भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2042, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2042

[ 1/145-149 पहला अध्याय 25 करती है; कौन-सा नवीन ग्रह इसके हृदय-क्षेत्रमें प्रवेश करके अपूर्व नृत्य-क्रीड़ाकी चमत्कारिताको उत्पन्न कर रहा है, मैं उसके विषयमें नहीं जानती ॥ 145 ॥ अनुभाष्य— हे भगवति पौर्णमासि, असौ (राधा) अग्रे (सम्मुखे) शिखण्डखण्डं (मयूरपुच्छं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) अचिरात् (आशु) उत्कम्पम् आलम्बते, गुञ्जानां तु विलोकनात् (सन्दर्शनात्) सास्रं (अश्रुयुक्तं सन्) मुहुः परिक्रोशति;—[अहं] नो जाने, कः अयं नवीनग्रहः अपूर्वनटनक्रीड़ाचमत्कारिताम् (अत्याश्चर्य- विलासमततां) जनयन् (उत्पादयन्) बालायाः (राधायाः) चित्तभूमिं (हृदयक्षेत्रं) आविशत् (प्रविष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ वहाँ व्यवसायमें जैसे :— विदग्धमाधव (2/47)में श्रीविशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— अकारुण्यः कृष्णो यदि मयि तवागः कथमिदं मुधा मा रोदीर्मे कुरु परमिमामुत्तरकृतिम्। तमालस्य स्कन्धे सखि कलित-दोर्वल्लिरियं यथा वृन्दारण्ये चिरमविचला तिष्ठति तनुः ॥ 146 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब कृष्ण ही मेरे प्रति निष्ठुर हो गये हैं, तब हे सखि, इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम वृथा रोदन मत करो; तुम मेरी अन्त्येष्टिक्रिया रूप एक कार्य कर सकती हो,—[मेरे प्राण त्याग करनेपर] वृन्दावनमें तमाल वृक्षके तनेपर मेरी इन भुजाओंको बाँधकर मेरी देहको चिरकालके [सदाके] लिये रखना ॥ 146 ॥ अनुभाष्य— हे विशाखे, यदि कृष्णः मयि अकारुण्यः (निष्ठुरः अभूत, तर्हि) तव कथं मयि आगः (अपराधः भवेत्? तस्मात्) मुधा (व्यर्थं) मा रोदीः; हे सखि, परं [तु] तमालस्य स्कन्धे कलितदोर्वल्लिः (कलिता निहिता दोर्वल्लिः भुजलता यया सा) इयं मे (मम) तनुः वृन्दारण्ये यथा चिरं (सदा) अविचला [सती] तिष्ठति, तथा इमाम् उत्तर-कृतिम् (अन्त्येष्टिकर्म) कुरु [प्राणत्यागानन्तरं तमालस्य स्कन्धे विनिहिता भुजरूपलता यस्याः एवम्भूता मम तनुः यथा बृन्दारण्ये तिष्ठति, तथा करणीया]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ राय कहे,—“कह देखि भावेर स्वभाव?” रूप कहे,—“ऐछे हय कृष्णविषयक 'भाव' ॥” 147 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“कहो, तुमने प्रेमके स्वभावके विषयमें क्या लिखा है?” श्रीरूपने कहा,—“श्रीकृष्ण विषयक 'प्रेम' इस प्रकारका होता है॥” 147 ॥ अनुभाष्य—'भाव'—प्रेम ॥ 147 ॥ विदग्धमाधव (2/18)में नान्दीमुखीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— पीडाभिर्नवकालकूटकटुता-गर्वस्य निर्वासनो निःस्यन्देन मुदां सुधा-मधुरिमाहङ्कार-सङ्कोचनः। प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जागर्त्ति यस्यान्तरे ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ॥ 148 ॥ अनुवाद—हे सुन्दरि ! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण-सम्बन्धी प्रेम जिसके हृदयमें जाग्रत होता है, उस प्रेमके वक्र (कुटिल अर्थात् कटु) एवं मधुरभावकी समस्त महिमा उस हृदयमें स्पष्ट रूपसे प्रकाशित होती है। वह प्रेम दो रूपसे कार्य करता है,—(1) अपने द्वारा प्रदान की गयी पीड़ाके द्वारा वह नव-सर्पविषकी कटुताके गर्वको दूर करता है अर्थात् जिससे अधिक कोई नहीं हो सकता, ऐसा दुःख उदय कराता है; और (2) आनन्दके द्वारा अमृतके माधुर्यका जो अहङ्कार है, उसको भी सङ्कुचित करके परम सुख प्रदान करता है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 2/52 संख्या देखें ॥ 148 ॥ राय कहे,—“कह सहज-प्रेमेर लक्षण।” रूप-गोसाञि कहे,—“साहजिक प्रेमधर्म ॥” 149 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“ 'सहज'-प्रेमके