भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2034, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2034

[ 1/119-126 पहला अध्याय 17 [बायाँ स्तम्भ] पहले स्वरचित श्लोकके पाठ करनेमें लज्जा, बादमें उसका पाठ :- बार बार प्रभु ताते आज्ञा यदि दिला। तबे सेइ श्लोक रूप कहिते लागिला ॥ 119 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभुने बार-बार श्रीरूपको उस श्लोकका पाठ करनेका आदेश दिया, तब श्रीरूप उस श्लोकको कहने लगे ॥ 119 ॥ विदग्धमाधव (1/15) में— तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये कर्णक्रोडकड़म्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम्। चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥ 120 ॥ अनुवाद—'कृष्ण' ये दो वर्ण कितने अमृतके साथ उत्पन्न हुए हैं, मैं उसे नहीं जानती;—देखो, जब (नर्तकीकी भाँति) वे मुखमें नृत्य करते हैं, तब बहुतसे मुख प्राप्त करनेके लिये रतिका विस्तार (अर्थात् आसक्ति वर्धित) करते हैं; जब कर्णकुहरोंमें प्रवेश करते हैं (अङ्कुरित होते हैं), तब अरबों कानोंके लिये स्पृहा उत्पन्न होती है; जब चित्तके प्राङ्गणमें (सङ्गिनीरूपमें) उदित होते हैं, तब समस्त इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं [अपनेमें आविष्ट करके उन्हें चेष्टाशून्य कर देते हैं] ॥ 120 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 1/99 संख्या देखें ॥ 120 ॥ श्लोकको सुनकर रामानन्दादि भक्तोंमें विस्मय और सुख :- यत भक्तवृन्द आर रामानन्द राय। श्लोक शुनि' सबार हइल आनन्द-विस्मय ॥ 121 ॥ अनुवाद—श्रीरूपके मुखसे उक्त श्लोकको सुनकर समस्त भक्तों और श्रीरायरामानन्दको बहुत आनन्द तथा विस्मय हुआ ॥ 121 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अद्वितीय कृष्णनामकी माधुरीका प्रकाशक श्लोक :- सबे बोले,—“नाम-महिमा शुनियाछि अपार। एमन माधुर्य केह वर्णे नाहि आर ॥” 122 ॥ अनुवाद—सभी कहने लगे,—“हमने नामकी अपार महिमाका श्रवण किया है, किन्तु नामके ऐसे माधुर्यका वर्णन अन्य किसीने भी नहीं किया ॥” 122 ॥ श्रीराय-रूप-संलाप-वर्णन; श्रीरायके द्वारा मूल-ग्रन्थके परिचयकी जिज्ञासा :- राय कहे,—“कोन् ग्रन्थ कर हेन जानि ? याहार भितरे एइ सिद्धान्तेर खनि ??” 123 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने पूछा,—“तुम ऐसे कौनसे ग्रन्थकी रचना कर रहे हो जिसके भीतर ऐसे सिद्धान्तकी खान है?” 123 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा दोनों नाटकोंका परिचय देना :- स्वरूप कहे,—“कृष्णलीलार नाटक करिते। व्रजलीला-पुरलीला एकत्र वर्णिते ॥ 124 ॥ आरम्भिया छिला, एबे प्रभु-आज्ञा पाञा। दुइ नाटक करियाछेन विभाग करिया ॥ 125 ॥ व्रजलीलात्मक-विदग्धमाधव और पुरलीलात्मक-ललितमाधव :- विदग्धमाधव आर ललितमाधव। दुइ नाटके प्रेमरस अद्भुत सब ॥” 126 ॥ अनुवाद—[श्रीरूपके उत्तर नहीं देनेपर] श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“रूपने कृष्णलीलापर एक नाटककी रचना करना आरम्भ किया जिसमें ब्रजलीला और पुरलीलाका एक साथ वर्णन किया था। किन्तु अब महाप्रभुकी आज्ञाको प्राप्त करके रूपने उस नाटकके दो भाग कर दिये हैं। विदग्धमाधव और ललितमाधव—इन दोनों नाटकोंमें अद्भुत प्रेमरस भरा है ॥” 124-126 ॥ अनुभाष्य—'विदग्धमाधव' 1454 शकाब्दमें और 'ललितमाधव' 1459 शकाब्दमें रचित हुआ। 1437