श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें22 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/138-140 ] स्थित रासमण्डलकी नृत्यविधिका आङ्गन स्वरूप है; इसलिये मैं सोचता हूँ कि मेरे जैसे व्यक्तियोंकी सुकृतिसमूहकी यह परिपक्व-अवस्था प्रकाशित हुई है॥138॥ अनुभाष्य— अनर्गलधियाम् (अप्रतिहतबुद्धीनां चतुराणां) भक्तानां निसर्गोज्ज्वलः (स्वरूपतः एव उज्ज्वलः) वर्गः (समूहः) उद्गात् (उदयं प्राप्तवान्—एतेन पात्रवैशिष्ट्यमुक्तम्); [एवं] वल्लववधूबन्धोः (श्रीकृष्णस्य) सः असौ (विदग्धमाधवस्वरूपः) प्रबन्धः अपि शीलैः (स्वभावोक्त्यलङ्कारैः) पल्लवितः (विस्तारितः); [तथा च अत्र ग्रन्थे सर्वमेव वर्णनं स्वभावोक्त्यलङ्कारमयम्— एतेन वस्तुवैशिष्ट्यमुक्तम्], वृन्दाटवीगर्भभूः (वृन्दाटव्याः रासपीठस्वरूपा गर्भभूमिः) ताण्डवविधेः (नृत्यविधेः) चत्वरताम् (अङ्गनतां, नृत्यस्थलतां वा) लेभे (प्राप्तवती,—एतेन देशवैशिष्ट्यमुक्तम्; अतः) अयं मद्विधपुण्यमण्डलपरीपाकः (मद्विधानां मादृशजनानां पुण्यमण्डलस्य सुकृतिनिचयस्य परीपाकः उत्कर्षः) उन्मीलति (प्रकाशते)। श्लोक-भावानुवाद—चतुर और उज्ज्वल स्वभावके भक्तगण उपस्थित हुए हैं [यह पारिपार्श्विकके द्वारा श्रोता भक्तोंके वैशिष्ट्य सम्बन्धी उक्ति है]; गोपवधुओंके प्राणनाथ श्रीकृष्ण-विषयक यह प्रबन्ध (विदग्धमाधव स्वरूप) भी स्वभावोक्ति अलङ्कारसे विस्तारित है [इस ग्रन्थका वर्णन सम्पूर्णरूपसे स्वभावोक्ति-अलङ्कारमें ही है—यह वस्तु-वैशिष्ट्यकी उक्ति है]; यह रङ्गमञ्च भी वृन्दावनमें स्थित रासमण्डलकी नृत्यविधिका आङ्गन स्वरूप है अर्थात् ऐसी नृत्यस्थली प्राप्त हुई है [यह स्थानके वैशिष्ट्यकी उक्ति है]; मेरे जैसे व्यक्तियोंकी सुकृतिसमूहकी यह परिपक्व-अवस्था प्रकाशित हुई है॥138॥ विदग्धमाधव (1/6)में पारिपार्श्विकके प्रति सूत्रधारकी उक्ति :— अभिव्यक्ता मत्तः प्रकृतिलघुरूपदपि बुधा विधात्री सिद्धार्थान् हरिगुणमयी वः कृतिरियम्। पुलिन्देनाप्यग्निः किमु समिधमुन्मथ्य जनितो हिरण्यश्रेणीनामपहरति नान्तःकलुषताम्॥139॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥139॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे पण्डितगण, स्वभावतः ही मुझ जैसे लघु व्यक्तिके द्वारा भी यह हरिगुण वर्णन करनेवाली रचना अभिव्यक्त (प्रकटित) होकर आपके मनोरथकी सिद्धिका विधान करे। (अति नीचजाति) पुलिन्दके द्वारा लकड़ीके सङ्घर्षणसे उत्पन्न अग्नि क्या स्वर्ण जातीय धातुओंके भीतर स्थित मैलका नाश नहीं कर सकती? 139॥ अनुभाष्य— भोः बुधाः (सभ्याः) प्रकृतिलघुरूपात् (प्रकृत्या स्वभावेन लघुस्वरूपात् वराकात्; सरस्वती तु ग्रन्थकर्तुः तद् दैन्यमसहमाना तं रूपगोस्वामिनं स्तौति—प्रकृष्टां कृतिं लघु शीघ्रं रूपयति निरूपयति इति निवध्नाति इत्यर्थः) मत्तः (सकाशात्) अभिव्यक्ता (प्रकाशिता) इयं हरिगुणमयी (तद् वर्णनमयीत्यर्थः) कृतिः (विदग्धमाधवनाटकरूपिणी कविता) अपि वः (युष्मान्) सिद्धार्थान् (सिद्धमनोरथान् अभिलषितान्) विधात्री (विधातुं शीलं अस्याः इति विधानं कुर्यात् इत्यर्थः, यतः) पुलिन्देन (अतिनीचास्पृश्य- जातिना) अपि समिधं (काष्ठम्) उन्मथ्य जनितः (मथनेन सङ्घर्षणेन वा जातः) अग्निः अपि हिरण्यश्रेणीनां (सुवर्णसमूहानाम्) अन्तःकलुषतां किमु न अपहरति (दूरीकरोति?—तथा च युष्माकमप्यन्तर्विरहदुःखमेषा कृतिर्पहरत्येवेत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—हे पण्डितगण! स्वभावसे लघु (ऐसा मानकर श्रीरूप गोस्वामी ग्रन्थकी रचनाके लिये सरस्वतीदेवीसे दीनतापूर्वक स्तुति कर रहे हैं कि हरिगुण वर्णनकी उत्तम रचनाको मैं शीघ्र और भली-भाँति पूर्ण कर पाऊँ) मेरे द्वारा प्रकाशित यह हरिगुणमयी कृति विदग्धमाधव नाटकरूपिणी कविता आपकी अभिलाषा पूर्ण करनेका विधान करे। अतिनीच-अस्पृश्य-जातिके पुलिन्दके द्वारा लकड़ीके सङ्घर्षणसे उत्पन्न अग्नि क्या स्वर्ण जातीय धातुओंके भीतर स्थित मैलका नाश नहीं कर सकती?—[उसी प्रकार यह कविता आपके अत्यन्त विरहजनित दुःखको दूर करे—यह अर्थ है]॥139॥ राय कहे,—“कह देखि प्रेमोत्पत्ति-कारण ? पूर्वराग, विकार, चेष्टा, कामलिखन ?? ” 140 ॥ अनुवाद—श्रीरायने कहा,—“कहो, तुमने प्रेमोत्पत्तिके