भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2038, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2038

[ 1/136-138 पहला अध्याय 21

पौर्णमासी [देवी] रात्रिमें इस समय नव-अनुरागको प्राप्त पूर्णतम ईश्वर श्रीकृष्णको लीला-सौन्दर्यके सम्वर्धन करनेके उद्देश्यसे परम सुन्दरी श्रीराधिकाके साथ मिलायेंगी। इस श्लोकका अर्थ दो प्रकारका है-अर्थात्, चन्द्रपक्षमें एवं श्रीकृष्णपक्षमें, इनमेंसे श्रीकृष्णपक्षवाला अर्थ ही मुख्य है॥ 136 ॥ अनुभाष्य- यस्मिन् (वसन्त-समये) असौ गूढ़ग्रहा (चन्द्रज्योत्स्ना- तिशयेन गूढ़ाः आवृतरश्मयः ग्रहाः यस्यां सा) पौर्णमासी (तिथिः) निशि उपोढ़नवानुरागम् (उपोढ़ः प्राप्तः नवः अनुगतः रागः रक्तिमा येन तं) पूर्णं तमीश्वरं (तम्याः रजन्याः ईश्वरं चन्द्रं) रुचिरया (शोभनया) राधया (विशाखा-नक्षत्रेण सह) रङ्गाय (शोभार्थं) सङ्गं (सङ्गमम्) अयिता (प्रापयिता), सः अयं वसन्तसमयः समियाय (समुपागतः-एतेन कालवैशिष्ट्यमुक्तम्; पक्षे-गूढ़ः ग्रहः आग्रहः यस्याः सा भगवती पौर्णमासी, तं प्रसिद्धं पूर्णम् ईश्वरं श्रीकृष्णं रुचिरया शोभनया राधया सह रङ्गाय कौतुकरहस्यम् आविष्कर्त्तुं सङ्गमयिता)। श्लोक-भावानुवाद-[चन्द्रपक्षीय अर्थ-] जिस वसन्त-कालमें चन्द्रकी अतिशय गाढ़ ज्योत्स्नाने अन्य ग्रहसमूहकी रश्मिको आवृत कर लिया है, वह पौर्णमासी (पूर्णिमा तिथि) नवीन रक्तिमाको प्राप्त परिपूर्ण रजनीके ईश्वर अर्थात् चन्द्रको अत्यन्त सुन्दर विशाखा नक्षत्रके साथ सुशोभित करनेके लिये उनका सङ्गम करवायेगी, वह वसन्तकाल उपस्थित हुआ है। [श्रीकृष्णपक्षीय अर्थ-] यह वही वसन्तकाल उपस्थित हुआ है, जिसमें नवीन-अनुराग प्राप्त परिपूर्ण ईश्वर श्रीकृष्णचन्द्रका शोभा-सम्पन्ना श्रीराधाके साथ कौतुक-रहस्यको प्रकट करनेका अतिशय आग्रह रखनेके कारण स्वयं भगवती पौर्णमासी रात्रिकालमें मिलन करवायेंगी॥ ॥ 136॥ राय कहे,-"परोचनादि कह देखि, शुनि?" रूप कहे,-"महाप्रभुर श्रवणेच्छा जानि॥" 137 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा,-"कहो, तुमने परोचना आदिके विषयमें क्या लिखा है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ।" महाप्रभुकी भी श्रवणकी इच्छा जानकर श्रीरूप कहने लगे॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'परोचना' - देश, काल, नायक, उपस्थित लोगों आदिकी प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंको श्रवणका इच्छुक बनानेकी प्रथा ही 'परोचना' है॥ 137 ॥ अनुभाष्य-परोचना,- (नाटकचन्द्रिका 19में) - “देशकालकथा-वस्तु-सभ्यादीनां प्रशंसया। श्रोतॄणामुन्मुखीकारः कथितयेयं परोचना॥” [अर्थात् “देश-काल-कथा, वस्तु और उपस्थित श्रोताओंकी प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंको उन्मुख कराना ही परोचना कहलाता है।”] साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 286 (30)वें श्लोकमें- “तस्याः परोचना वीथी तथा प्रहसनामुखे। अङ्गान्यत्रोन्मुखीकारः प्रशंसातः परोचना॥” [अर्थात् "परोचना, वीथी, प्रहसन और आमुख-इन चारों अङ्गोंमें-से कविके काव्य और उपस्थित श्रोताओं आदिकी प्रशंसा करके श्रोताओंको अभिनयके विषयमें आकृष्ट करनेको परोचना कहा जाता है।"] “प्रस्तुताभिनयेषु प्रशंसातः श्रोतॄणां प्रवृत्त्युन्मुखीकरणं परोचना” अर्थात् “प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंकी प्रवृत्तिको [प्रस्तुत अभिनयकी ओर] उन्मुख करनेका नाम ही 'परोचना' है॥" 137 ॥ विदग्धमाधव (1/8)में सूत्रधारके प्रति पारिपार्श्विककी उक्ति :- भक्तानामुद्गादनर्गलधियां वर्गो निसर्गोज्ज्वलः शीलैः पल्लवितः स वल्लववधूबन्धोः प्रबन्धोऽप्यसौ। लेभे चत्वरताञ्च ताण्डवविधेर्वृन्दाटवीगर्भभू- र्मन्ये मद्ध्विपुण्यमण्डलपरीपाकोऽयमुन्मीलति ॥ 138 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनर्गल-बुद्धि (चतुर) और उज्ज्वल स्वभावके भक्तगण उपस्थित हुए हैं; गोपवधुओंके प्राणनाथ श्रीकृष्ण-विषयक यह प्रबन्ध भी अनेक गुणोंसे पल्लवित है; दूसरी ओर, यह रङ्गमञ्च भी वृन्दावनमें