भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2040, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2040

[ 1/140-142 पहला अध्याय 23 ] कारण जैसे पूर्व्वानुराग, विकार, चेष्टा तथा काम-लिखन आदिके विषयमें क्या लिखा है?॥"140॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पूर्व्वानुराग'—पूर्वराग; 'विकार'— प्रणयविकार (दिव्योन्माद-जनित व्याधि); 'चेष्टा'—प्रेमसे उत्पन्न दैहिक क्रिया; 'कामलिखन'—गोपियोंके प्रेम-प्रकाशिका लिपि। श्रीराय-रामानन्द प्रभुके द्वारा उस प्रेमकी उत्पत्तिके कारणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीरूपने इन सबका वर्णन किया॥140॥ अनुभाष्य—'कामलिखन'—(उज्ज्वलनीलमणिमें विप्रलम्भ प्रकरणमें 26 वाँ श्लोक)— “स लेखः कामलेखः स्यात् यः स्वप्रेमप्रकाशकः। युवत्या यूनि यूना च युवत्यां संप्रहीयते॥” [अर्थात् “अपने प्रेमको ज्ञापन करते हुए वह लेख या पत्र जो नायक नायिकाको और नायिका नायकको भेजती है, उसे कामलेख कहते हैं।”]॥140॥ क्रमे श्रीरूप-गोसाञि सकलि कहिल। शुनि' प्रभुर भक्तगणेर चमत्कार हैल॥141॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने क्रमशः सभीका वर्णन किया। उसे सुनकर महाप्रभुके सभी भक्तोंको बहुत आश्चर्य हुआ॥141॥ उसमें रतिकी उत्पत्तिका हेतु जैसे :— विदग्धमाधव (2/9)में श्रीललिता और श्रीविशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मतिं कृष्णेति नामाक्षरं सान्द्रोन्माद-परम्परामुपनयत्यन्यस्य वंशीकलः। एष स्निग्धघनद्युतिर्मनसि मे लग्नः पटे वीक्षणात् कष्टं धिक् पुरुषत्रये रतिरभून्मन्ये मृतिः श्रेयसी॥142॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥142॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वरागप्राप्त श्रीराधिका कह रही हैं,—किसी एक परपुरुषका 'कृष्ण' नामाक्षर श्रवण करके मेरी मति लुप्त हो गयी है; अन्य किसी एक पुरुषकी वंशीध्वनि मेरे हृदयमें घन उन्मादको उदित करा रही है; और चित्रपटमें अन्य एक पुरुषकी स्निग्ध घनकान्ति देखनेके समयसे ही, वह मेरे हृदयमें ही बस गयी है। हा धिक्कार, मेरी क्या तीन पृथक् पुरुषोंमें ऐसी रति हो गयी है? मेरा मर जाना ही अच्छा है॥142॥ अनुभाष्य— [हे सखि,] एकस्य (परपुरुषस्य) 'कृष्ण' इति नामाक्षरं श्रुतम् एव [मम राधायाः] मतिं (स्त्रीजनोचितां पातिव्रत्यबुद्धिं) लुम्पति (छिनत्ति,—प्रथमं कृष्णनामाक्षर-मात्रं श्रुत्वा परम- मधुरत्वेनानुभूय तन्नामिनि कृष्णे रतिमुवाहेत्यर्थः); अन्यस्य (द्वितीयस्य पुरुषान्तरस्य) वंशीकलः (मुरलीध्वनिः) [श्रुतः सन्] सान्द्रोन्मादपरम्परां (घनीभूत-दिव्योन्मादधाराम्) उपनयति (प्रापयति,—ततश्च वंशीनादं परम-मधुरत्वेनास्वाद्य तद्वंशीवादिनि रतिमुवाहेत्यर्थः); पटे वीक्षणात् हेतोः एषः (अपरः तृतीय- पुरुषान्तरः) स्निग्धघनद्युतिः (प्रीतिप्रदमेघप्रभः) मे (मम) मनसि (हृदये) लग्नः (एकीभूतः संसक्तः, सङ्गतः भवति; ततश्च कृष्णाकारं चित्रं नेत्राभ्यां सकृदेवास्वाद्य तद्भेद्रेन तस्मिन् रतिमुवाहेत्यर्थः); धिक् कष्टं भोः, पुरुषत्रये (कृष्णाभिधे, मुरलीनिनादकारिणि, इन्द्रनील-घनश्यामरूपिणि नायकत्रये कुलाङ्गनायाः मम प्रथमं तावत् परपुरुषे रतिरेवायोध्या, किमुत तत्तत्रये) मम रतिः अभूत्; [अतः हेतोः] मृतिः (मृत्युः एव) श्रेयसी (कल्याणास्पदम् इति) मन्ये [मृत्युं बिना दुष्परिहरेयं रतिर्धिक्कारिणीयेवेति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—[हे सखि,] परपुरुषके 'कृष्ण' इस नामाक्षरको श्रवण करके ही [मुझ राधाकी] स्त्रियोंके लिये उचित पातिव्रत्य धर्म पालनकी बुद्धि लुप्त हो गयी (सर्वप्रथम कृष्णनाम अक्षर-मात्र श्रवणसे ही उसकी परम मधुरताको अनुभव करके उस नामवाले कृष्णमें मेरी रति उत्पन्न हो गयी—यह अर्थ है); दूसरे अन्य पुरुषकी मुरलीध्वनिको श्रवण करके मैंने घनीभूत-दिव्योन्माद-धाराको प्राप्त किया (और तब वंशीनादको परम-मधुरतासे आस्वादन करते हुए उस वंशीवादकमें मेरी रति उत्पन्न हो गयी—यह अर्थ है); चित्रपटमें देखकर ही प्रेमप्रद इस मेघकी कान्तिवाले अन्य तीसरे पुरुषकी कान्ति देखते ही मेरे हृदयमें बस