भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2027

10 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/69-74 ] सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कर्त्तव्यकार्य-विषयक वास्तविक वृत्तान्तको उठाकर मधुर वचनोंके द्वारा परस्पर सम्पूर्ण रूपसे आलाप करते हैं, उसीको 'आमुख' जानना होगा, वही 'प्रस्तावना' (अभिनयके आरम्भ करनेका प्रस्ताव) है॥ 70-71॥ अमृतानुकणिका-श्रीयुत रूप गोस्वामीने वृन्दावनमें सेवाकुञ्जके अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी भजनस्थलीमें 'ललितमाधव' नामक एक नाटक लिखना आरम्भ किया। वे उस नाटकमें वृन्दावनकी लीला और पुरकी लीला अर्थात् द्वारकाकी लीलाको मिलाकर एक साथ लिख रहे थे। श्रीभागवतमें श्रीकृष्णके मथुरा और द्वारका गमनके पश्चात् व्रजमें लौटकर श्रीराधिका आदि गोपियोंसे मिलनका कोई वर्णन नहीं है। श्रीरूप गोस्वामी विरहके बाद मिलन अर्थात् दोनोंका संयोग कराना चाहते थे और यह बतलाना चाहते थे कि श्रीरुक्मिणी, श्रीसत्यभामा आदि श्रीराधिका और उनकी सखियोंके ही प्रकाश विग्रह हैं, पृथक् नहीं है। यह दिखलाकर वे दोनोंका मिलन करवाना चाहते थे। इसलिये दोनोंका मङ्गलाचरण-नान्दी श्लोक आदि सबको एक ही करके लिखते जा रहे थे। जब श्रीरूप गोस्वामी उड़ीसाकी सीमापर सत्यभामापुरमें आये, तो रात्रिमें विश्राम करते हुए उन्होंने एक स्वप्न देखा। उस स्वप्नमें श्रीसत्यभामाजीने उनसे कहा कि तुम पुरकी लीला और वृन्दावनकी लीलाको एक साथ मिलाकर नहीं लिखना। पुरकी लीलाको पृथक् रूपमें लिखना। महाप्रभुने भी उनको कुछ ऐसी ही प्रेरणा दी कि दोनों लीलाओंको एक नहीं करना अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णको व्रजसे बाहर मत निकालना। “कृष्णोऽन्यो यदुसम्भूतों यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः। वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति॥” “यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व हैं, इसलिये वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा और द्वारकामें लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे वृन्दावनका परित्याग करके कहीं भी नहीं जाते।” इसलिये उन गोपेन्द्रनन्दनको द्वारका या मथुरामें मत ले जाना और मथुरा-द्वारकावाले वासुदेव कृष्णको व्रजमें मत पहुँचाना। यह सुनकर श्रीरूप गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ललितमाधव और विदग्धमाधव, उसको दो खण्डोंमें करके लिखा। उन्होंने वृन्दावनमें सेवाकुञ्जके अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी भजनस्थलीमें जहाँसे एक नाटकके रूपमें आरम्भ किया था, वहीं इन दोनों नाटकोंको पूर्ण किया।-“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 69-71 ॥ विप्रलम्भ-भावमें निमग्न महाप्रभुके मुखसे श्लोकको सुनकर श्रीरूपके द्वारा उस भावको सूचित करनेवाले एक श्लोककी रचना :- रथयात्राय जगन्नाथ-दर्शन करिला। रथ-अग्रे प्रभुर नृत्य-कीर्त्तन देखिला ॥ 72 ॥ प्रभुर नृत्य-श्लोक शुनि' श्रीरूप-गोसाञि। सेइ श्लोकार्थ लञा श्लोक करिला तथाइ ॥ 73 ॥ अनुवाद-श्रीरूपने रथयात्रामें भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन किये तथा रथके सामने महाप्रभुके नृत्य-कीर्तनको भी देखा। नृत्य करते समय महाप्रभुके द्वारा एक श्लोकके पाठको श्रीरूपने सुना और उसी श्लोकके भावोंके अनुरूप उन्होंने वहीं एक नये श्लोककी रचना कर दी॥ 72-73 ॥ मध्यलीलाके पहले अध्यायमें वर्णित होनेपर भी अब पुनः संक्षेपमें वर्णन :- पूर्वे सेइ सब कथा करियाछि वर्णन। तथापि कहिये किछु संक्षेपे कथन ॥ 74 ॥ अनुवाद-यद्यपि मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) पहले मध्यलीलामें इस प्रसङ्गका वर्णन किया है, तथापि मैं संक्षेपमें इस विषयमें कुछ लिख रहा हूँ॥ 74 ॥