श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2044, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/151-154 पहला अध्याय 27 श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥ विदग्धमाधव (2/41)में श्रीविशाखाके द्वारा प्रबोधित की जा रही श्रीराधिकाकी उक्ति- यस्योत्सङ्गसुखाशया शिथिलता गुर्वी गुरुभ्यस्त्रपा प्राणेभ्योऽपि सुहत्तमाः सखि तथा यूयं परिक्लेशिताः। धर्मः सोऽपि महान्मया न गणितः साध्वीभिरध्यासितो धिग्धैर्यं तदुपेक्षितापि यदहं जीवामि पापीयसी ॥ 152 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनके आलिङ्गन- सुखकी अभिलाषी होकर मैंने पूजनीय व्यक्तियोंके समक्ष भारी लज्जाको भी शिथिल कर दिया था, और तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होनेपर तुम्हें जिनके लिये बहुत क्लेश दिया, साध्वी-स्त्रियोंके द्वारा पालन किये जानेवाले पतिव्रता धर्मकी भी मैंने जिनके लिये पालनीय वस्तु कहकर गणना नहीं की; हाय, उन्हीं कृष्णके द्वारा उपेक्षित होकर भी ऐसी पापिन मैं अभी तक जीवित हूँ ! अतएव मेरे धैर्यको धिक्कार है ॥ 152 ॥ अनुभाष्य- हे सखि, यस्य (कृष्णस्य) उत्सङ्गसुखाशया (उत्कटसङ्गा- नन्दवासनया), गुरुभ्यः (पूज्यवर्गेभ्यः सकाशात्) गुर्वी (महती) त्रपा (लज्जा) शिथिलता (उपेक्षिता); तथा प्राणेभ्यः अपि सुहत्तमाः (परमप्रेष्ठाः) यूयं परिक्लेशिताः (तापिताः); साध्वीभिः अध्यासितः (सेवितः यः) महान् धर्मः (पातिव्रत्यरूपः सः) अपि मया (कुलवध्वा) न गणितः, तत् (तेन् कृष्णेन) उपेक्षिता (अनादृता) अपि यत् (यतः) अहं पापीयसी जीवामि, [तत् तस्मात् मम] धैर्यं धिक्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ विदग्धमाधव (2/46)में श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाकी उक्ति- गृहान्तःखेलन्त्यो निजसहजबाल्यस्य बलना- दभद्रं भद्रं वा किमपि हि न जानीमहि मनाक्। वयं नेतुं युक्ताः कथमशरणां कामपि दशां कथं वा न्याय्या ते प्रथयितुमुदासीनपदवी ॥ 153 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 153 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं अपने सहज-बाल्यभावके वशीभूत होकर घरमें खेल रही थी,-किसे 'अच्छा' [सुख] कहते हैं, किसे 'बुरा' [दुःख] कहते हैं, इसके विषयमें कुछ भी नहीं जानती थी! ऐसी मुझे असहाय दशामें डाल देना क्या तुम्हारे लिये उचित है? और अब तुम्हारा उदासीनताका विस्तार करना क्या न्यायोचित है ?153 ॥ अनुभाष्य- [हे बकीहन्तः,] निजसहजबाल्यस्य बलनात् (बलवत्वात्) गृहान्तःखेलन्त्यः वयं किमपि अभद्रं (दुखं) भद्रं (सुखं) वा मनाक् (ईषदपि) न जानीमहि; कथं वयं काम् (एतादृशीं काञ्चित्) अपि अशरणाम् (आश्रयरहितां) दशां नेतुं युक्ताः (धर्मसङ्गताः भवामः? यदि च नीता दशामेतामधुनापि, तदा) कथं वा ते (तव) उदासीनपदवी (औदासीन्य-दशा) प्रथयितुं (प्रकटयितुं) न्याय्या (न्यायोचिता?-तस्मादस्माकं वधार्थमेव तव व्यवसायः इति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 153 ॥ विदग्धमाधव (2/37)में श्रीकृष्णके समक्ष श्रीललिताकी उक्ति- अन्तःक्लेशकलङ्किताः किल वयं यामोऽद्य याम्यां पुरीं नायं वञ्चनसञ्चयप्रणयिनं हासं तथाप्युज्झति । अस्मिन् सम्पुटिते गभीरकपटैराभीरपल्लीविटे हा मेधावनि राधिके तव कथं प्रेमा गरीयानभूत् ॥ 154 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-क्लेशसे कलङ्कित अन्तःकरणवाली हम अभी यमपुरी जा रही हैं, किन्तु ये कृष्ण अपने वञ्चनापूर्ण-प्रणय-हास्यका (प्रचुर वञ्चना करनेवाले निष्ठुर हास्यका) परित्याग नहीं कर रहे हैं! हे बुद्धिमति राधिके, इस गम्भीर कपटतापूर्ण गोपी-लम्पटमें तुम्हारा इतना अधिक उत्कृष्ट प्रेम किस प्रकार उत्पन्न हुआ था ?154 ॥