श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2043, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें26 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/149-151 ] लक्षणके विषयमें बतलाओ।” श्रीरूप गोस्वामीने कहा,—“प्रेमका धर्म ही साहजिक (स्वाभाविक) है॥” 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रायके द्वारा प्रेमके ‘सहज’ लक्षणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीरूपने उत्तर दिया,—प्रेम-धर्म ही ‘स्वाभाविक’ है॥ 149 ॥ विदग्धमाधव (5/4) में मधुमङ्गलके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकटयच्चित्तस्य धत्ते व्यथां निन्दापि प्रमदं प्रयच्छति परिहासश्रियं बिभ्रती। दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां केनाप्यनान्वती प्रेम्णः स्वारसिकस्य कस्यचिदियं विक्रीड़ति प्रक्रिया॥ 150 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वारसिक अर्थात् स्वाभाविक-प्रेमकी प्रक्रिया इस प्रकार क्रीड़ा करती है,—(प्रियके मुखसे) अपनी स्तुतिको सुननेपर उदासीनताको दिखाकर विशेष व्यथा धारण करती है; (प्रियके मुखसे अपनी) निन्दा सुननेपर वह परिहास-श्रीको धारण करके (प्रचुर) आनन्द प्रदान करती है; प्रेमके पात्रके किसी दोषको देखनेपर उससे प्रेममें कोई कमी नहीं आती, दूसरी ओर, उसके किसी गुणको देखनेपर (उससे प्रेमकी) वृद्धि भी नहीं होती॥ 150 ॥ अनुभाष्य— यत्र (प्रेम्णि) स्तोत्रं (प्रशंसा-वाक्यं) तटस्थतां (निरपेक्षतां) प्रकटयत् (दर्शयत् सत्) चित्तस्य व्यथां धत्ते; निन्दा अपि परिहासश्रियं (कौतुकशोभां) बिभ्रती (धृतवती सती) प्रमदम् (आनन्दं) प्रयच्छति (ददाति); केनापि दोषेण क्षयितां न, गुणेन गुरुतां न च आतन्वती (विस्तारयित्री,—कमपि गुणादिकम् उपाधिम् आलम्ब्य जायते चेत्, तदा दोषदर्शनेन क्षीणो भवति, गुणदर्शनेन समृद्धो भवति, परन्तु अत्र निरुपाधिस्तु दोषगुणौ नापेक्षते)—कस्यचित् स्वारसिकस्य (साहजिकस्य) प्रेम्णः इयं प्रक्रिया विक्रीड़ति (हृदये खेलति)। श्लोक-भावानुवाद—जिसमें, प्रशंसा उदासीनता प्रकाश करके चित्तमें वेदना प्रदान करती है और निन्दा भी परिहासश्री (कौतुक-शोभा) धारण करके आनन्द प्रदान करती है; किसी भी दोषसे ह्रास अथवा किसी गुणसे वृद्धि प्राप्त नहीं करती (जो प्रेम गुणके ऊपर प्रतिष्ठित होता है, दोष दर्शनसे उसका ह्रास हो जाता है और गुण दर्शनसे वह वृद्धिको प्राप्त होता है, किन्तु निरुपाधिक (स्वाभाविक) प्रेम दोष-गुणकी कोई अपेक्षा नहीं रखता, इसलिये वह ह्रास अथवा वृद्धिको प्राप्त नहीं होता)—किसी स्वारसिक (स्वाभाविक) प्रेमकी यह प्रक्रिया हृदयमें क्रीड़ा करती है॥ 150 ॥ रागकी परीक्षाके पश्चात् श्रीकृष्णका पश्चाताप जैसे :— विदग्धमाधव (2/40)में मधुमङ्गलके समक्ष श्रीकृष्णकी उक्ति— श्रुत्वा निष्ठुरतां ममेन्दुवदना प्रेमाङ्कुरं भिन्दती स्वान्ते शान्तिधुरां विधाय विधुरे प्रायः पराश्विष्यति। किम्वा पामर-काम-कार्मुकपरित्रस्ता विमोक्ष्यत्यसूनू हा मौग्ध्यात् फलिनी मनोरथलता मृद्वी मयोन्मूलिता ॥ 151 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी निष्ठुरताको श्रवण करके हो सकता है कि चन्द्रमुखी राधा प्रेमाङ्कुरको तोड़कर अपने दुःखी-हृदयमें किसी प्रकारसे शान्ति अथवा धैर्यभावको धारण करके मुझसे विमुख हो जायेगी अथवा दुर्दान्त (कठिनाईसे वशमें आनेवाले) कन्दर्पके धनुषसे भय करके जीवन ही परित्याग कर देगी। हाय, मैंने मूर्खतापूर्वक फलोन्मुखी कोमल मनोरथ लताको एक बारमें ही पूरा उखाड़ दिया॥ 151 ॥ अनुभाष्य— इन्दुवदना (चन्द्रमुखी राधिका) मम निष्ठुरतां श्रुत्वा प्रेमाङ्कुरं (नवायमानं प्रेमाणं) भिन्दती [सती] विधुरे (दुःखिते वेदनायुक्ते) स्वान्ते (निजहृदये) शान्तिधुरां (धैर्यातिशयं) विधाय (अवलम्ब्य) पराश्विष्यति (विमुखीभविष्यति); किम्वा पामर-काम-कार्मुक- परित्रस्ता (पामरः दुर्दान्तः कामः कन्दर्पः तस्य कार्मुकाः शराः तैः परित्रस्ता भीता सती) असून् (प्राणान्) विमोक्ष्यति (त्यक्ष्यति); हा (कष्टं भोः) मौग्ध्यात् (मोहात्) मया मृद्वी (जाताङ्कुरत्वात् कोमला) फलिनी (फलोन्मुखा) मनोरथलता (अभिलाष-वल्लरी) उन्मूलिता (उत्पाटिता)।