श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2036, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/131-134 पहला अध्याय 19 जब उस श्लोकको पढ़ा तो उसे सुनकर महाप्रभुने कहा,—'यह तो अतिस्तुति हो गयी है॥' 131 ॥ विदग्धमाधव (1/2) में— अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ॥ 132 ॥ अनुवाद—सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान् शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। उन्होंने जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरसका दान कभी जगत्को नहीं किया, उसी निजभक्तिरूपी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकुरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥ 132 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/4 संख्या देखें। श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्त्ति-कृत विदग्धमाधव-टीका— “महाप्रभोः स्फूर्त्तिं बिना हरिलीलारसास्वादानुपपत्तेरिति भावः। वः युष्माकं हृदयरूपगुहायां शचीनन्दनो हरिः, पक्षे, सिंहः स्फुरतुः। यः शचीनन्दनः कलौ स्वभक्तिश्रियं स्वभजनसम्पत्तिं करुणया समर्पयितुमवतीर्णः। कथम्भूताम्?—अनर्पितचरीं केनापि न अर्पितपूर्वाम्। ननु कपिलादिवादिभिः स्वमात्रादिभ्यो भगवद्भजनं पूर्वं किं नोपदिष्टम्? तत्राह—सकलरससद्भावेऽपि उन्नत उज्ज्वलः रसो यस्यां तां भक्तिश्रियम्; तथा चोज्ज्वलरसप्रधाना भक्तिर्नोपदिष्टेति भावः। कथम्भूतः?—पुरटात् सुवर्णादपि सुन्दरद्युतिसमूहेन सन्दीपितः। एवं सति पर्वतकन्दरायाम् उदितः सिंहो यथा तत्रस्थान् हस्तिनो नाशयति, तथा युष्माकं हृदयकन्दरायामुदितः शचीनन्दन-स्वरूपसिंहः हृद्रोगरूपहस्तिनो नाशयतीति ध्वनिः॥” [अर्थात् “श्रीचैतन्य महाप्रभुकी स्फूर्तिके बिना हरिलीलाका रसास्वादन सिद्ध नहीं होता—यही अभिप्राय है। 'वः' अर्थात् तुम्हारी, हृदयरूपी गुफामें शचीनन्दनरूपी श्रीहरि, पक्षान्तरमें शचीनन्दन-रूपी सिंहकी स्फूर्त्ति प्राप्त हो—जो शचीनन्दन कलिकालमें 'स्वभक्तिश्रियम्' अर्थात् निजभजन-सम्पत्तिको करुणावशतः समर्पण करनेके लिये अवतीर्ण हुए हैं; वह सम्पत्ति किस प्रकारकी है? 'अनर्पितचरीं' अर्थात् वह किसीके भी द्वारा पहले अर्पित नहीं की गयी है। यदि कहो, कपिलदेवादिने क्या अपनी माताको भगवद्भजनका उपदेश नहीं दिया था? उसके लिये कह रहे हैं कि समस्त रसोंके विद्यमान होनेपर भी जिसमें उन्नत-उज्ज्वल रस है, वह भक्तिसम्पत्ति तथा उज्ज्वलरस-प्रधाना भक्ति उपदिष्ट नहीं हुई—यह भाव है। वे शचीनन्दन कैसे हैं? वे पुरट अर्थात् सुवर्णकी अपेक्षा भी सुन्दरकान्ति-समूहके द्वारा सम्पूर्ण रूपसे दैदीप्यमान हैं। इस प्रकारके होकर पर्वतकी गुफामें उदित सिंह जिस प्रकार वहाँ उपस्थित हाथियोंका नाश करता है, उसी प्रकार तुम्हारी हृदयगुफामें श्रीशचीनन्दनरूपी सिंह हृदरोगरूपी हाथीका नाश करें—यही अभिप्राय है।"]॥ 132 ॥ श्लोकके श्रवणसे भक्तोंके द्वारा प्रशंसा :— सब भक्तगण कहे श्लोक शुनिया। कृतार्थ करिला सबाय श्लोक शुनाञा ॥ 133 ॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकको सुनकर सभी उपस्थित भक्तोंंने कहा कि तुमने यह श्लोक सुनाकर हम सबको कृतार्थ कर दिया है॥ 133 ॥ श्रीरायके द्वारा विदग्धमाधवके विविध अङ्गों और परिचयकी जिज्ञासा, श्रीरूपके द्वारा नाटकमें लिखित श्लोकोंका पाठ करके उत्तर देना :— राय कहे,—“कोन् आमुखे पात्र-सन्निधान?” रूप कहे,—“कालसाम्ये 'प्रवर्त्तक' नाम॥” 134 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने पूछा,—“कौन सी प्रस्तावनाको उपलक्ष्य करके पात्रकी सर्वप्रथम रङ्गमञ्चपर उपस्थिति हुई है?” श्रीरूपने कहा,—“कालसाम्यमें अर्थात् 'प्रवर्त्तक'–नामक प्रस्तावनाको उपलक्ष्य करके पात्रका रङ्गमञ्चपर प्रवेश हुआ है॥” 134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अभिनयकारी नायकादिके (नाटकमें उल्लिखित व्यक्तियोंके) नाम—'पात्र' कहलाते हैं; जैसे, साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 283 (27) श्लोकमें— “दिव्यमर्त्यं स तद्रूपो मिश्रमन्यतरस्तयोः। सूचयेद्वस्तु बीजं वा मुखं पात्रमथापि वा॥”