श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2033, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें16 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/111-118 ] ठाकुर-ये दोनों चबूतरेके नीचे बैठे, महाप्रभु और उनके भक्तोंके साथ ये लोग चबूतरेके ऊपर नहीं बैठे ॥ 111॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "प्रियः सोऽयं" श्लोकका पाठ करनेका आदेश, श्रीरूपकी लज्जा और मौन :- “पूर्वश्लोक पड़, रूप", प्रभु आज्ञा कैला। लज्जाते ना पड़े रूप मौन धरिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको आज्ञा दी, - “हे रूप ! पूर्वश्लोक ('प्रियः सोऽयं') श्लोकका पाठ करो।" श्रीरूपने लज्जाके कारण उसका पाठ नहीं किया, केवल मौन धारण करके रहे ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ, उसके श्रवणसे सभीको विस्मय :- स्वरूप-गोसाञि तबे सेइ श्लोक पड़िल। शुनि' सबाकार चित्ते चमत्कार हैल ॥ 113 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने उस श्लोकका पाठ किया, जिसे सुनकर सभीके चित्तमें चमत्कार हुआ ॥ 113 ॥ पद्यावली (383) में श्रीरूपगोस्वामी-रचित श्लोक :- प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित- स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्। तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति ॥ 114 ॥ अनुवाद-हे सहचरी ! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है; तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमस्वरके आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है ॥ 114 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/76 संख्या देखें ॥ 114 ॥ श्रीरामानन्दादि भक्तोंका अनुमान- महाप्रभुकी कृपाके फलसे ही श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके भावको जानना :- राय, भट्टाचार्य बोले, - “तोमार प्रसाद बिना। तोमार हृदय एइ जानिबे केमने ॥ 115 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा, - “आपकी कृपाके बिना यह (श्रीरूप) आपके हृदयके भावको कैसे जान सकता है ?”115 ॥ आमाते सञ्चारि' पूर्वे कहिला सिद्धान्त। ये-सब सिद्धान्ते ब्रह्मा नाहि पाय अन्त ॥ 116 ॥ ताते जानि-पूर्वे तोमार पाञाछे प्रसाद। ताहा बिना नहे तोमार हृदयानुवाद ॥” 117 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “आपने पहले [गोदावरीके तटपर] मुझमें अपनी शक्तिका सञ्चार करके मेरे मुखसे उन सब सिद्धान्तोंको कहलवाया था, जिन्हें ब्रह्मा तक भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते। इसके द्वारा मैं जान गया कि रूपने भी पूर्वकालमें आपकी कृपाको प्राप्त किया है, उसके बिना यह आपके हृदयके गूढ़ भावोंको नहीं कह सकता ॥”116-117 ॥ अनुभाष्य- 'पूर्वे' - [श्रीरायके ऊपर कृपाके लिये] मध्यलीलाका आठवाँ अध्याय देखें। 'हृदयानुवाद'-मनके भावोंको कहना ॥ 116-117 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "तुण्डे ताण्डविनी" श्लोकका पाठ करनेका आदेश :- प्रभु कहे, - कह “रूप, नाटकेर श्लोक। ये श्लोक शुनिले लोकेर याय दुःख-शोक ॥”118 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीसे कहा,- “हे रूप, तुम अब नाटकके उस श्लोकका पाठ करो, जिसे सुननेसे लोगोंके दुःख और शोक दूर हो जाते हैं ॥” 118 ॥