श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2026, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/64-71 पहला अध्याय 9 मत्त होकर नृत्य करने लगे ॥ 64 ॥ अगले दिन श्रीरूपके साथ महाप्रभुका मिलन :- आर दिन प्रभु रूपे मिलिया बसिला। सर्वज्ञ-शिरोमणि प्रभु कहिते लागिला ॥ 65 ॥ महाप्रभुका कृपा-आदेश ही विदग्धमाधवकी रचनाके शुभारम्भका मूल कारण :- “कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह व्रज हैते। व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु ना यान काँहाते ॥ 66 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु आकर श्रीरूप गोस्वामीसे मिलकर वहाँ बैठे। तब सर्वज्ञ-शिरोमणि महाप्रभु उनसे कहने लगे,–“श्रीकृष्णको व्रजसे बाहर मत करना, श्रीकृष्ण व्रजको छोड़कर कदापि कहीं भी नहीं जाते ॥ 65-66 ॥ केवलमात्र व्रजमें ही व्रजेन्द्रनन्दनका अवस्थान :- लघुभागवतामृत (1/5/461)में उद्धृत यामलवचन- कृष्णोऽन्यो यदुसम्भुतो यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः। वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति ॥”67॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व हैं, इसलिये वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा और द्वारकामें लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे वृन्दावनका परित्यग करके कहीं भी नहीं जाते ॥”67॥ अनुभाष्य- यदुसम्भूतः (यदुकुलोत्पन्नः) कृष्णः-अन्यः (व्रजेन्द्रनन्दनात् अपरः); यः तु गोपेन्द्रनन्दनः (नन्दसुतः) सः तु वृन्दावनं परित्यज्य (विहाय) क्वचित् (कुत्रापि) नैव गच्छति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥ महाप्रभुके वाक्यसे श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :- एत कहि' महाप्रभु मध्याह्ने चलिला। रूप-गोसाञि मने किछु विस्मय हइला ॥ 68 ॥ श्रीसत्यभामा-देवी और महाप्रभु, दोनोंका ही पृथक् रूपसे यथाक्रम ललितमाधव और विदग्धमाधव नाटक लिखनेके लिये आदेश देना :- “पृथक् नाटक करिते सत्यभामा आज्ञा दिल। जानिलुँ पृथक् नाटक करिते प्रभु-आज्ञा हैल ॥ 69 ॥ पहले एकत्र वर्णित दोनों नाटकोंका अब पृथक् रूपसे चिन्तन और रचना :- पूर्वे दुइ नाटक छिल एकत्र रचना। दुइभाग करि एबे करिमु घटना ॥ 70 ॥ नान्दी, प्रस्ताव और विषय आदि सब कुछका ही पृथक् रूपसे चिन्तन :- दुइ 'नान्दी'-'प्रस्तावना', दुइ 'संघटना'। पृथक् करिया लिखि करिया भावना ॥”71॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न कृत्य करनेके लिये चले गये। श्रीरूप गोस्वामीके मनमें कुछ विस्मय हुआ,–“श्रीसत्यभामा देवीने (अपनी पुरलीलाके लिये) पृथक् नाटककी रचना करनेकी आज्ञा दी थी। अब यह जाना कि महाप्रभुने भी (वृन्दावन और पुर लीलाओंके लिये) पृथक् नाटकोंकी रचना करनेकी आज्ञा दी है। पहले मैं दोनों नाटकोंकी एकसाथ रचना कर रहा था, किन्तु अब मैं उसे (श्रीकृष्णकी व्रजलीला और पुरलीला) इन दो भागोंमें विभक्त कर दूँगा। मैं दोनों नाटकोंके लिये पृथक्-पृथक् 'नान्दी', 'प्रस्तावना' और 'लीलाओं'का भली-भाँति विचार करके लिखूँगा ॥”68-71 ॥ अनुभाष्य- 'दुइ भाग'-विदग्धमाधवमें व्रजलीला एवं ललितमाधवमें पुरलीला,–ये दो भाग हैं। साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 287 श्लोकमें- “नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा। सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः। आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा॥” अर्थात् “नटी, विदूषक अथवा पार्श्ववर्ती नट,-ये