श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2037, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें20 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/134-136 ] [अर्थात् “यदि नाटक देवताके विषयमें होता है, तब वह नट देवताके रूपमें, मनुष्य-विषयक होनेपर मनुष्यके रूपमें और स्वर्ग-मर्त्य दोनों-विषयक होनेपर देवता और मनुष्य, जिस-किसी एक रूपमें वस्तुबीज अथवा आमुख या फिर पात्रकी सूचना करेगा।”] 'आमुख'-शब्दका अर्थ, -जैसे, नाटकचन्द्रिका (20) में- “सूत्रधारो नटी ब्रूते स्वकार्यं प्रतियुक्तितः। प्रस्तुताक्षेपिचित्रोक्त्या यत्तदामुखमीरितम्॥” [अर्थात् “सूत्रधार चतुरायीसे प्रस्तुत-विषयकी विचित्र उक्तिके द्वारा जो अपना कार्य नटीको बतलाते हैं, वही 'आमुख' कहलाता है।"] श्रीरामानन्द रायकी जिज्ञासाका तात्पर्य यह है कि इस नाटकमें अभिनेता पात्रादिका सन्निधान (रङ्गमञ्चमें उपस्थिति) कौनसे 'आमुख'से ('प्रस्तावना'से) हुआ है? श्रीरूपका उत्तर, - कालसाम्ये (उपस्थित उस समयमें) 'प्रवर्त्तक'-रूपी (रङ्गमञ्चमें प्रवेश-रूपी) आमुखमें ही पात्रकी उपस्थिति हुई है ॥ 134 ॥ अनुभाष्य - अन्त्य-लीलाके प्रथम अध्यायकी 71 संख्या [एवं उसका अनुभाष्य] देखें। आमुख अथवा प्रस्तावना-पाँच प्रकारकी होती है; जैसे, साहित्य दर्पणके छठे अध्यायके 288 (33) वें श्लोकमें,- “उद्घात्यकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा। प्रवर्त्तकावलगिते पञ्च प्रस्तावना-भिदाः॥” अर्थात् (1) उद्घात्यक, (2) कथोद्घात, (3) प्रयोगातिशय, (4) प्रवर्त्तक, (5) अवलगित, - इन पाँच प्रकारसे नाटकका 'आमुख' अथवा 'प्रस्तावना' होती है। नाटकचन्द्रिका (21-22) में,- “त्रीण्यामुखाङ्गान्युच्यन्ते कथोद्घात-प्रवर्त्तकम् ॥ 21 ख ॥ प्रयोगातिशयश्चेति तथा वीथ्यङ्गयुग्मकम्। उद्घात्यकावलगितसंज्ञकं मुनिनोदितम् ॥”22 ॥ [अर्थात् “आमुखके तीन अङ्ग-(1) कथोद्घात, (2) प्रवर्त्तक, (3) प्रयोगातिशय एवं (4) उद्घात्यक और (5) अवलगित-ये दो वीथ्यङ्ग होते हैं। भरत मुनिने आमुखके ये ही पाँच अङ्ग बतलाये हैं।"] श्रीरामानन्दने जिज्ञासा की, - “इन कई प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें-से कौन-से प्रकारसे नाटककी प्रस्तावना लिखी गयी है?” उसके उत्तरमें श्रीरूप गोस्वामीने कहा, - “उक्त कई प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें 'प्रवर्त्तक'-प्रकारको ग्रहण किया गया है।” साहित्य-दर्पणके छठे अध्यायके 292 (37) वें श्लोकमें,- “कालं प्रवृत्तमाश्रित्य सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत्। तदाश्रयश्च पात्रस्य प्रवेशस्तत् प्रवर्त्तकम् ॥” अर्थात् “सूत्रधार उपस्थित जिस कालको आश्रय करके वर्णन करते हैं, यदि उसी कालके आश्रयमें नटरूपी पात्रका प्रवेश होता है, तब उसे 'प्रवर्त्तक' कहते हैं॥” 134 ॥ नाटकचन्द्रिका (24) में- आक्षिप्तः कालसाम्येन प्रवेशः स्यात् प्रवर्त्तकः ॥ 135 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 135 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- उपयुक्त (उपस्थित) कालके द्वारा आक्षिप्त (प्रेरित) होकर (नटरूपी पात्रके) रङ्गमञ्चपर प्रवेशको 'प्रवर्त्तक' कहते हैं॥ 135 ॥ अनुभाष्य- कालसाम्येन (प्रवृत्तकालाश्रयेण) आक्षिप्तः (प्रेषितः सन् उपस्थितं कालम् आश्रित्येत्यर्थः) पात्रस्य (नटस्य) प्रवेशः (एव, 'प्रवृत्तिः' इति वा पाठः) 'प्रवर्त्तक' स्यात्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 135 ॥ उसका उदाहरण जैसे :- विदग्धमाधव (1/10) में पारिपार्श्विकके प्रति सूत्रधारकी उक्ति- सोऽयं वसन्तसमयः समियाय यस्मिन् पूर्णं तमीश्वरमुपोढ-नवानुरागम्। गूढ़ग्रहा रुचिरया सह राधयासौ रङ्गाय सङ्गमयिता निशि पौर्णमासी ॥ 136 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वसन्तकाल उदित हुआ है;