भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2041, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2041

24 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/142-145 ] गयी है (तब कृष्ण आकारको चित्रमें एक बार देखनेसे ही नेत्रोंके द्वारा आस्वादन करके मेरी उनमें रति उत्पन्न हो गयी); हा धिक्कार, कृष्ण-नामक, मुरली-निनाद करनेवाले और इन्द्रनील-मेघके समान श्यामरूपवाले-इन तीन नायकोंमें मेरी रति हो गयी; कैसा कष्ट है? (उच्च कुलकी स्त्री होनेके कारण एक पुरुषमें रति होनेके कारण मैं अन्य (दूसरे) पुरुषमें रति होनेके अयोग्य हूँ, तो तीसरेमें कैसे हो सकती है?) इस कारणसे मृत्यु ही मेरे लिये कल्याणकारी है [मृत्युके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है, क्योंकि मेरी रति तीन पुरुषोंमें हो गयी है-यह भाव है] ॥ 142 ॥ उसमें विकार जैसे :- विदग्धमाधव (2/8)में श्रीललिता और श्रीविशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति- इयं सखि सुदुःसाध्या राधा-हृदयवेदना। कृता यत्र चिकित्सापि कुत्सायां पर्यवस्यति ॥ 143 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, राधाकी हृदय वेदनाका उपचार करना दुःसाध्य है; इसकी चिकित्सा करनेपर भी वह चिकित्सा निन्दामें पर्यवसित होगी ॥ 143 ॥ अनुभाष्य- हे सखि, इयं राधा-हृदयवेदना-सुदुःसाध्या, यत्र चिकित्सा कृता अपि कुत्सायां पर्यवस्यति (वेदनायाः अनिवृत्तौ चिकित्सकस्यैव निन्दा स्यात्, तथा च पुरुषत्रये एकक्षणम् एव वासनावत्या मम एकपुरुषानयनेऽपि वेदना न यास्यतीति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-हे सखि, इन राधाकी हृदयवेदना सुदुःसाध्य है, जिसकी चिकित्सा करनेपर भी वह निन्दामें ही पर्यवसित होगी (वेदनाकी निवृत्ति नहीं होनेपर चिकित्सककी ही निन्दा होती है, और तीन पुरुषोंमें एक ही साथ वासनायुक्त मेरी वेदना एक पुरुषको लानेपर भी समाप्त नहीं होगी-यह भाव है) ॥ 143 ॥ उसमें प्राकृत-भाषामें कन्दर्पका लेखन जैसे :- विदग्धमाधव (2/33)में श्रीकृष्णके समीप श्रीमधुमङ्गलके द्वारा श्रीललिताके द्वारा लाये गये श्रीराधिका-लिखित पत्रको पढ़ना- धरीज पडिच्छन्दगुणं सुन्दर मह मन्दिरे तुमं वससि। तह तह रुन्धसि बलिअं जह जह चइदा पलाएमहि ?? 144 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सुन्दर, चित्रपट रूप धारण करके तुम मेरे मन्दिरमें वास कर रहे हो; मैं चकित होकर जिस ओर दौड़ती हूँ, तुम उसी ओर आकर [बलपूर्वक] मेरे मार्गको रोक लेते हो। श्लोकका संस्कृतमें भाषान्तर-“धृत्वा प्रतिच्छन्दगुणं सुन्दर मम मन्दिरे त्वं वससि। तथा तथा रुणत्सि बलितं यथा यथा चकिता पलाये॥" 144 ॥ अनुभाष्य- हे सुन्दर, तुमं (त्वं) पडिच्छन्दगुणं (प्रतिच्छन्दगुणं चित्रपटरूपं) धरीज (धृत्वा) मह (मम) मन्दिरे वससि (तिष्ठसि); जह जह (यथा यथा) चइदा (चकिता सती) पलाएमहि (पलाये) तह तह (तथा तथा त्वं) बलिजं (बलितं बलयुक्तं यथा स्यात् तथा) रुन्धसि (रुणत्सि)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 144 ॥ उसमें चेष्टा जैसे :- विदग्धमाधव (2/15)में पौर्णमासीके प्रति मुखराकी उक्ति- अग्रे वीक्ष्य शिखण्डखण्डमचिरादुत्कम्पमालम्बते गुञ्जानाञ्च विलोकनान्मुहुरसौ सास्रं परिक्रोशति। नो जाने जनयन्नपूर्वनटनक्रीड़ा-चमत्कारितां बालायाः किल चित्तभूमिमविशत् कोऽयं नवीनग्रहः ॥ 145 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने सामने मयूरके पंखको देखकर यह बाला सहसा कम्पका आश्रय ग्रहण करती है, गुञ्जाको देखकर आँसू बहानेके साथ चीत्कार

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