श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2035, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें18 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/126-131 ] शकाब्दमें इन दोनों ग्रन्थोंके प्रसङ्गमें श्रीराय-रामानन्दके साथ श्रीरूपगोस्वामीका आलाप हो रहा है॥ 126 ॥ श्रीरूपको श्रीरायके द्वारा विदग्धमाधवके नान्दी श्लोकके पठनका अनुरोध :- राय कहे,—“नान्दी-श्लोक पड़ देखि, शुनि ?” श्रीरूप श्लोक पड़े प्रभु-आज्ञा मानि' ॥ 127 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने श्रीरूपसे कहा,—“तुम विदग्धमाधव नाटकके नान्दी-श्लोकको पढ़ो जिससे मैं भी सुनकर देखूँ कि उसमें क्या लिखा है?” इसे महाप्रभुकी आज्ञा मानकर श्रीरूपने नान्दी-श्लोकका पाठ किया॥ 127 ॥ अनुभाष्य—अब श्रीरामानन्द श्रीरूपके द्वारा रचित 'विदग्धमाधव' नाटकके विषयकी जिज्ञासा कर रहे हैं॥ 127 ॥ जगत्के मङ्गलका विधान करनेवाली कृष्णलीला :- विदग्धमाधवके मङ्गलाचरण (1/1) में— सुधानां चान्द्रीणामपि मधुरिमोन्माद-दमनी दधाना राधादिप्रणयघनसारैः सुरभिताम्। समन्तात् सन्तापोद्गम-विषमसंसार-सरणी- प्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरिलीला-शिखरिणी ॥ 128 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह हरिलीलारूपी श्रीखण्ड सन्ताप-उत्पादक विषमसंसार-मार्गमें भ्रमणसे जनित आपकी असत् तृष्णाका सम्पूर्णरूपसे हरण करे। यह हरिलीलारूपी श्रीखण्ड चन्द्र-सुधाकी मधुरिमासे उत्पन्न मत्तताका दमन करती है और श्रीराधादिके प्रणयरूपी कर्पूरके द्वारा विशेष सौरभको धारण किये हुए है॥ 128 ॥ अनुभाष्य— चान्द्रीणां (चन्द्रसम्बन्धिनीनां) सुधानाम् अपि मधुरिमोन्माददमनी (मधुरिमोन्मादनाहेतु यः उन्मादः—'अहमेव सर्वतो माधुर्यशालिनी' इति योऽहङ्कारः तं दमयितुं शीलं यस्याः सा) राधादिप्रणयघनसारैः (राधादीनां प्रणयाः एव घनसाराः कर्पूराः तैः) सुरभितां (सौगन्ध्यं, पक्षे मनोहारित्वं) दधाना हरिलीला-शिखरिणी (हरिलीलारूपा रसाला) समन्तात् (सर्वतः) ते (तव) सन्तापोद्गम- विषमसंसार-सरणीप्रणीतां (सन्तानाम् आध्यात्मिकादीनाम् उद्गमो यस्याम् एवम्भूता या विषमा देवनरस्थावरात्व-प्रापक-लक्षणा संसाररूपा सरणी पन्थाः तत्प्रणीतां तत्पर्यटनजनितां) तृष्णां हरतु (दूरीकरोतु)। श्लोक-भावानुवाद—चन्द्र-सुधाके अहङ्कार कि मैं तो सबसे अधिक माधुर्यशालिनी हूँ, इसको दमन करनेवाली श्रीराधादिके प्रणयरूपी कर्पूरके द्वारा विशेष सुगन्ध अथवा मनोहारित्वको धारण किये हुए हरिलीला-शिखरिणी (हरिलीलारूपी श्रीखण्ड) आप सबकी आध्यात्मिकादि सन्तापका उत्पादन करनेवाली विषम (देव-नर-स्थावरादि योनियोंको प्राप्त करानेवाले) संसार-मार्गमें भ्रमणसे जनित असत् तृष्णाको सम्पूर्णरूपसे दूर करे॥ 128 ॥ श्रीरायके द्वारा श्रीरूपको अपने अभीष्ट देवके वर्णनका अनुरोध, श्रीरूपकी लज्जा :- राय कहे,—“कह इष्टदेवेर वर्णन।” प्रभुर सङ्कोचे रूप ना करे पठन ॥ 129 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“इष्टदेवकी महिमा वर्णन करनेवाले श्लोकका पाठ करो।” महाप्रभुके सामने श्रीरूप सङ्कोचवशतः उस श्लोकका पाठ नहीं कर रहे थे॥ 129 ॥ महाप्रभुका अनुरोधपूर्वक आदेश :- प्रभु कहे,—“कह ना केने, कि सङ्कोच-लाजे? ग्रन्थेर फल शुनाइबा वैष्णव-समाजे??” 130 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“बोलते क्यों नहीं, इसमें कैसा सङ्कोच और लज्जा? ग्रन्थकी रचनाका फल वैष्णव-समाज भी क्यों न सुने?” 130 ॥ श्रीरूपके द्वारा आशीर्वाद-श्लोकका पाठ, उसे सुनकर महाप्रभुका बाहरसे कृत्रिम असन्तोष प्रकाशित करना :- तबे रूप-गोसाञि यदि श्लोक पड़िल। शुनि' प्रभु कहे,—'एइ अति स्तुति हैल॥' 131 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके ऐसा कहनेपर श्रीरूप-गोस्वामीने