार अन्त्यलीलाके अध्यायोंकी संक्षेपमें पुनरावृत्ति, अनुवाद (संक्षिप्त वर्णन), पुनः आलोचन या पुनरावृत्ति फलसे ही लीलास्मरणोदय, गौड़ियोंके नाथ एवं ग्रन्थकारके द्वारा श्रीहरि-गुरु-वैष्णवोंकी चरण-वन्दना करते हुए ग्रन्थकी समाप्ति और ग्रन्थसमाप्तिके कालका निर्देश।

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला (सम्पूर्ण)

पहला अध्याय कथासार—महाप्रभुके श्रीवृन्दावनसे श्रीक्षेत्रमें आगमनका समाचार पाकर गौड़ीय भक्तों ने पुरुषोत्तम धामकी यात्रा की। श्रीशिवानन्द सेन एक कुत्तेको भी पार करानेका खर्चा देकर ले जा रहे थे। एक रातमें कुत्तेको भात नहीं देनेपर वह अकेला महाप्रभुके पास चला गया। अगले दिन श्रीशिवानन्दादिने महाप्रभुके निकट पहुँचकर देखा कि वह कुत्ता महाप्रभुके द्वारा दिये गये नारियलकी गिरिके प्रसादको खा रहा है; बादमें वह कुत्ता उद्धार प्राप्त करके (वैकुण्ठ) चला गया। इधर श्रीरूपगोस्वामी वृन्दावनसे यात्रा करके गौड़ीय भक्तोंके साथ नहीं आ पानेके कारण कुछ दिन बादमें नीलाचल आकर श्रीहरिदासके साथ रहे। महाप्रभु श्रीरूपके द्वारा विरचित “प्रियः सोऽयं” श्लोकको पढ़कर बहुत ही आनन्दित हुए। एक दिन महाप्रभुने श्रीराय-रामानन्द, श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ श्रीहरिदासके वासस्थानपर आकर श्रीरूपके ‘ललितमाधव’ और ‘विदग्धमाधव’ नामक दो नाटकोंके मङ्गलाचरणादि श्लोकोंका श्रवण किया। श्रीरामानन्द रायने उन दोनों नाटकोंके अनेक अङ्ग-प्रत्यङ्गका विचार करके ऐसा स्थिर किया कि दोनों नाटक ही सर्वोत्कृष्ट हुए हैं। चातुर्मास्यके बाद गौड़ीय-भक्तोंने महाप्रभुकी आज्ञासे गौड़देशकी यात्रा की। श्रीरूपगोस्वामी श्रीक्षेत्रमें ही रहे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा लँगड़ेको पर्वत पार करनेकी शक्ति प्रदान करती है और गूँगेसे वेदका पाठ करवा देती है, मैं उन्हीं ईश्वर श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— यत्कृपा (यत् यस्य चैतन्यचन्द्रस्य अनुकम्पा) पङ्गुं (पदविक्षेपणशक्तिविहीनं जनं) शैलं (परमोच्चगिरिशिखरं) लङ्घयते (उत्तारयति), मूकं (वाक्शक्तिविहीनं जनं) श्रुतिं (वेदम्) आवर्त्तयेत् (पाठयति), तम् ईश्वरं परमेश्वरं (कृष्णचैतन्यं महाप्रभुम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ सज्जनोंकी कृपाकी याचना :— दुर्गमे पथि मेऽन्धस्य स्खलत्पादगतेर्मुहुः। स्वकृपा-यष्टिदानेन सन्तः सन्त्ववलम्बनम्॥2॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥2॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुगण अपनी कृपारूपी लाठी देकर मुझ दुर्गम पथमें पुनः-पुनः फिसलनेवाले और अन्धेका सहारा हों॥2॥ अनुभाष्य— सन्तः (साधवः) स्वकृपा-यष्टिदानेन (निजदयारूपावलम्बन- प्रदानेन) दुर्गमे (दुस्तरे) पथि (संसारे) मुहुः (पुनः पुनः) स्खलत्पादगतेः (विक्षिप्तचरणस्य पथभ्रष्टस्य), अन्धस्य (नयन- विहीनस्य) मे (मम) अवलम्बनम् (आश्रयपदं) सन्तु (भवन्तु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥2॥ परमदयालु परमेश्वर श्रीकृष्णचैतन्यमहाप्रभुकी वन्दना :— पङ्गुं लङ्घयते शैलं मूकमावर्त्तयेच्छ्रुतिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे कृष्णचैतन्यमीश्वरम्॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ॥3॥ एइ छय गुरुर करों चरण वन्दन। याहा हैते विघ्ननाश, अभीष्ट-पूरण॥4॥

2 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/3-12 ] अनुवाद—मैं (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी) श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ-भट्ट गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी और श्रीरघुनाथ- दास गोस्वामी—इन छह गुरुओंके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिसके द्वारा समस्त विघ्नोंका नाश और अभीष्ट पूर्ण हो जाता है॥3-4॥ जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती। मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधा-मदनमोहनौ॥5॥ अनुवाद—मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन जययुक्त हों॥5॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/15 वाँ श्लोक देखें॥5॥ दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीमद्राधा-श्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥6॥ अनुवाद—ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। मैं उनका स्मरण करता हूँ॥6॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/16 वाँ श्लोक देखें॥6॥ श्रीमान्रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः। कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः॥7॥ अनुवाद—रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं। वे हमारे मङ्गलका विधान करें॥7॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/17 वाँ श्लोक देखें॥7॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥8॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥8॥ अन्त्यलीलाका वर्णन आरम्भ :— मध्यलीला संक्षेपेते करिलुँ वर्णन। अन्त्यलीला-वर्णन किछु शुन, भक्तगण॥9॥ अनुवाद—मैं महाप्रभुकी मध्यलीलाका संक्षेपमें वर्णन कर चुका हूँ। हे भक्तों! अब महाप्रभुकी अन्त्य-लीलाओंका कुछ वर्णन कर रहा हूँ, आप श्रवण कीजिये॥9॥ इसके पूर्व मध्यलीलाके पहले अध्यायमें अन्त्यलीलाके कुछ सूत्रोंका वर्णन :— मध्यलीला-मध्ये अन्त्यलीला-सूत्रगण। पूर्वग्रन्थे संक्षेपेते करियाछि वर्णन॥10॥ अनुवाद—मैंने मध्यलीलाके पहले अध्यायमें अन्त्यलीलाके कुछ सूत्रोंका संक्षेपमें वर्णन किया है॥10॥ अनुभाष्य—'पूर्वग्रन्थे'—मध्यलीलाके पहले अध्यायमें॥10॥ आमि जराग्रस्त, निकटे जानिया मरण। अन्त्यलीलार कोन सूत्र करियाछि वर्णन॥11॥ अनुवाद—मैं वृद्धावस्थासे ग्रस्त हूँ, अपने देहान्तको निकट जानकर मैंने मध्यलीलामें ही महाप्रभुकी अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया है॥11॥ उल्लेख नहीं किये गये सूत्रोंका विस्तारसहित वर्णनकी प्रतिज्ञा :— पूर्वलिखित ग्रन्थसूत्र-अनुसारे। येइ नाहि लिखि, ताहा लिखिये विस्तारे॥12॥

[ 1/12–21 पहला अध्याय 3 [बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—पहले मध्यलीलामें लिखे सूत्रोंके अनुसार मैंने उनके विषयमें जो पहले नहीं लिखा है, अब उसे विस्तारसे लिखूँगा ॥ 12 ॥ गौड़में महाप्रभुके वृन्दावनसे पुरीमें आगमनका समाचार भेजना :— वृन्दावन हैते प्रभु नीलाचले आइला। स्वरूप-गोसाञि गौड़े वार्त्ता पाठाइला ॥ 13 ॥ शचीमाताके द्वारा समाचार सुनना और भक्तोंके द्वारा पुरी जानेकी चेष्टा :— शुनि' शची आनन्दित, सब भक्तगण। सबे मिलि' नीलाचले करिला गमन ॥ 14 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके वृन्दावनसे नीलाचल आनेके समाचारको गौड़देशमें भेजा। इस समाचारको सुनकर श्रीशचीमाता और गौड़देशके समस्त भक्त बहुत आनन्दित हुए। सभी गौड़ीय भक्त मिलकर नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 13–14॥ श्रीअद्वैताचार्य और श्रीशिवानन्दके निकट समस्त भक्तोंका आगमन :— कुलीनग्रामी भक्त आर यत खण्डवासी। आचार्य, शिवानन्दे मिलिला सबे आसि' ॥ 15 ॥ अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी समस्त भक्त तथा श्रीअद्वैताचार्य श्रीशिवानन्द सेनके वासस्थानपर साथ आकर उनसे मिले ॥ 15 ॥ अनुभाष्य—'आचार्य'—श्रीअद्वैत आचार्य ॥ 15 ॥ सभीकी व्यवस्था करनेवाले श्रीशिवानन्द :— शिवानन्द करे सबार घाटि समाधान। सबारे पालन करे, देय वासा-स्थान ॥ 16 ॥ अनुवाद—नीलाचल जाते हुए श्रीशिवानन्द सेन मार्गके और नदी पार करनेके सब शुल्कका भुगतान, सभीके भोजन तथा वासस्थानका भी प्रबन्ध कर रहे थे ॥ 16 ॥ [दायाँ स्तम्भ] शिवानन्दके भगवद्भक्त कुत्तेका वृत्तान्त :— एक कुक्कुर चले शिवानन्दे-सने। भक्ष्य दिया लञा चले करिया पालने ॥ 17 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके साथ एक कुत्ता भी नीलाचलकी ओर चल रहा था। श्रीशिवानन्द सेन उसे भी भोजनादि देकर उसका पालन करते हुए उसे साथ लेकर जा रहे थे ॥ 17 ॥ एकदिन एकस्थाने नदी पार हैते। उड़िया नाविक कुक्कुर ना चढ़ाय नौकाते ॥ 18 ॥ अनुवाद—एक दिन एक स्थानपर सभी यात्री नौकाके द्वारा नदी पार कर रहे थे, किन्तु उड़िया-नाविकने कुत्तेको अपनी नौकामें चढ़ानेसे मना कर दिया ॥ 18 ॥ कुक्कुर रहिला,—शिवानन्द दुःखी हैला। दश पण कड़ि दिया कुक्कुरे पार कैला ॥ 19 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन यह देखकर बहुत दुःखी हुए कि कुत्ता पार होनेसे रह जायेगा। तब उन्होंने दस पण कौड़ी (आठ सौ कौड़ी) देकर कुत्तेको पार करवाया ॥ 19 ॥ एकदिन शिवानन्दे घाटिते रहिला। कुक्कुरके भात दिते सेवक पासरिला ॥ 20 ॥ अनुवाद—एकदिन श्रीशिवानन्द सेन शुल्क संग्रह करनेवालेके साथ व्यस्त हो गये और उनका सेवक कुत्तेको भात देना भूल गया ॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पासरिला'—भूल गया ॥ 20 ॥ रात्रे आसि' शिवानन्द भोजनेर काले। 'कुक्कुर पाञाछे भात?'—सेवके पुछिले ॥ 21 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन रात्रिके समय लौटे और भोजन करने बैठे, तब उन्होंने अपने सेवकसे पूछा,—'क्या कुत्तेको भी भोजन मिला है?' ॥ 21 ॥

4 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/22-32 ] कुक्कुर नाहि पाय भात, शुनि' दुःखी हैला। कुक्कुर चाहिते दश-मनुष्य पाठाइला॥ २२॥ अनुवाद—सेवकने जब कहा कि कुत्तेको भोजन नहीं दिया गया, तब श्रीशिवानन्द सेनको बहुत दुःख हुआ और उन्होंने कुत्तेको ढूँढ़नेके लिये दस लोगोंको भेजा॥ २२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चाहिते'—खोजने॥ २२॥ चाहिया ना पाइल कुक्कुर, लोक सब आइला। दुःखी हञा शिवानन्द उपवास कैला॥ २३॥ अनुवाद—बहुत खोजनेपर भी जब वह कुत्ता नहीं मिला, तब सभी लोग लौट आये। श्रीशिवानन्द सेनने दुःखी होकर उस रात्रि उपवास किया॥ २३॥ प्रभाते कुक्कुर चाहि' काँहा ना पाइल। सकल वैष्णवेर मने चमत्कार हैल॥ २४॥ अनुवाद—प्रातःकालमें भी पुनः सभीने कुत्तेको सर्वत्र ढूँढ़ा, किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं चला। ऐसा देखकर सभी वैष्णवोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥ २४॥ उत्कण्ठाय चलि' सबे आइला नीलाचले। पूर्ववत् महाप्रभु मिलिला सकले॥ २५॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये वे सब वहाँसे चल पड़े और नीलाचल आ पहुँचे। महाप्रभु पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंसे मिले॥ २५॥ सबा लञा कैला जगन्नाथ-दरशन। सबा लञा महाप्रभु करेन भोजन॥ २६॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ ले जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ भोजन किया॥ २६॥ पूर्ववत् सबारे प्रभु पाठाइला वासा-स्थाने। प्रभु-स्थाने आर दिन सबार गमने॥ २७॥ अनुवाद—पूर्व वर्षोंकी भाँति महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके रहनेके स्थानपर भेजा। अगले दिन सभी भक्त महाप्रभुसे उनके वासस्थानपर मिलनेके लिये आये॥ २७॥ आसिया देखिल सबे सेइ त' कुक्कुरे। प्रभु-पाशे बसियाछे किछु अल्पदूरे॥ २८॥ अनुवाद—वहाँ आकर सभी भक्तोंनै देखा कि वह कुत्ता महाप्रभुके पास उनसे थोड़ी दूरीपर ही बैठा हुआ है॥ २८॥ प्रसाद नारिकेल-शस्य देन फेलाइञा। 'राम' 'कृष्ण' 'हरि' कह', बलेन हासिया॥ २९॥ अनुवाद—महाप्रभु उसे नारियल प्रसादकी गिरि फेंककर दे रहे थे और मुस्कुराते हुए उसे कह रहे थे—'राम', 'कृष्ण', 'हरि' बोलो॥ २९॥ शस्य खाय कुक्कुर, 'कृष्ण' कहे बार बार। देखिया लोकेर मने हैल चमत्कार॥ ३०॥ अनुवाद—वह कुत्ता नारियलकी गिरि खा रहा था और बार-बार 'कृष्ण' नाम बोल रहा था। उस कुत्तेको 'कृष्ण' नाम बोलते देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ॥ ३०॥ शिवानन्द कुक्कुर देखि' दण्डवत् कैला। दैन्य करि' निज अपराध क्षमाइला॥ ३१॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कुत्तेको देखकर उसे दण्डवत् प्रणाम किया और दीनतापूर्वक अपने किये अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना की॥ ३१॥ कुत्तेकी सिद्धि और वैकुण्ठ-प्राप्ति :- आर दिन केह तार देखा ना पाइला। सिद्ध-देह पाञा कुक्कुर वैकुण्ठेते गेला॥ ३२॥

[ 1/32-37 पहला अध्याय 5 अनुवाद—अगले दिन वह कुत्ता किसीको दिखलायी नहीं दिया। वह कुत्ता सिद्ध-देहको प्राप्त करके वैकुण्ठमें चला गया॥ 32॥ आलौकिक लीलामय महाप्रभु :- ऐछे दिव्यलीला करे शचीर नन्दन। कुकुरके 'कृष्ण' कहाञा करिला मोचन॥ 33॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी अनेक दिव्य लीलाएँ करते हैं। उन्होंने कुत्तेके मुखसे 'कृष्ण' कहलवाकर उसका उद्धार कर दिया॥ 33॥ श्रीरूपका वृन्दावन आगमन और नाटक-रचना आरम्भ :- एथा प्रभु-आज्ञाय रूप आइला वृन्दावन। कृष्णलीला-नाटक करिते हैल मन॥ 34॥ अनुवाद—इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुकी आज्ञासे प्रयागसे वृन्दावन आ गये और वहाँ उनकी कृष्णलीला-विषयक-नाटक लिखनेकी इच्छा हुई॥ 34॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णलीला-नाटक'—कृष्णलीला- विषयक नाटक॥ 34॥ वृन्दावने नाटकेर आरम्भ करिला। मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' तथाइ लिखिला॥ 35॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने वृन्दावनमें कृष्णलीला- विषयक नाटकको लिखना आरम्भ किया। उन्होंने उस नाटक ग्रन्थका मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' वहीं लिखा॥ 35॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नान्दी-श्लोक'—नाटकके आरम्भमें जिस मङ्गलाचरण-श्लोकका पाठ होता है, उसे 'नान्दी'-श्लोक कहते हैं॥ 35॥ अनुभाष्य—'नान्दी'—नाटकचन्द्रिका में— “प्रस्तावनायास्तु मुखे नान्दी कार्या शुभावहा। आशीर्नमस्क्रिया-वस्तुनिर्देशान्यतमान्विता॥ अष्टाभिर्दशभिर्युक्ता किंवा द्वादशभिः पदैः। चन्द्रनामाङ्किता प्रायो मङ्गलार्थ पदोज्ज्वला। मङ्गलं चक्रकमलचकोरकुमुदादिकम्॥” [अर्थात् “प्रस्तावनाके प्रारम्भमें नान्दी-कार्य शुभकारी होता है। आशीर्वाद, नमस्कार और वस्तुनिर्देशसे संयुक्त नान्दी आठ, दस अथवा बारह पदोंसे युक्त होता है और प्रायः चन्द्र नामसे अङ्कित होकर मङ्गलसूचक पदसे शोभित होता है। चक्र, कमल, चकोर, कुमुद आदि ही मङ्गल हैं।”] साहित्यदर्पण छठे अध्याय 282 संख्यामें— “आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते। देवद्विज-नृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता॥” [अर्थात् “देव, ब्राह्मण, राजा आदिके जिन आशीर्वाद-सूचक वचनोंसे संयुक्त स्तुति नटगण प्रयोग किया करते हैं, उससे आनन्द उत्पन्न होता है, इसलिये वह नान्दी-नामसे कहा जाता है।”]॥ 35॥ अपने छोटे भाईके साथ श्रीरूपकी गौड़देश यात्रा और सूत्र-आकारमें नाटककी पाण्डुलिपिकी रचना :- पथे चलि' आइसे नाटकेर घटना भाविते। कड़चा करिया किछु लागिला लिखिते॥ 36॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी अपने छोटे भाई श्रीअनुपमके साथ वृन्दावनसे गौड़देशकी ओर चल पड़े। श्रीरूप गोस्वामी मार्गमें चलते-चलते नाटकमें वर्णन होनेवाले घटनाओंका चिन्तन करते जा रहे थे और उन्होंने मार्गमें ही सूत्ररूपमें नाटककी पाण्डुलिपिकी रचना की॥ 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कड़चा'—प्रारूप अथवा पाण्डुलिपि॥ 36॥ गौड़में श्रीअनुपमको गङ्गाप्राप्ति :- एइमते दुइभाइ गौड़देशे आइला। गौड़े आसि' अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति हैला॥ 37॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनों भाई गौड़देशमें आ पहुँचे। गौड़देशमें आनेपर श्रीअनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई अर्थात् उनका वहींपर देहत्याग हुआ॥ 37॥

6 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/37-46 ] अनुभाष्य- 'दुइ भाइ'—श्रीरूप और उनके छोटे भाई श्रीअनुपम ॥ 37 ॥ श्रीरूपकी पुरीमें महाप्रभुके दर्शनके लिये यात्रा :- रूप-गोसाञि प्रभुपाशे करिला गमन। प्रभुरे देखिते ताँर उत्कण्ठित मन ॥ 38 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो रहा था, इसलिये वे महाप्रभुके पास जानेके लिये पुरीकी ओर चल पड़े॥ 38 ॥ श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्ति हेतु विलम्ब होनेके कारण महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जानेवाले गौड़ीय-यात्रियोंके साथ श्रीरूपका मिलन नहीं होना :- अनुपमेर लागि' ताँर विलम्ब हइल। भक्तगण-पाश आइला, लाग् ना पाइल ॥ 39 ॥ अनुवाद-गौड़देशमें श्रीअनुपमके देहत्यागके कारण श्रीरूप गोस्वामीको विलम्ब हुआ, तब तक गौड़ीय भक्त पुरीके लिये प्रस्थान कर चुके थे, इसलिये उनकी उन भक्तोंके साथ भेंट नहीं हो पायी ॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लाग् ना पाइल'—श्रीशिवानन्दादि भक्तगण महाप्रभुके पास जा रहे हैं, ऐसा सुनकर श्रीरूपने विचार किया कि वे भी उनके साथ नीलाचल जायेंगे, किन्तु वे उनके साथ भेंट नहीं कर पाये, क्योंकि वे पहले ही नीलाचलके लिये चले गये थे॥ 39 ॥ सत्यभामापुरमें सत्यभामादेवीके उपदेशकी प्राप्ति ही ललितमाधवकी रचनाके शुभारम्भका मूल कारण :- उड़िया-देशे 'सत्यभामापुर'—नामे ग्राम। एक रात्रि सेइ ग्रामे करिला विश्राम ॥ 40 ॥ रात्रे स्वप्ने देखे, -एक दिव्यरूप नारी। सम्मुखे आसिया आज्ञा दिला कृपा करि' ॥ 41 ॥ “आमार नाटक पृथक् करह रचन। आमार कृपाते नाटक हबे विलक्षण ॥ ”42 ॥ अनुवाद-उड़ीसा-देशमें 'सत्यभामापुर'-नामक एक गाँव है। श्रीरूप गोस्वामीने पुरी जाते हुए उस गाँवमें एक रात्रि विश्राम किया था। उस रात्रिमें उन्होंने एक स्वप्न देखा कि एक दिव्य रूपवती नारीने उनके सम्मुख आकर उन्हें कृपापूर्वक आज्ञा देते हुए कहा, -“तुम मेरे नाटककी पृथक् रूपसे रचना करना, मेरी कृपासे तुम्हारे द्वारा रचित वह नाटक विलक्षण (उत्कृष्ट) होगा ॥ ”40-42 ॥ अनुभाष्य-कटक-जिलेके अन्तर्गत जान्कादेइपुरके निकटमें ही 'सत्यभामापुर'-ग्राम है ॥ 40 ॥ श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :- स्वप्न देखि' रूप-गोसाञि करिला विचार। 'सत्यभामार आज्ञा-पृथक् नाटक करिवार ॥ 43 ॥ एकत्र वर्णित व्रज और पुरकी लीलाको पृथक् नाटकोंके आकारमें वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :- व्रज-पुर-लीला एकत्र करियाछि गठन। दुइ भाग करि' एबे करिमु रचना ॥ '44 ॥ अनुवाद-उस स्वप्नको देखकर श्रीरूप-गोस्वामीने मनमें विचार किया, - 'श्रीसत्यभामा देवीने मुझे पृथक् नाटक रचना करनेकी आज्ञा दी है। मैंने तो व्रज तथा पुरकी लीलाओंको एक ही साथ लिखा है, किन्तु अब मैं इस नाटकके दो भाग करके ही उनकी रचना करूँगा ॥ '43-44 ॥ पुरीमें सिद्धबकुल-मठमें ठाकुर-श्रीहरिदासके वासस्थानपर पहुँचना :- भाविते भाविते शीघ्र आइला नीलाचले। आसि' उत्तरिला हरिदास-वासास्थले ॥ 45 ॥ अनुवाद-ऐसा विचार करते-करते श्रीरूप गोस्वामी शीघ्र ही नीलाचल आ पहुँचे और वे श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थानपर आये ॥ 45 ॥ ठाकुरकी स्नेहपूर्ण उक्ति :- हरिदास-ठाकुर ताँरे बहु कृपा कैला। “तुमि आसिबे, -मोरे प्रभु ये कहिला ॥ ”46 ॥

[ 1/46-55पहला अध्याय7 अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीरूप गोस्वामीपर बहुत कृपा की और उनसे कहा—"तुम आओगे, —मुझे महाप्रभुने यह पहलेसे ही बता दिया था॥" 46॥ अकस्मात् श्रीहरिदासको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुका आगमन :— 'उपल-भोग' देखि' हरिदासरे देखिते। प्रतिदिन आइसेन प्रभु, आइला आचम्बिते॥ 47॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथके उपलभोगको देखनेके बाद प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने आते थे, किन्तु उस दिन महाप्रभु अकस्मात् ही वहाँ आ गये॥ 47॥ श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम और महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :— "रूप दण्डवत् करे", —हरिदास कहिला। हरिदासे मिलि' प्रभु रूपे आलिङ्गिला॥ 48॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —"रूप आपको दण्डवत् प्रणाम कर रहा है।" महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके बाद श्रीरूप-गोस्वामीका आलिङ्गन किया॥ 48॥ परस्पर संलाप :— हरिदास-रूपे लञा प्रभु बसिला एकस्थाने। कुशल प्रश्न, इष्टगोष्ठी कैला कतक्षणे॥ 49॥ अनुवाद—श्रीहरिदास तथा श्रीरूपको लेकर महाप्रभु एकस्थानपर बैठ गये और उन्होंने श्रीरूपसे उनका कुशल-क्षेम पूछा तथा कुछ समय तक इष्टगोष्ठी भी की॥ 49॥ श्रीसनातनके संवादकी जिज्ञासा और श्रीरूपके द्वारा श्रीसनातनके साथ भेंट नहीं होनेके विषयमें बतलाना :— सनातनेर वार्त्ता यबे गोसाञि पुछिल। रूप कहे, —"ताँर सङ्गे देखा ना हइल॥ 50॥ उसके कारणका निर्देश :— आमि गङ्गापथे आइलाङ, तिँहो राजपथे। अतएव आमार देखा नहिल ताँर साथे॥ 51॥ श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्तिका ज्ञापन :— प्रयागे शुनिलुँ, —तेंहो गेला वृन्दावने।" अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति कैल निवेदने॥ 52॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब श्रीसनातन गोस्वामीके विषयमें पूछा, तब श्रीरूपने कहा,—"मेरी उनके साथ भेंट नहीं हो पायी। मैं गङ्गाके पथसे प्रयागकी ओर आया और वे राजपथसे प्रयागसे ब्रजकी ओर गये, इसलिये मेरी उनसे भेंट नहीं हो पायी। मैंने प्रयागमें आकर सुना कि वे वृन्दावन गये हैं।" तत्पश्चात् श्रीरूपने महाप्रभुको श्रीअनुपमकी गङ्गा-प्राप्तिके विषयमें भी बतलाया॥ 50-52॥ महाप्रभुका प्रस्थान और उनके सङ्गी भक्तोंके साथ श्रीरूपका मिलन :— रूपे ताँहा वासा दिया गोसाञि चलिला। गोसाञिर सङ्गी भक्त रूपेरे मिलिला॥ 53॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीरूपको श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थानपर ही रहनेका निर्देश देकर चले गये। महाप्रभुके सङ्गी भक्त श्रीरूप गोस्वामीसे आकर मिले॥ 53॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'ताँहा'—श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थान अर्थात् सिद्धबकुलमें॥ 53॥ महाप्रभुके द्वारा अगले दिन भक्तोंको श्रीरूपका परिचय देना :— आर दिन महाप्रभु सब भक्त लञा। रूपे मिलाइला सबाय कृपा त' करिया॥ 54॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु समस्त भक्तोंको अपने साथ लेकर आये और उन्होंने श्रीरूपपर कृपा करके उन्हें अपने सभी भक्तोंसे मिलवाया॥ 54॥ श्रीरूपके द्वारा समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना, सभीके द्वारा श्रीरूपका आलिङ्गन :— सबार चरण रूप करिला वन्दन। कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥ 55॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी

8 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/55–64 ] वन्दना की और उन सभी भक्तोंने कृपा करके साथ कुछ देर तक इष्टगोष्ठी करके मध्याह्न कृत्य श्रीरूपका आलिङ्गन किया ॥ 55 ॥ करनेके लिये चले जाते ॥ 60 ॥ श्रीरूपपर कृपा करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइ महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिसे श्रीरूपको आनन्द :– और श्रीअद्वैत–दोनों प्रभुओंसे अनुरोध :– एइमत प्रतिदिन प्रभुर व्यवहार। “अद्वैत, नित्यानन्द, तोमरा दुइजने।” प्रभुकृपा पाञा रूपेर आनन्द अपार ॥ 61 ॥ प्रभु कहे,—“रूपे कृपा कर काय्मने ॥ 56 ॥ तोमा-दुँहार कृपाते इँहार हउ शक्ति। अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन ऐसा ही व्यवहार करते याते विवरिते पारेन कृष्णरसभक्ति ॥” 57 ॥ थे। महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करके श्रीरूपको अपार आनन्द होता था ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल–लीला :– प्रभुसे कहा,—“आप दोनों श्रीरूपपर काय और मनसे भक्तगण लञा कैला गुण्डिचा-मार्जन। कृपा कीजिये। आप दोनोंकी कृपासे इसमें ऐसी शक्ति आइतोटा आसि' कैला वन्य-भोजन ॥ 62 ॥ सञ्चरित हो जाय, जिससे यह कृष्णरस-भक्तिका वर्णन कर सके ॥” 56–57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने रथयात्राके पूर्व दिन अपने भक्तोंको साथमें लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया श्रीरूप—महाप्रभुके समस्त भक्तोंकी ही प्रीतिके पात्र :– और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ आइतोटामें आकर गौड़ीया, उड़िया, यत प्रभुर भक्तगण। उद्यान-भोजन (प्रसाद-सेवन) किया ॥ 62 ॥ सबार हइल रूप स्नेहेर भाजन ॥ 58 ॥ अनुभाष्य—‘आइतोटा’—गुण्डिचा मन्दिरके निकट अनुवाद—महाप्रभुके गौड़ीय, उड़िया आदि जितने स्थित उपवन ॥ 62 ॥ भी भक्त थे, श्रीरूप उन सभीके स्नेहके पात्र बन गये ॥ 58 ॥ सभी भक्तोंके आनन्दको देखकर श्रीरूप और श्रीहरिदासको आनन्द :– स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको प्रतिदिन प्रसाद खाय, 'हरि' बले सर्वभक्तजन। दर्शन और प्रसाद देना :– देखि' हरिदास-रूपेर हरषित मन ॥ 63 ॥ प्रतिदिन आसि' रूपे करेन मिलने। मन्दिरे ये प्रसाद पान, देन दुइ जने ॥ 59 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने प्रसाद ग्रहण किया और ‘हरिध्वनि’ दी, इसे देखकर श्रीहरिदास ठाकुर और अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन आकर श्रीरूपसे मिलते। श्रीरूपके मनमें हर्ष हुआ ॥ 63 ॥ वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जो प्रसाद पाते, उसे वे श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपको दे देते ॥ 59 ॥ महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्टकी प्राप्तिसे दोनोंका प्रेमसे नृत्य :– श्रीरूपके साथ महाप्रभुकी कृष्णकथा :– गोविन्दद्वारा प्रभुर शेष-प्रसाद पाइला। इष्टगोष्ठी दुइजने करि' कतक्षण। प्रेमे मत्त दुइजन नाचिते लागिला ॥ 64 ॥ मध्याह्न करिते प्रभु करिला गमन ॥ 60 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूप श्रीगोविन्दसे अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूपके महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त करके प्रेममें

[ 1/64-71 पहला अध्याय 9 मत्त होकर नृत्य करने लगे ॥ 64 ॥ अगले दिन श्रीरूपके साथ महाप्रभुका मिलन :- आर दिन प्रभु रूपे मिलिया बसिला। सर्वज्ञ-शिरोमणि प्रभु कहिते लागिला ॥ 65 ॥ महाप्रभुका कृपा-आदेश ही विदग्धमाधवकी रचनाके शुभारम्भका मूल कारण :- “कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह व्रज हैते। व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु ना यान काँहाते ॥ 66 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु आकर श्रीरूप गोस्वामीसे मिलकर वहाँ बैठे। तब सर्वज्ञ-शिरोमणि महाप्रभु उनसे कहने लगे,–“श्रीकृष्णको व्रजसे बाहर मत करना, श्रीकृष्ण व्रजको छोड़कर कदापि कहीं भी नहीं जाते ॥ 65-66 ॥ केवलमात्र व्रजमें ही व्रजेन्द्रनन्दनका अवस्थान :- लघुभागवतामृत (1/5/461)में उद्धृत यामलवचन- कृष्णोऽन्यो यदुसम्भुतो यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः। वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति ॥”67॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व हैं, इसलिये वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा और द्वारकामें लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे वृन्दावनका परित्यग करके कहीं भी नहीं जाते ॥”67॥ अनुभाष्य- यदुसम्भूतः (यदुकुलोत्पन्नः) कृष्णः-अन्यः (व्रजेन्द्रनन्दनात् अपरः); यः तु गोपेन्द्रनन्दनः (नन्दसुतः) सः तु वृन्दावनं परित्यज्य (विहाय) क्वचित् (कुत्रापि) नैव गच्छति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥ महाप्रभुके वाक्यसे श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :- एत कहि' महाप्रभु मध्याह्ने चलिला। रूप-गोसाञि मने किछु विस्मय हइला ॥ 68 ॥ श्रीसत्यभामा-देवी और महाप्रभु, दोनोंका ही पृथक् रूपसे यथाक्रम ललितमाधव और विदग्धमाधव नाटक लिखनेके लिये आदेश देना :- “पृथक् नाटक करिते सत्यभामा आज्ञा दिल। जानिलुँ पृथक् नाटक करिते प्रभु-आज्ञा हैल ॥ 69 ॥ पहले एकत्र वर्णित दोनों नाटकोंका अब पृथक् रूपसे चिन्तन और रचना :- पूर्वे दुइ नाटक छिल एकत्र रचना। दुइभाग करि एबे करिमु घटना ॥ 70 ॥ नान्दी, प्रस्ताव और विषय आदि सब कुछका ही पृथक् रूपसे चिन्तन :- दुइ 'नान्दी'-'प्रस्तावना', दुइ 'संघटना'। पृथक् करिया लिखि करिया भावना ॥”71॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न कृत्य करनेके लिये चले गये। श्रीरूप गोस्वामीके मनमें कुछ विस्मय हुआ,–“श्रीसत्यभामा देवीने (अपनी पुरलीलाके लिये) पृथक् नाटककी रचना करनेकी आज्ञा दी थी। अब यह जाना कि महाप्रभुने भी (वृन्दावन और पुर लीलाओंके लिये) पृथक् नाटकोंकी रचना करनेकी आज्ञा दी है। पहले मैं दोनों नाटकोंकी एकसाथ रचना कर रहा था, किन्तु अब मैं उसे (श्रीकृष्णकी व्रजलीला और पुरलीला) इन दो भागोंमें विभक्त कर दूँगा। मैं दोनों नाटकोंके लिये पृथक्-पृथक् 'नान्दी', 'प्रस्तावना' और 'लीलाओं'का भली-भाँति विचार करके लिखूँगा ॥”68-71 ॥ अनुभाष्य- 'दुइ भाग'-विदग्धमाधवमें व्रजलीला एवं ललितमाधवमें पुरलीला,–ये दो भाग हैं। साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 287 श्लोकमें- “नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा। सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः। आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा॥” अर्थात् “नटी, विदूषक अथवा पार्श्ववर्ती नट,-ये

10 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/69-74 ] सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कर्त्तव्यकार्य-विषयक वास्तविक वृत्तान्तको उठाकर मधुर वचनोंके द्वारा परस्पर सम्पूर्ण रूपसे आलाप करते हैं, उसीको 'आमुख' जानना होगा, वही 'प्रस्तावना' (अभिनयके आरम्भ करनेका प्रस्ताव) है॥ 70-71॥ अमृतानुकणिका-श्रीयुत रूप गोस्वामीने वृन्दावनमें सेवाकुञ्जके अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी भजनस्थलीमें 'ललितमाधव' नामक एक नाटक लिखना आरम्भ किया। वे उस नाटकमें वृन्दावनकी लीला और पुरकी लीला अर्थात् द्वारकाकी लीलाको मिलाकर एक साथ लिख रहे थे। श्रीभागवतमें श्रीकृष्णके मथुरा और द्वारका गमनके पश्चात् व्रजमें लौटकर श्रीराधिका आदि गोपियोंसे मिलनका कोई वर्णन नहीं है। श्रीरूप गोस्वामी विरहके बाद मिलन अर्थात् दोनोंका संयोग कराना चाहते थे और यह बतलाना चाहते थे कि श्रीरुक्मिणी, श्रीसत्यभामा आदि श्रीराधिका और उनकी सखियोंके ही प्रकाश विग्रह हैं, पृथक् नहीं है। यह दिखलाकर वे दोनोंका मिलन करवाना चाहते थे। इसलिये दोनोंका मङ्गलाचरण-नान्दी श्लोक आदि सबको एक ही करके लिखते जा रहे थे। जब श्रीरूप गोस्वामी उड़ीसाकी सीमापर सत्यभामापुरमें आये, तो रात्रिमें विश्राम करते हुए उन्होंने एक स्वप्न देखा। उस स्वप्नमें श्रीसत्यभामाजीने उनसे कहा कि तुम पुरकी लीला और वृन्दावनकी लीलाको एक साथ मिलाकर नहीं लिखना। पुरकी लीलाको पृथक् रूपमें लिखना। महाप्रभुने भी उनको कुछ ऐसी ही प्रेरणा दी कि दोनों लीलाओंको एक नहीं करना अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णको व्रजसे बाहर मत निकालना। “कृष्णोऽन्यो यदुसम्भूतों यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः। वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति॥” “यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व हैं, इसलिये वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा और द्वारकामें लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे वृन्दावनका परित्याग करके कहीं भी नहीं जाते।” इसलिये उन गोपेन्द्रनन्दनको द्वारका या मथुरामें मत ले जाना और मथुरा-द्वारकावाले वासुदेव कृष्णको व्रजमें मत पहुँचाना। यह सुनकर श्रीरूप गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ललितमाधव और विदग्धमाधव, उसको दो खण्डोंमें करके लिखा। उन्होंने वृन्दावनमें सेवाकुञ्जके अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी भजनस्थलीमें जहाँसे एक नाटकके रूपमें आरम्भ किया था, वहीं इन दोनों नाटकोंको पूर्ण किया।-“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 69-71 ॥ विप्रलम्भ-भावमें निमग्न महाप्रभुके मुखसे श्लोकको सुनकर श्रीरूपके द्वारा उस भावको सूचित करनेवाले एक श्लोककी रचना :- रथयात्राय जगन्नाथ-दर्शन करिला। रथ-अग्रे प्रभुर नृत्य-कीर्त्तन देखिला ॥ 72 ॥ प्रभुर नृत्य-श्लोक शुनि' श्रीरूप-गोसाञि। सेइ श्लोकार्थ लञा श्लोक करिला तथाइ ॥ 73 ॥ अनुवाद-श्रीरूपने रथयात्रामें भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन किये तथा रथके सामने महाप्रभुके नृत्य-कीर्तनको भी देखा। नृत्य करते समय महाप्रभुके द्वारा एक श्लोकके पाठको श्रीरूपने सुना और उसी श्लोकके भावोंके अनुरूप उन्होंने वहीं एक नये श्लोककी रचना कर दी॥ 72-73 ॥ मध्यलीलाके पहले अध्यायमें वर्णित होनेपर भी अब पुनः संक्षेपमें वर्णन :- पूर्वे सेइ सब कथा करियाछि वर्णन। तथापि कहिये किछु संक्षेपे कथन ॥ 74 ॥ अनुवाद-यद्यपि मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) पहले मध्यलीलामें इस प्रसङ्गका वर्णन किया है, तथापि मैं संक्षेपमें इस विषयमें कुछ लिख रहा हूँ॥ 74 ॥

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[ 1/75-80 पहला अध्याय 11

[बायाँ स्तम्भ] श्रीराधाभावमें निमग्न महाप्रभुके द्वारा उच्चारित गूढ़-श्लोकका मर्मार्थ एकमात्र श्रीस्वरूप-दामोदरके अतिरिक्त सभीके लिये दुर्बोध्य :- सामान्य एक श्लोक प्रभु पड़ेन कीर्तने। केने श्लोक पड़े—इहा केह नाहि जाने॥ 75॥ अनुवाद—महाप्रभुने कीर्तन करते हुए एक सामान्य श्लोक पढ़ा। महाप्रभु किस भावसे उस श्लोकको पढ़ रहे थे—इसे कोई भी नहीं जानता था॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'केने'—किस भावसे॥ 75॥ उस श्लोकके भावकी द्योतक पदावलीका गान करके श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका सन्तोष-विधान :- सबे एका स्वरूप श्लोकेर अर्थ जाने। श्लोकानुरूप पद करान आस्वादने॥ 76॥ अनुवाद—उस श्लोकका अर्थ एकमात्र श्रीस्वरूप दामोदर ही जानते थे। वे महाप्रभुके द्वारा उच्चारित श्लोकोंके भावोंके अनुरूप पदोंका गान करके महाप्रभुको उनका आस्वादन करवाते थे॥ 76॥ श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके मनके भावोंके अनुसार श्लोककी रचना :- रूप-गोसाञि प्रभुर जानिया अभिप्राय। सेइ अर्थे श्लोक कैला प्रभुरे ये भाय॥ 77॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके द्वारा उस श्लोकके पाठके अभिप्रायको जान गये। उन्होंने उस श्लोकके भावके अनुरूप, महाप्रभुके मनभावन एक नये श्लोककी रचना की॥ 77॥ महाप्रभुके द्वारा उच्चारित श्लोक :- काव्यप्रकाश (1/4) में, साहित्यदर्पण (1/10)में और पद्यावली (382)में— यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते॥ 78॥

[दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,—“जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके तटपर निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है॥” 78॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/58 संख्या देखें॥ 78॥ पद्यावली (383)में श्रीरूपगोस्वामिकृत-श्लोक :- प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित- स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्। तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति॥ 79॥ अनुवाद—हे सहचरी! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है; तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमसुरके आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है॥ 79॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/76 संख्या देखें॥ 79॥ तालपत्रे श्लोक लिखि' चालेते राखिला। समुद्रस्नान करिवारे रूप-गोसाञि गेला॥ 80॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने श्लोककी रचना करके उसे एक तालपत्रपर लिखकर अपने वास स्थानपर फूसकी छतमें उसे फंसाकर रख दिया और समुद्रमें स्नानके लिये चले गये॥ 80॥

12 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/81-90 ] महाप्रभुका श्रीरूपकृत श्लोकके पाठसे प्रेमावेश :- हेनकाले प्रभु आइला ताँहारे मिलिते। चाले श्लोक देखि' प्रभु लागिला पड़िते ॥ 81 ॥ श्लोक पड़ि' प्रभु सुखे प्रेमाविष्ट हैला। हेनकाले रूप-गोसाञि स्नान करि' आइला ॥ 82 ॥ अनुवाद-उसी समय महाप्रभु श्रीरूपसे मिलनेके लिये आये। महाप्रभुने झोपड़ीकी छतमें रखे तालपत्रको देखा और उसे निकालकर उसपर लिखे श्लोकको पढ़ने लगे। श्लोकको पढ़कर महाप्रभु आनन्दसे प्रेमाविष्ट हो गये। तभी श्रीरूप-गोस्वामी स्नान करके आ गये॥ 81-82 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी अकृत्रिम स्नेह-कृपा :- प्रभु देखि' दण्डवत् प्राङ्गुणे पड़िला। प्रभु ताँरे चापड़ मारि' कहिते लागिला ॥ 83 ॥ श्रीरूपको गाढ़ आलिङ्गन :- “गूढ़ मोर हृदय तुमि जानिला केमने?” एत कहि' रूपे कैला दृढ़ आलिङ्गने ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीरूपने प्राङ्गणमें ही दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु श्रीरूपको प्रेमसे एक हल्केसे चपत लगाकर कहने लगे,-“हे रूप! तुमने मेरे हृदयके गूढ़भावको कैसे जान लिया?” यह कहकर उन्होंने श्रीरूपका दृढ़ आलिङ्गन किया॥ 83-84 ॥ महाप्रभुके द्वारा अज्ञ होनेका अभिनय करते हुए श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोक दिखलाकर रहस्यपूर्वक श्रीस्वरूपसे श्रीरूपके द्वारा उनके मनोभावोंको जाननेके कारणकी जिज्ञासा :- से-श्लोक लञा प्रभु स्वरूपे देखाइला। स्वरूपेर परीक्षा लागि' ताँहारे पुछिला ॥ 85 ॥ “मोर अन्तर-वार्त्ता रूप जानिल केमने?” स्वरूप कहे,-“जानि, कृपा करियाछ आपने ॥ 86 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीरूपकी महाप्रभुकी कृपा प्राप्तिका अनुमान :- अन्यथा ए अर्थ कार नाहि हय ज्ञान। तुमि पूर्वे कृपा कैला, करि अनुमान ॥” 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस तालपत्रपर लिखे श्लोकको लाकर श्रीस्वरूप दामोदरको दिखलाकर उनकी परीक्षा करनेके लिये उनसे पूछा,-“रूपने मेरे हृदयकी गूढ़ बातको कैसे जान लिया?” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“अवश्य ही आपने रूपपर कृपा की है, अन्यथा उस श्लोकके अर्थको कोई भी नहीं जान सकता। इसलिये मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने पूर्वकालमें इसपर कृपा की होगी॥” 85-87 ॥ स्वरूपसे महाप्रभुके द्वारा प्रयागमें रूपशिक्षा-वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,-“इँहो आमाय प्रयागे मिलिल। योग्यपात्र जानि मोर कृपा त' हइल ॥ 88 ॥ तबे शक्ति सञ्चारि' आमि कैलुँ उपदेश। तुमिह कहिओ इँहाय रसेर विशेष ॥” 89 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“यह (रूप) मुझसे प्रयागमें मिला था। इसे योग्यपात्र जानकर मैंने इसपर कृपा की थी। तब मैंने इसमें अपनी शक्तिका सञ्चार करके इसे उपदेश दिया था। हे स्वरूप ! तुम भी इसे उपदेश देना और विशेषकर रसत्तत्वके विषयमें बतलाना॥” 88-89 ॥ श्रीस्वरूपके अनुमानकी यथार्थता :- स्वरूप कहे,-“याते एइ श्लोक देखिलुँ। तुमि करियाछ कृपा, तबँहि जानिलु ॥ 90 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे कहा,-“मैंने जैसे ही इस श्लोकको देखा, मैं तभी जान गया कि आपने इसपर कृपा की है॥ 90 ॥

[ 1/91–98 पहला अध्याय 13 फलके द्वारा उसके कारणका अनुमान :- न्याय-वचन- “फलेन फलकारणमनुमीयते॥” 91 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-फलके द्वारा ही फलके कारणका अनुमान होता है॥ 91 ॥ जैसा कारण वैसा कार्य :- नैषधी (3/17)में दमयन्तीके प्रति हंसवाक्य- स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां नाना-मृणालाग्रभुजो भजामः। अन्नानुरूपां तनुरूपऋद्धिं कार्यं निदानाद्धि गुणानधीते॥” 92 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्वर्ग-गङ्गाके सुवर्ण-कमलके अग्र भागोंका भोजन करके ही हम उनके समान शरीरके सौन्दर्यको प्राप्त हुए हैं; क्योंकि मूलकारणके अनुरूप ही गुणगण उदित होते हैं॥” 92 ॥ अनुभाष्य- [हे दमयन्ति,] स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां (स्वर्गाप-गायाः स्वर्गङ्गायाः मन्दाकिन्याः हेममृणालिनीनां स्वर्णतुल्यपद्मानां) नानाम्ॄणालाग्रभुजः (विविध-कोमल-पद्माग्रभोजनशीलाः वयम्) अन्नानुरूपां (भुक्तसदृशीं) तनुरूपऋद्धिं (देहलावण्य-समृद्धिं) भजामः (प्राप्नुमः); हि (यतः) कार्यं (फलं) निदानात् (आदिकारणात्) गुणान् अधीते (प्राप्नोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥ चातुर्मास्यके अन्त होनेपर गौड़ीयगणोंका गौड़में लौटना :- चातुर्मास्य रहि' गौड़े वैष्णव चलिला। रूप-गोसाञि महाप्रभुर चरणे रहिला॥ 93 ॥ अनुवाद-गौड़ीय भक्त चातुर्मासके अन्त तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहकर गौड़देश लौट गये। किन्तु श्रीरूप-गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंमें वहीं रह गये॥ 93 ॥ एकदिन श्रीरूपके नाटक लिखते समय महाप्रभुका अकस्मात् आगमन :- एकदिन रूप करेन नाटक-लिखन। आचम्बिते महाप्रभुर हैल आगमन॥ 94 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीरूप-गोस्वामी नाटक लिख रहे थे कि अकस्मात् महाप्रभुका वहाँ आगमन हुआ॥ 94 ॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका बैठना :- सम्भ्रमे दुँहे उठि' दण्डवत् हैला। दुँहे आलिङ्गिया प्रभु आसने बसिला॥ 95 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपने शीघ्रतासे उठकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु दोनोंको आलिङ्गन करके आसनपर बैठ गये॥ 95 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप-लिखित एक पत्रको उठाना और श्रीरूपकी लिखावटको देखकर सन्तोषकी प्राप्ति :- 'क्या पुँथि लिख?' बलि' एकपत्र निला। अक्षर देखिया प्रभु मने सुखी हैला॥ 96 ॥ अनुवाद-'कौन-सा ग्रन्थ लिख रहे हो?'—यह कहकर महाप्रभुने एक तालपत्र हाथमें ले लिया। श्रीरूपकी लिखावटको देखकर महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 96 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपकी लिखावटकी प्रशंसा :- श्रीरूपेर अक्षर-येन मुकुतार पाँति। प्रीत हञा करेन प्रभु अक्षरेर स्तुति॥ 97 ॥ अनुवाद-श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षर मानों मुक्ताओंकी पंक्ति हो। प्रसन्न होकर महाप्रभुने श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षरोंकी बहुत प्रशंसा की॥ 97 ॥ एक श्लोकको देखकर महाप्रभुमें प्रेमावेश :- सेइ पत्रे प्रभु एक श्लोक देखिला। पड़ितेइ श्लोक, प्रेमे आविष्ट हइला॥ 98 ॥

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14 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/98-104 ] अनुवाद-महाप्रभुने उस पत्रपर लिखे एक श्लोकको देखा। उस श्लोकको पढ़ते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये॥ 98 ॥ कृष्णनाम-माधुर्यका आस्वादन-सूचक श्लोक :- विदग्धमाधव (1/15)में नान्दीके प्रति पौर्णमासीका वाक्य- तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये कर्णक्रोडकड़म्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम्। चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥ 99 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कृष्ण' ये दो वर्ण कितने अमृतके साथ उत्पन्न हुए हैं, मैं उसे नहीं जानती; -देखो, जब (नर्तकीकी भाँति) वे मुखमें नृत्य करते हैं, तब बहुतसे मुख प्राप्त करनेके लिये रतिका विस्तार (अर्थात् आसक्ति वर्धित) करते हैं; जब कर्णकुहरोंमें प्रवेश करते हैं (अङ्कुरित होते हैं), तब अरबों कानोंके लिये स्पृहा उत्पन्न होती है; जब चित्तके प्राङ्गणमें (सङ्गिनीरूपमें) उदित होते हैं, तब समस्त इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं [अर्थात् अपनेमें आविष्ट करके उन्हें चेष्टाशून्य कर देते हैं] ॥ 99 ॥ अनुभाष्य- कृष्णः इति वर्णद्वयी कियद्भिः (कियत्परिमितैः) अमृतैः [सह] जनिता (उत्पादिता), [तत् अहं] नो जाने (न वेद्मि), [यतः सा हे नान्दीमुखि], तुण्डे (मुखे) ताण्डविनी (ताण्डवं-'पुंनृत्यं ताण्डवं प्रोक्तं' इति वाक्यात् 'नाट्यं', तत् कुर्वती सती) तुण्डावली-लब्धये (बहुवदनश्रेणीनां प्राप्तये) रतिं (स्पृहां) वितनुते (प्रकाशयति); कर्णक्रोडकड़म्बिनी (कर्णपदव्यां कड़म्बिनी अङ्कुरिता सती) कर्णाबुदेभ्यः (अर्बुदसंख्यामित-कर्णलाभाय) स्पृहां (वाञ्छां) घटयते; चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी (चेतः एव प्राङ्गणं तस्मिन् सहचरी सती) सर्वेन्द्रियाणाम् (इन्द्रियसमुहानां) कृतिं (व्यापारं) विजयते (पराजयते, तदाविष्टं कारयित्वा चेष्टाशून्यं करोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥ श्लोकको सुनकर नामाचार्यका आनन्दसे नृत्य :- श्लोक शुनि' हरिदास हइला उल्लासी। नाचिते लागिला श्लोकेर अर्थ प्रशंसि' ॥ 100 ॥ श्लोककी अद्वितीय कृष्णनाम-माहात्म्यकी सूचना :- “कृष्णनामेर महिमा शास्त्र-साधु-मुखे जानि। नामेर महिमा ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥” 101 ॥ अनुवाद-उपरोक्त श्लोकको सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उल्लसित होकर नाचने लगे और श्लोकके भावार्थकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“मैंने शास्त्रोंसे और साधुओंके मुखसे कृष्णनामकी महिमाको जाना है, किन्तु आज तक नामकी ऐसी महिमा कहींपर भी नहीं सुनी ॥” 100-101 ॥ महाप्रभुका मध्याह्न स्नानके लिये गमन :- तबे महाप्रभु दुँहे करि' आलिङ्गन। मध्याह्न करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 102 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु दोनोंको (श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूपको) आलिङ्गन करके मध्याह्नके स्नानके लिये समुद्रकी ओर चल दिये ॥ 102 ॥ अन्य एकदिन श्रीस्वरूप-रामानन्द-भट्टादिके साथ महाप्रभुका श्रीरूपके समीप आगमन :- आर दिन महाप्रभु देखि' जगन्नाथ। सार्वभौम-रामानन्द-स्वरूपादि-साथ ॥ 103 ॥ मार्गमें स्वयं अपने श्रीमुखसे श्रीरूपकी प्रशंसा करना :- सबे मिलि' चलि आइला श्रीरूपे मिलिते। पथे ताँर गुण सबारे लागिला कहिते ॥ 104 ॥ अनुवाद-अन्य एकदिन महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदर आदिको साथ लेकर श्रीरूपसे मिलनेके लिये चल पड़े। मार्गमें महाप्रभु सबको श्रीरूपके गुणोंकी प्रशंसा करने लगे ॥ 103-104 ॥

[ 1/105-111 पहला अध्याय 15 श्रीरूपके द्वारा रचित "प्रियः सोऽयं" और "तुण्डे ताण्डविनी" श्लोककी प्रशंसा :- दुइ श्लोक कहि' प्रभुर हैल महासुख। निज-भक्तेर गुण कहे हञा पञ्चमुख ॥ 105 ॥ श्रीराय और श्रीभट्टसे स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके गुणोंका वर्णन :- सार्वभौम-रामानन्दे परीक्षा करिते। श्रीरूपेर गुण दुँहारे लागिला कहिते ॥ 106 ॥ अनुवाद- महाप्रभुको श्रीरूपके द्वारा रचित 'प्रियः सोऽयं' और 'तुण्डे ताण्डविनी'- इन दो श्लोकोंका पाठ करके ऐसा आनन्द हुआ कि वे मानो पाँच मुखवाले होकर अपने भक्तके गुणोंका वर्णन करने लगे। महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द रायके द्वारा श्रीरूपकी परीक्षा करवानेके लिये उन्हें अपने साथ श्रीरूपके पास लेकर जा रहे थे। महाप्रभु उन दोनोंसे श्रीरूपके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ 105-106 ॥ भगवान्का भक्तवात्सल्य :- ईश्वर-स्वभाव'-भक्तेर ना लय अपराध। अल्पसेवा बहु माने आत्मपर्यन्त प्रसाद ॥ 107 ॥ अनुवाद- ईश्वरका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे अपने भक्तके अपराधोंको ग्रहण नहीं करते। अपितु अपने भक्तके द्वारा की गयी थोड़ी-सी सेवाको भी बहुत मानकर उन्हें स्वयं तकको भी प्रदान कर देते हैं॥ 107 ॥ अनुभाष्य - 'आत्मपर्यन्त प्रसाद'- आत्माको अर्थात् स्वयंको प्रदान करने रूपी अनुग्रह तक करते हैं॥ 107 ॥ भक्तके प्रति भगवान्का व्यवहार :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/138) में- भृत्यस्य पश्यति गुरून्नपि नापराधान् सेवां मनागपि कृतां बहुधाभ्युपैति। आविष्करोति पिशुनेष्वपि नाभ्यसूयां शीलेन निर्मलमतिः पुरुषोत्तमोऽयम् ॥ 108 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् पुरुषोत्तम - अपनी निर्मल-मति तथा अपने शीलता धर्मके द्वारा इन सेवकोंके भारी सब अपराधोंको भी नहीं देखते; अति अल्प सेवाको भी बहुत मानते हैं और स्वयंकी निन्दा करनेवाले दुर्जनके प्रति भी असूया (दोष-दृष्टि) आविष्कार (प्रकाश) नहीं करते ॥ 108 ॥ अनुभाष्य - अयं निर्मलमतिः (निर्मला नैसर्गिक-रागद्वेषादिवर्जिता मतिः यस्य सः) पुरुषोत्तमः (कृष्णः, - 'कमलेक्षणः' इति पाठान्तरे) शीलेन (सत्स्वभावेन) भृत्यस्य (किङ्करस्य) गुरून् (महतः) अपि अपराधान् न पश्यति; मनाक् (ईषत्) अपि कृतां (अनुष्ठितां) सेवां बहुधा (बहुप्रकारतया) अभ्युपैति (अङ्गीकरोति); पिशुनेषु (खलेषु दुर्जनेषु वा) अपि अभ्यसूयात् (दोषदृष्टिं) न आविष्करोति (न प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको उनके गणोंके सहित प्रणाम :- भक्तसङ्गे प्रभु आइला, देखि' दुइ जन। दण्डवत् हञा कैला चरण-वन्दन ॥ 109 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंके सङ्ग आये हैं, यह देखकर श्रीरूप और श्रीहरिदास ठाकुरने दण्डवत् होकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 109 ॥ भक्तोंसे घिरे हुए महाप्रभुके सामने उनसे निम्न आसनपर दोनोंका दीनतापूर्वक बैठना :- भक्तसङ्गे कैला प्रभु दुँहारे मिलन। पिण्डात बसिला प्रभु लञा भक्तगण ॥ 110 ॥ रूप, हरिदास दुँहे बसिला पिण्डातले। सबार अग्रे ना उठिला पिँड़ार उपरे ॥ 111 ॥ अनुवाद - महाप्रभु अपने भक्तों सहित श्रीरूप और श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले। महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ लेकर चबूतरेके ऊपर बैठ गये। श्रीरूप और श्रीहरिदास

16 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/111-118 ] ठाकुर-ये दोनों चबूतरेके नीचे बैठे, महाप्रभु और उनके भक्तोंके साथ ये लोग चबूतरेके ऊपर नहीं बैठे ॥ 111॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "प्रियः सोऽयं" श्लोकका पाठ करनेका आदेश, श्रीरूपकी लज्जा और मौन :- “पूर्वश्लोक पड़, रूप", प्रभु आज्ञा कैला। लज्जाते ना पड़े रूप मौन धरिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको आज्ञा दी, - “हे रूप ! पूर्वश्लोक ('प्रियः सोऽयं') श्लोकका पाठ करो।" श्रीरूपने लज्जाके कारण उसका पाठ नहीं किया, केवल मौन धारण करके रहे ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ, उसके श्रवणसे सभीको विस्मय :- स्वरूप-गोसाञि तबे सेइ श्लोक पड़िल। शुनि' सबाकार चित्ते चमत्कार हैल ॥ 113 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने उस श्लोकका पाठ किया, जिसे सुनकर सभीके चित्तमें चमत्कार हुआ ॥ 113 ॥ पद्यावली (383) में श्रीरूपगोस्वामी-रचित श्लोक :- प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित- स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्। तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति ॥ 114 ॥ अनुवाद-हे सहचरी ! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है; तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमस्वरके आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है ॥ 114 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/76 संख्या देखें ॥ 114 ॥ श्रीरामानन्दादि भक्तोंका अनुमान- महाप्रभुकी कृपाके फलसे ही श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके भावको जानना :- राय, भट्टाचार्य बोले, - “तोमार प्रसाद बिना। तोमार हृदय एइ जानिबे केमने ॥ 115 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा, - “आपकी कृपाके बिना यह (श्रीरूप) आपके हृदयके भावको कैसे जान सकता है ?”115 ॥ आमाते सञ्चारि' पूर्वे कहिला सिद्धान्त। ये-सब सिद्धान्ते ब्रह्मा नाहि पाय अन्त ॥ 116 ॥ ताते जानि-पूर्वे तोमार पाञाछे प्रसाद। ताहा बिना नहे तोमार हृदयानुवाद ॥” 117 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “आपने पहले [गोदावरीके तटपर] मुझमें अपनी शक्तिका सञ्चार करके मेरे मुखसे उन सब सिद्धान्तोंको कहलवाया था, जिन्हें ब्रह्मा तक भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते। इसके द्वारा मैं जान गया कि रूपने भी पूर्वकालमें आपकी कृपाको प्राप्त किया है, उसके बिना यह आपके हृदयके गूढ़ भावोंको नहीं कह सकता ॥”116-117 ॥ अनुभाष्य- 'पूर्वे' - [श्रीरायके ऊपर कृपाके लिये] मध्यलीलाका आठवाँ अध्याय देखें। 'हृदयानुवाद'-मनके भावोंको कहना ॥ 116-117 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "तुण्डे ताण्डविनी" श्लोकका पाठ करनेका आदेश :- प्रभु कहे, - कह “रूप, नाटकेर श्लोक। ये श्लोक शुनिले लोकेर याय दुःख-शोक ॥”118 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीसे कहा,- “हे रूप, तुम अब नाटकके उस श्लोकका पाठ करो, जिसे सुननेसे लोगोंके दुःख और शोक दूर हो जाते हैं ॥” 118 ॥