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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 1/145-149 पहला अध्याय 25 करती है; कौन-सा नवीन ग्रह इसके हृदय-क्षेत्रमें प्रवेश करके अपूर्व नृत्य-क्रीड़ाकी चमत्कारिताको उत्पन्न कर रहा है, मैं उसके विषयमें नहीं जानती ॥ 145 ॥ अनुभाष्य— हे भगवति पौर्णमासि, असौ (राधा) अग्रे (सम्मुखे) शिखण्डखण्डं (मयूरपुच्छं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) अचिरात् (आशु) उत्कम्पम् आलम्बते, गुञ्जानां तु विलोकनात् (सन्दर्शनात्) सास्रं (अश्रुयुक्तं सन्) मुहुः परिक्रोशति;—[अहं] नो जाने, कः अयं नवीनग्रहः अपूर्वनटनक्रीड़ाचमत्कारिताम् (अत्याश्चर्य- विलासमततां) जनयन् (उत्पादयन्) बालायाः (राधायाः) चित्तभूमिं (हृदयक्षेत्रं) आविशत् (प्रविष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ वहाँ व्यवसायमें जैसे :— विदग्धमाधव (2/47)में श्रीविशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— अकारुण्यः कृष्णो यदि मयि तवागः कथमिदं मुधा मा रोदीर्मे कुरु परमिमामुत्तरकृतिम्। तमालस्य स्कन्धे सखि कलित-दोर्वल्लिरियं यथा वृन्दारण्ये चिरमविचला तिष्ठति तनुः ॥ 146 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब कृष्ण ही मेरे प्रति निष्ठुर हो गये हैं, तब हे सखि, इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम वृथा रोदन मत करो; तुम मेरी अन्त्येष्टिक्रिया रूप एक कार्य कर सकती हो,—[मेरे प्राण त्याग करनेपर] वृन्दावनमें तमाल वृक्षके तनेपर मेरी इन भुजाओंको बाँधकर मेरी देहको चिरकालके [सदाके] लिये रखना ॥ 146 ॥ अनुभाष्य— हे विशाखे, यदि कृष्णः मयि अकारुण्यः (निष्ठुरः अभूत, तर्हि) तव कथं मयि आगः (अपराधः भवेत्? तस्मात्) मुधा (व्यर्थं) मा रोदीः; हे सखि, परं [तु] तमालस्य स्कन्धे कलितदोर्वल्लिः (कलिता निहिता दोर्वल्लिः भुजलता यया सा) इयं मे (मम) तनुः वृन्दारण्ये यथा चिरं (सदा) अविचला [सती] तिष्ठति, तथा इमाम् उत्तर-कृतिम् (अन्त्येष्टिकर्म) कुरु [प्राणत्यागानन्तरं तमालस्य स्कन्धे विनिहिता भुजरूपलता यस्याः एवम्भूता मम तनुः यथा बृन्दारण्ये तिष्ठति, तथा करणीया]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥ राय कहे,—“कह देखि भावेर स्वभाव?” रूप कहे,—“ऐछे हय कृष्णविषयक 'भाव' ॥” 147 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“कहो, तुमने प्रेमके स्वभावके विषयमें क्या लिखा है?” श्रीरूपने कहा,—“श्रीकृष्ण विषयक 'प्रेम' इस प्रकारका होता है॥” 147 ॥ अनुभाष्य—'भाव'—प्रेम ॥ 147 ॥ विदग्धमाधव (2/18)में नान्दीमुखीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— पीडाभिर्नवकालकूटकटुता-गर्वस्य निर्वासनो निःस्यन्देन मुदां सुधा-मधुरिमाहङ्कार-सङ्कोचनः। प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जागर्त्ति यस्यान्तरे ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ॥ 148 ॥ अनुवाद—हे सुन्दरि ! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण-सम्बन्धी प्रेम जिसके हृदयमें जाग्रत होता है, उस प्रेमके वक्र (कुटिल अर्थात् कटु) एवं मधुरभावकी समस्त महिमा उस हृदयमें स्पष्ट रूपसे प्रकाशित होती है। वह प्रेम दो रूपसे कार्य करता है,—(1) अपने द्वारा प्रदान की गयी पीड़ाके द्वारा वह नव-सर्पविषकी कटुताके गर्वको दूर करता है अर्थात् जिससे अधिक कोई नहीं हो सकता, ऐसा दुःख उदय कराता है; और (2) आनन्दके द्वारा अमृतके माधुर्यका जो अहङ्कार है, उसको भी सङ्कुचित करके परम सुख प्रदान करता है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 2/52 संख्या देखें ॥ 148 ॥ राय कहे,—“कह सहज-प्रेमेर लक्षण।” रूप-गोसाञि कहे,—“साहजिक प्रेमधर्म ॥” 149 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“ 'सहज'-प्रेमके

26 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/149-151 ] लक्षणके विषयमें बतलाओ।” श्रीरूप गोस्वामीने कहा,—“प्रेमका धर्म ही साहजिक (स्वाभाविक) है॥” 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रायके द्वारा प्रेमके ‘सहज’ लक्षणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीरूपने उत्तर दिया,—प्रेम-धर्म ही ‘स्वाभाविक’ है॥ 149 ॥ विदग्धमाधव (5/4) में मधुमङ्गलके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकटयच्चित्तस्य धत्ते व्यथां निन्दापि प्रमदं प्रयच्छति परिहासश्रियं बिभ्रती। दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां केनाप्यनान्वती प्रेम्णः स्वारसिकस्य कस्यचिदियं विक्रीड़ति प्रक्रिया॥ 150 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वारसिक अर्थात् स्वाभाविक-प्रेमकी प्रक्रिया इस प्रकार क्रीड़ा करती है,—(प्रियके मुखसे) अपनी स्तुतिको सुननेपर उदासीनताको दिखाकर विशेष व्यथा धारण करती है; (प्रियके मुखसे अपनी) निन्दा सुननेपर वह परिहास-श्रीको धारण करके (प्रचुर) आनन्द प्रदान करती है; प्रेमके पात्रके किसी दोषको देखनेपर उससे प्रेममें कोई कमी नहीं आती, दूसरी ओर, उसके किसी गुणको देखनेपर (उससे प्रेमकी) वृद्धि भी नहीं होती॥ 150 ॥ अनुभाष्य— यत्र (प्रेम्णि) स्तोत्रं (प्रशंसा-वाक्यं) तटस्थतां (निरपेक्षतां) प्रकटयत् (दर्शयत् सत्) चित्तस्य व्यथां धत्ते; निन्दा अपि परिहासश्रियं (कौतुकशोभां) बिभ्रती (धृतवती सती) प्रमदम् (आनन्दं) प्रयच्छति (ददाति); केनापि दोषेण क्षयितां न, गुणेन गुरुतां न च आतन्वती (विस्तारयित्री,—कमपि गुणादिकम् उपाधिम् आलम्ब्य जायते चेत्, तदा दोषदर्शनेन क्षीणो भवति, गुणदर्शनेन समृद्धो भवति, परन्तु अत्र निरुपाधिस्तु दोषगुणौ नापेक्षते)—कस्यचित् स्वारसिकस्य (साहजिकस्य) प्रेम्णः इयं प्रक्रिया विक्रीड़ति (हृदये खेलति)। श्लोक-भावानुवाद—जिसमें, प्रशंसा उदासीनता प्रकाश करके चित्तमें वेदना प्रदान करती है और निन्दा भी परिहासश्री (कौतुक-शोभा) धारण करके आनन्द प्रदान करती है; किसी भी दोषसे ह्रास अथवा किसी गुणसे वृद्धि प्राप्त नहीं करती (जो प्रेम गुणके ऊपर प्रतिष्ठित होता है, दोष दर्शनसे उसका ह्रास हो जाता है और गुण दर्शनसे वह वृद्धिको प्राप्त होता है, किन्तु निरुपाधिक (स्वाभाविक) प्रेम दोष-गुणकी कोई अपेक्षा नहीं रखता, इसलिये वह ह्रास अथवा वृद्धिको प्राप्त नहीं होता)—किसी स्वारसिक (स्वाभाविक) प्रेमकी यह प्रक्रिया हृदयमें क्रीड़ा करती है॥ 150 ॥ रागकी परीक्षाके पश्चात् श्रीकृष्णका पश्चाताप जैसे :— विदग्धमाधव (2/40)में मधुमङ्गलके समक्ष श्रीकृष्णकी उक्ति— श्रुत्वा निष्ठुरतां ममेन्दुवदना प्रेमाङ्कुरं भिन्दती स्वान्ते शान्तिधुरां विधाय विधुरे प्रायः पराश्विष्यति। किम्वा पामर-काम-कार्मुकपरित्रस्ता विमोक्ष्यत्यसूनू हा मौग्ध्यात् फलिनी मनोरथलता मृद्वी मयोन्मूलिता ॥ 151 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी निष्ठुरताको श्रवण करके हो सकता है कि चन्द्रमुखी राधा प्रेमाङ्कुरको तोड़कर अपने दुःखी-हृदयमें किसी प्रकारसे शान्ति अथवा धैर्यभावको धारण करके मुझसे विमुख हो जायेगी अथवा दुर्दान्त (कठिनाईसे वशमें आनेवाले) कन्दर्पके धनुषसे भय करके जीवन ही परित्याग कर देगी। हाय, मैंने मूर्खतापूर्वक फलोन्मुखी कोमल मनोरथ लताको एक बारमें ही पूरा उखाड़ दिया॥ 151 ॥ अनुभाष्य— इन्दुवदना (चन्द्रमुखी राधिका) मम निष्ठुरतां श्रुत्वा प्रेमाङ्कुरं (नवायमानं प्रेमाणं) भिन्दती [सती] विधुरे (दुःखिते वेदनायुक्ते) स्वान्ते (निजहृदये) शान्तिधुरां (धैर्यातिशयं) विधाय (अवलम्ब्य) पराश्विष्यति (विमुखीभविष्यति); किम्वा पामर-काम-कार्मुक- परित्रस्ता (पामरः दुर्दान्तः कामः कन्दर्पः तस्य कार्मुकाः शराः तैः परित्रस्ता भीता सती) असून् (प्राणान्) विमोक्ष्यति (त्यक्ष्यति); हा (कष्टं भोः) मौग्ध्यात् (मोहात्) मया मृद्वी (जाताङ्कुरत्वात् कोमला) फलिनी (फलोन्मुखा) मनोरथलता (अभिलाष-वल्लरी) उन्मूलिता (उत्पाटिता)।

[ 1/151-154 पहला अध्याय 27 श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥ विदग्धमाधव (2/41)में श्रीविशाखाके द्वारा प्रबोधित की जा रही श्रीराधिकाकी उक्ति- यस्योत्सङ्गसुखाशया शिथिलता गुर्वी गुरुभ्यस्त्रपा प्राणेभ्योऽपि सुहत्तमाः सखि तथा यूयं परिक्लेशिताः। धर्मः सोऽपि महान्मया न गणितः साध्वीभिरध्यासितो धिग्धैर्यं तदुपेक्षितापि यदहं जीवामि पापीयसी ॥ 152 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनके आलिङ्गन- सुखकी अभिलाषी होकर मैंने पूजनीय व्यक्तियोंके समक्ष भारी लज्जाको भी शिथिल कर दिया था, और तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होनेपर तुम्हें जिनके लिये बहुत क्लेश दिया, साध्वी-स्त्रियोंके द्वारा पालन किये जानेवाले पतिव्रता धर्मकी भी मैंने जिनके लिये पालनीय वस्तु कहकर गणना नहीं की; हाय, उन्हीं कृष्णके द्वारा उपेक्षित होकर भी ऐसी पापिन मैं अभी तक जीवित हूँ ! अतएव मेरे धैर्यको धिक्कार है ॥ 152 ॥ अनुभाष्य- हे सखि, यस्य (कृष्णस्य) उत्सङ्गसुखाशया (उत्कटसङ्गा- नन्दवासनया), गुरुभ्यः (पूज्यवर्गेभ्यः सकाशात्) गुर्वी (महती) त्रपा (लज्जा) शिथिलता (उपेक्षिता); तथा प्राणेभ्यः अपि सुहत्तमाः (परमप्रेष्ठाः) यूयं परिक्लेशिताः (तापिताः); साध्वीभिः अध्यासितः (सेवितः यः) महान् धर्मः (पातिव्रत्यरूपः सः) अपि मया (कुलवध्वा) न गणितः, तत् (तेन् कृष्णेन) उपेक्षिता (अनादृता) अपि यत् (यतः) अहं पापीयसी जीवामि, [तत् तस्मात् मम] धैर्यं धिक्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ विदग्धमाधव (2/46)में श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाकी उक्ति- गृहान्तःखेलन्त्यो निजसहजबाल्यस्य बलना- दभद्रं भद्रं वा किमपि हि न जानीमहि मनाक्। वयं नेतुं युक्ताः कथमशरणां कामपि दशां कथं वा न्याय्या ते प्रथयितुमुदासीनपदवी ॥ 153 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 153 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं अपने सहज-बाल्यभावके वशीभूत होकर घरमें खेल रही थी,-किसे 'अच्छा' [सुख] कहते हैं, किसे 'बुरा' [दुःख] कहते हैं, इसके विषयमें कुछ भी नहीं जानती थी! ऐसी मुझे असहाय दशामें डाल देना क्या तुम्हारे लिये उचित है? और अब तुम्हारा उदासीनताका विस्तार करना क्या न्यायोचित है ?153 ॥ अनुभाष्य- [हे बकीहन्तः,] निजसहजबाल्यस्य बलनात् (बलवत्वात्) गृहान्तःखेलन्त्यः वयं किमपि अभद्रं (दुखं) भद्रं (सुखं) वा मनाक् (ईषदपि) न जानीमहि; कथं वयं काम् (एतादृशीं काञ्चित्) अपि अशरणाम् (आश्रयरहितां) दशां नेतुं युक्ताः (धर्मसङ्गताः भवामः? यदि च नीता दशामेतामधुनापि, तदा) कथं वा ते (तव) उदासीनपदवी (औदासीन्य-दशा) प्रथयितुं (प्रकटयितुं) न्याय्या (न्यायोचिता?-तस्मादस्माकं वधार्थमेव तव व्यवसायः इति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 153 ॥ विदग्धमाधव (2/37)में श्रीकृष्णके समक्ष श्रीललिताकी उक्ति- अन्तःक्लेशकलङ्किताः किल वयं यामोऽद्य याम्यां पुरीं नायं वञ्चनसञ्चयप्रणयिनं हासं तथाप्युज्झति । अस्मिन् सम्पुटिते गभीरकपटैराभीरपल्लीविटे हा मेधावनि राधिके तव कथं प्रेमा गरीयानभूत् ॥ 154 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-क्लेशसे कलङ्कित अन्तःकरणवाली हम अभी यमपुरी जा रही हैं, किन्तु ये कृष्ण अपने वञ्चनापूर्ण-प्रणय-हास्यका (प्रचुर वञ्चना करनेवाले निष्ठुर हास्यका) परित्याग नहीं कर रहे हैं! हे बुद्धिमति राधिके, इस गम्भीर कपटतापूर्ण गोपी-लम्पटमें तुम्हारा इतना अधिक उत्कृष्ट प्रेम किस प्रकार उत्पन्न हुआ था ?154 ॥

28 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [ 1/154-159 ] अनुभाष्य— वयम् अन्तःक्लेशकलङ्किताः (अन्तःक्लेशेन कलङ्किताः चिह्निताः सत्यः—मृत्योरनन्तरमप्ययं क्लेशः स्थास्यत्येवेति भावः) अद्य याम्यां पुरीं किल (निश्चितं) यामः; तथापि [अनेन अकारुण्यं व्यज्यते], अयं श्रीकृष्णः वञ्चनसञ्चय-प्रणयिनं (वञ्चनस्य सञ्चयः समूहः तस्य प्रणयिनं करणशीलं) हासं न उज्जति (न परिहरति) ! हा मेधाविनि (बुद्धिमति) राधिके, गभीरकपटैः सम्पुटिते (व्याप्ते) अस्मिन् आभीरपल्लीविटे (आभीरपल्लीनां व्रजनागरीणां विटे कामुके कृष्णे) तव गरीयान् (महान्) प्रेमा कथम् अभूत् ? [अन्यासां प्रेमा भवतु कामान्धीकृतधियां, मेधाविन्यास्तव तु न युज्यते इति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—हम क्लेशसे कलङ्कित अन्तःकरणवाली (और मृत्युके उपरान्त भी क्लेश सदाके लिये रहेगा—यह भाव है) निश्चित ही अभी यमपुरी जा रही हैं, तथापि (करुणारहित भाव प्रकट करते हुए) ये श्रीकृष्ण वञ्चनापूर्ण प्रणय हास्यका परित्याग नहीं कर रहे हैं! हे बुद्धिमति राधिके, घोर कपटतापूर्ण व्रजगोपी-लम्पट कृष्णमें तुम्हारा महान् प्रेम कैसे उत्पन्न हुआ? [अन्योंकी बुद्धि प्रेममें काम भावनासे नष्ट हो जाती है, किन्तु हे बुद्धिमति राधिके ! तुम्हारे पक्षमें कृष्णसे प्रेम करना उचित नहीं है—यह भाव है] ॥ 154 ॥ विदग्धमाधव (3/9)में श्रीकृष्णके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— हित्वा दूरे पथि धवपतेरन्तिकं धर्मसेतो- र्भङ्गोदग्रा गुरुशिखरिणं रंहसा लङ्घयन्ती। लेभे कृष्णार्णव नवरसा राधिका-वाहिनी त्वां वाग्वीचिभिः किमिव विमुखीभावमस्यास्तनोषि ॥ 155 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 155 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्णार्णव (कृष्ण-सिन्धु), धर्मपतिरूपी वृक्षकी आत्मीयताको दूरसे परित्याग करके, तीव्र वेगसे धर्मके सेतुको तोड़कर, गुरुजनरूपी पर्वतको बलपूर्वक लाँघ करके, नवरसस्वरूपा राधिका-नदीने तुम्हें प्राप्त किया था, तुम अब वचनरूपी लहरके द्वारा उसके प्रति विमुख-भाव क्यों विस्तार कर रहे हो ? 155 ॥ अनुभाष्य— हे कृष्णार्णव (कृष्णसिन्धो), धवपतेः (पतिरूपवृक्षस्य) अन्तिकं (समीपं) दूरे पथि हित्वा (त्यक्त्वा) धर्मसेतोः (कुलधर्मः एव सेतुः तस्य) भङ्गोदग्रा (भङ्गे उदग्रं यस्याः सा, भङ्गसमर्था) गुरुशिखरिणं (गुरुजनरूपं शैलं) रंहसा (वेगेन) लङ्घयन्ती (अतिक्रामन्ती) सती, नवरसा (नवः नूतनः रसः शान्तादि-शृङ्गारान्तः रसः यस्यां सा) राधिकावाहिनी (राधिकारूपा नदी) त्वां कृष्णसमुद्रं लेभे (प्राप्तवती); त्वं च वाग्वीचिभिः (वाक्यैः एव तरङ्गैः) किमिव अस्याः (राधानद्याः) विमुखीभावं (वैमुख्यं) तनोषि (विस्तारयसि) ? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 155 ॥ राय कहे,—“वृन्दावन, मुरली-निःस्वन । कृष्ण, राधिकार कैछे करियाछ वर्णन ? ? 156 ॥ कह, तोमार कवित्व शुनि' हय चमत्कार ।” क्रमे रूप-गोसाञि कहे करि' नमस्कार ॥ 157 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने पूछा,—“बताओ, तुमने वृन्दावनका, मुरली और उसकी ध्वनिका, श्रीकृष्णका और श्रीराधिकाका कैसे वर्णन किया है? तुम्हारे कवित्वको सुनकर मेरे हृदयमें चमत्कार हो रहा है।” श्रीरूपने उन्हें नमस्कार करके क्रमशः इन सबके विषयमें बतलाया ॥ 156-157 ॥ उसमें वृन्दावन जैसे :— विदग्धमाधव (1/23-24)में— यथाक्रमसे श्रीकृष्ण और श्रीबलरामकी दो उक्तियाँ— सुगन्धौ माकन्दप्रकरमकरन्दस्य मधुरे विनिस्यन्दे वन्दीकृतमधुपवृन्दं मुहुरिदम्। कृतान्दोलं मन्दोन्नतिभिरनिलैश्चन्दनगिरे- र्ममानन्दं वृन्दा-विपिनमतुलं तुन्दिलयति ॥ 158 ॥ वृन्दावनं दिव्यलता-परीतं लताश्च पुष्पस्फुरिताग्रभाजः। पुष्पाणि च स्फीतमधुव्रतानि मधुव्रताश्च श्रुतिहारिगीताः ॥ 159 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 158-159 ॥

[ 1/158–161 पहला अध्याय 29 अमृतप्रवाह भाष्य—आमकी कलियोंकी मधुके द्वारा मधुर, सुगन्धके क्षरणके द्वारा बारम्बार वन्दना करनेवाले भ्रमरोंसे परिपूर्ण, चन्दन-पर्वतसे (मलयसे) प्रवाहित होनेवाली पवनके मन्द-मन्द सञ्चालनके द्वारा आन्दोलित यह श्रीवृन्दावन मेरा अतुलनीय आनन्द वर्धित कर रहा है। देखो, यह वृन्दावन—दिव्य लताओंसे लिपटा हुआ है; लताओंके अग्रभागमें पुष्प शोभायमान हैं; पुष्पोंपर मधुकर (भँवरे) मधुपान करके प्रमत्त हो रहे हैं; और उन मधुकरका गान कर्णके लिये रसायन है॥ 158-159॥ अनुभाष्य— [हे मधुमङ्गल], माकन्दप्रकरमकरन्दस्य (माकन्दप्रकराणाम् आम्रमुकुलसमूहानां मकरन्दस्य) मधुरे सुगन्धौ विनिस्यन्दे मुहुः (पुनः पुनः) वन्दीकृतमधुपवृन्दं (वन्दीकृतम् आबद्धं मधुपवृन्दं भृङ्गकुलं येन तत्) चन्दनगिरेः (मलयपर्वतस्य) मन्दोन्नतिभिः (मृदुसञ्चालितैः) अनिलैः (समीरैः) कृतान्दोलं (कम्पितं, परिचालितं) इदं वृन्दाविपिनं मम अतुलम् आनन्दं तुन्दिलयति (वर्धयति)। [हे श्रीदामन्, इदमेव] वृन्दावनं दिव्यलतापरीतं (दिव्यवल्लीवेष्टितं); लताः च पुष्पस्फुरिताग्रभाजः (पुष्पैः स्फुरितं अग्रं भजन्ति याः ताः), पुष्पाणि च स्फीतमधुव्रतानि (स्फीताः प्रमत्ताः मधुपाः येषु तानि); मधुव्रताश्च श्रुतिहारिगीताः (कर्णरसायनं गीतं येषां ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158-159॥ विदग्धमाधव (1/31)में श्रीमथुमङ्गलके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति— क्वचिद्भृङ्गीगीतं क्वचिदनिलभङ्गी-शिशिरता क्वचिद्वल्लीलास्यं क्वचिदमलमल्लीपरिमलः। क्वचिद्धाराशाली करकफलपाली-रसभरो हृषीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम्॥ 160॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखे, यह वृन्दावन हमारी इन्द्रियोंको नाना प्रकारसे आनन्दित कर रहा है, किसी स्थानपर भ्रमरोंका गीत हो रहा है, कोई स्थान मन्द-मन्द मलयकी समीरके द्वारा शीतल हो रहा है, किसी स्थानपर लताएँ नृत्य कर रही हैं, किसी स्थानपर मल्लिका-पुष्पोंकी अमल सुगन्ध प्रवाहित हो रही है और किसी स्थानपर पंक्तियोंमें लगे अनारके फल [रसकी अधिकताके कारण जिह्वाको सुखप्रद] रस बहा रहे हैं॥ 160॥ अनुभाष्य— [हे मधुमङ्गल], इदं वृन्दावनं हृषीकाणां (चक्षुकर्ण- नासाजिह्वात्वगादीनां) वृन्दं (समूहं) प्रमदयति (आह्लादयति); [यथा,—कर्णप्रमदाय] क्वचित् भृङ्गीगीतं; [त्वगिन्द्रियसुखाय] क्वचित् अनिल-भङ्गीशिशिरता (अनिलस्य वायोः भङ्गी मान्द्यं तया शिशिरता शैत्यं—मन्दानिलस्य शैत्यमित्यर्थः); [नेत्रानन्दाय] क्वचित् वल्लीलास्यं (लतान्नृत्यं); [नासा-प्रमदाय] क्वचित् अमलमल्लीपरिमलः (मल्लयाः मल्लिकायाः अमलः अविमिश्रः परिमलः सुगन्धः); [जिह्वा-सुखाय] क्वचित् धाराशाली (पंक्तिक्रम-विन्यासविशिष्टा) करकफलपालीरसभरः (करकफलपाली दाड़िम्बफलश्रेणी तस्याः रसाधिक्यम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160॥ वहाँ मुरली जैसे :— विदग्धमाधव (3/1)में श्रीललिताके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— परामृष्टाङ्गुष्ठत्रयमसितरत्नैरुभयतो वहन्ती सङ्कीर्णौ मणिभिररुणैस्तत्परिसरौ। तयोर्मध्ये हीरोज्ज्वलविमल-जाम्बूनदमयी करे कल्याणीयं विहरति हरेः केलिमुरली॥ 161॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 161॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दोनों सिरोंपर तीन अँगुलीके परिमाणवाली इन्द्रनीलमणिके द्वारा जड़ित, उसके भीतर दोनों ओर तीन अँगुलीके परिमाणवाली अरुणमणिसे जड़ित और उसके मध्यमें हीरोंसे उज्ज्वलित विमल स्वर्णमयी यह कल्याणी कृष्ण-क्रीड़ा-मुरली कृष्णके हाथोंमें विहार कर रही है॥ 161॥ अनुभाष्य— उभयतः (वंश्याः शिरसि पुच्छे च) अङ्गुष्ठत्रयम् (अङ्गुष्ठत्रय

30 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/161-164 ] परिमितां स्थलं व्याप्य) असितरत्नैः (इन्द्रनीलमणिभिः) परामृष्टा (व्याप्ता, खचिता) अरुणैः मणिभिः सङ्गीर्णौ (खचितौ) [अङ्गुष्ठत्रयं व्याप्य द्वौ परिसरौ] तत्परिसरौ (मुखपुच्छोभय-प्रदेशे) वहन्ती, तयोः (परिसरयोः) मध्ये हीरोज्ज्वल-विमलजाम्बूनदमयी (हीरैः उज्ज्वलं दीप्तं यत् विमलं विशुद्धं जाम्बूनदं सुवर्णं तन्मयी) इयं कल्याणी (कल्याणमयी) केलि-मुरली (कृष्णक्रीड़ा- वंशी) हरेः (कृष्णस्य) करे (पाणौ) विहरति (विलसति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 161 ॥ विदग्धमाधव (5/17)में श्रीविशाखाके समक्ष श्रीराधाकी उक्ति— सद्वंशतस्तव जनिः पुरुषोत्तमस्य पाणौ स्थितिर्मुरलिके सरलासि जात्या। कस्मात्त्वया सखि गुरोर्विषमा गृहीता गोपाङ्गनागणविमोहनमन्त्रदीक्षा॥ 162 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, मुरलि, तुम—सद्वंशमें उत्पन्न हुई हो, पुरुषोत्तमके हाथमें स्थित हो और जातिसे सरल होनेपर भी किसलिये गोपाङ्गनाओंको विमोहित करनेवाले विशेष गुरुतर (विषम) मन्त्रमें दीक्षित हुई हो?162 ॥ अनुभाष्य— हे मुरलिके, सद्वंशतः (उत्तमवंशदण्डतः, सत्कुलात् इत्यर्थः) तव जनिः (जन्म अभूत्); पुरुषोत्तमस्य (कृष्णस्य) पाणौ (हस्ते) तव स्थिति (वासः); जात्या सरला (अवक्रा, ऋजु) असि; [हे सखि] कस्मात् गुरोः [सकाशात् प्रसादात् वा] त्वया विषमा (असरला) गोपाङ्गनागण-विमोहन-मन्त्रदीक्षा गृहीता (प्राप्ता—गोपीजन-चित्तहरणक्षम-मनुना दीक्षिता)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ विदग्धमाधव (4/7)में पद्माके प्रति चन्द्रावलीकी उक्ति— सखि मुरलि विशालच्छिद्रजालेन पूर्णा लघुरतिकठिना त्वं ग्रन्थिला नीरसासि। तदपि भजसि शश्वच्चुम्बनानन्दसान्द्रं हरिकरपरिरम्भं केन पुण्योदयेन॥ 163 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि मुरलि, तुम—महादोषसमूहसे पूर्ण, लघु, अति कठिन, नीरस और जटिल होनेपर भी किस पुण्यके उदित होनेके कारण निरन्तर कृष्ण-मुख-चुम्बनके गाढ़ आनन्दको तथा कृष्णके हाथके आलिङ्गनरूपी सेवाको स्वीकार कर रही हो?163 ॥ अनुभाष्य— हे सखि मुरलि; त्वं विशालच्छिद्रजालेन (महादोषसमूहेन) पूर्णा (व्याप्ता), लघुः (लाघववती, गौरवहीना), अतिकठिना (निष्ठुरस्वभावा), ग्रन्थिला (नीविग्रन्थिमोचिका), नीरसा (शुष्का) च असि, तदपि केन पुण्योदयेन (प्राक्तनसुकृतिना) शश्वत् (निरन्तरं) चुम्बनानन्दसान्द्रं (चुम्बनोत्थसुखघनं) हरिकरपरिरम्भं (कृष्णहस्तालिङ्गनं) भजसि (प्राप्नोषि)? श्लोक-भावानुवाद—हे सखि मुरलि; तुम महादोषसमूहसे पूर्ण, गौरवहीन, निष्ठुर स्वभाववाली, नीविकी गाँठको खोल देनेवाली और शुष्क हो, तथापि किस प्राचीन सुकृतिरूप पुण्यके उदित होनेके कारण निरन्तर (कृष्णमुखके) चुम्बनसे उत्पन्न घनानन्दको तथा कृष्णके हाथके आलिङ्गनको प्राप्त किया है? ॥ 163 ॥ वहाँ मुरलीभ्रमण जैसे :- विदग्धमाधव (1/27)में श्रीकृष्णके प्रति मधुमङ्गलकी उक्तिके समय आकाशवाणी— रुन्धन्नम्बुभृतश्चमत्कृतिपरं कुर्वन्मुहुस्तम्बुरुं ध्यानादन्तरयन् सनन्दनमुखान् विस्मापयन् वेधसम्। औत्सुक्यावलिभिर्बलिं चटुलयन् भोगीन्द्रमाघूर्णयन् भिन्दन्नण्डकटाहभित्तिमभितो वभ्राम वंशीध्वनिः ॥ 164 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेघकी गतिको अवरुद्ध करके, तुम्बुरादि गन्धर्वोंको विस्मित करके, [ब्रह्मज्ञानमें रत] सनन्दनादि ऋषियोंके ध्यानको भङ्ग करके, ब्रह्मामें विस्मय उत्पन्न करके, धीर-स्थिर (अर्थात् अटल-अचल) बलिराजको उत्सुकताओंके द्वारा अशान्त-चञ्चल बनाकर,

[ 1/164–166 पहला अध्याय 31 पृथ्विधारी सर्पराज अनन्तके [सिरको] चक्राकार एवं ब्रह्माण्डके आवरणको भेदकर चारों ओर श्रीकृष्णकी वंशी ध्वनिने भ्रमण किया था॥164॥ अनुभाष्य— वंशीध्वनिः (कृष्णमुरलीनिनादः) अम्बुभृतः (मेघगणान्) रुन्धन्, तुम्बुरुं (गन्धर्वराजं) मुहुः चमत्कृतिपरं (विस्मयान्वितं) कुर्वन्, सनन्दनमुखान् (चतुःसनप्रमुखान् ब्रह्मज्ञानरतान् मुनीन्) ध्यानात् अन्तरयन् (त्यजयन्), वेधसं (ब्रह्माणं) विस्मापयन् (विस्मयमुत्पादयन्), औत्सुक्यावलिभिः (कौतूहलानन्दपुञ्जैः) बलिं चटुलयन् (चञ्चलीकुर्वन्) भोगीन्द्रं (नागराजं शेषम्) आघूर्णयन्, अण्डकटाहभित्तिं (ब्रह्माण्डावरणम्) भिन्दन् अभितः (चतुर्दिक्षु, परितः) वभ्राम। श्लोक–भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥164॥ वहाँ श्रीकृष्ण जैसे :— विदग्धमाधव (1/17)में नान्दीमुखीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— अयं नयनदण्डितप्रवरपुण्डरीकप्रभः प्रभाति नवजागुड़-द्युतिविड़म्बि-पीताम्बरः। अरण्यजपरिक्रिया-दमितदिव्यवेषादरो हरिन्मणिमनोहरद्युतिभिरुज्ज्वलाङ्गो हरिः॥165॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥165॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इन कृष्णने अपने नयनोंकी शोभासे अति सुन्दर श्वेतकमलकी शोभाका हरण किया है; इनका नवकुङ्कुमकी द्युतिका तिरस्कार करनेवाला पीताम्बर शोभा पा रहा है; इन्होंने वनके वेश-अलङ्कारादिके द्वारा दिव्य-वेशादिके आदरको दूर कर दिया है;—ऐसे इन्द्रनीलमणिकी अपेक्षा भी अधिक मनोहर अङ्गकान्तिसे सम्पन्न—उज्ज्वल कृष्णचन्द्र शोभा पा रहे हैं॥165॥ अनुभाष्य— अयं हरिः नयनदण्डित-प्रवर-पुण्डरीकप्रभः (नयनशोभया दण्डिता दमिता प्रवरस्य उत्तमस्य पुण्डरीकस्य प्रफुल्लश्वेतकमलस्य प्रभा शोभा येन सः) नवजागुड़द्युतिविड़म्बिपीताम्बरः (नवजागुड़स्य नवीनकुङ्कुमस्य द्युतिः कान्तिः तां विडम्बयितुं शीलं यस्य तथाभूतं पीतवर्णम् अम्बरं यस्य सः) अरण्यजपरिक्रिया– दमितदिव्यवेषादरः (अरण्यजाभिः वन्याभिः परिक्रियाभिः अलङ्कारैः दमितः विजितः दिव्यवेषानाम् आदरः येन सः), हरिन्मणिमनोहर– द्युतिभिः (मरकतमणिवत् मनोहराः याः द्युतयः ताभिः) उज्ज्वलाङ्गः (उज्ज्वलम् अङ्गं यस्य सः) प्रभाति (शोभते)। श्लोक–भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥165॥ ललितमाधव (4/27)में श्रीराधाके प्रति श्रीललिताकी उक्ति— जङ्घाधस्तटसङ्गिदक्षिणपदं किञ्चिद्विभुग्नत्रिकं साचिस्तम्भितकन्धरं सखि तिरःसञ्चारिनेत्राञ्चलम्। वंशीं कुट्मलिते दधानमधरे लोलाङ्गुलीसङ्गतां बिभ्रद्भ्रूभ्रमरं वराङ्गि परमानन्दं पुरः स्वीकुरु॥166॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥166॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, हे वराङ्गि, जिनकी बाँयी जङ्घाके निचले भागमें दाहिना चरण रखा हुआ है, जिनके शरीरका मध्यभाग—थोड़ा-सा त्रिभङ्गमय है, जिनका कन्धा कुछ तिरछा होकर स्तम्भित (स्थिर) हो गया है, जिनका नेत्राञ्चल (अपाङ्ग दृष्टि) बङ्किम (तिरछी) है, उन्हीं थोड़ेसे उन्मीलित (मुकुलित) अधरोंपर चञ्चल अँगुलियोंसे संलग्न वंशीधारी एवं मुखकमलपर भ्रूरूपी-भ्रमरोंसे परिशोभित तुम्हारे सामने खड़े इन परमानन्दमय पुरुषको तुम स्वीकार करो॥166॥ अनुभाष्य— हे सखि, हे वराङ्गि, पुरः (अग्रे स्थितं) जङ्घाधस्तटसङ्गि- दक्षिणपदं (वामजङ्घायाः अधस्तटे निम्नदेशे सङ्गि मिलितं दक्षिणपदं दक्षिणचरणप्रान्तं, यस्य तं), किञ्चिद्विभुग्नत्रिकं (किञ्चित् ईषत् विभुग्नं त्रिकं मध्यभागः यस्य तं) साचिस्तम्भितकन्धरं (साचि तिर्यक् स्तम्भिता निश्चला कन्धरा ग्रीवा यस्य तं) तिरःसञ्चारिनेत्राञ्चलं (तिर्यक् सञ्चरितुं शीलम् अस्य इति सञ्चारि नेत्राञ्चलं नेत्रप्रान्तं यस्य तं) कुट्मलिते (सङ्कुचिते) अधरे लोलाङ्गुली-सङ्गतां (लोलाभिः परिचालिताभिः अङ्गुलीभिः सङ्गतां मिलितां) वंशीं दधानं विभ्रद्भ्रूभ्रमरं (विभ्रतौ भ्रूरूपौ भ्रमरौ यस्य तं) परमानन्दं (माधवं) स्वीकुरु। श्लोक–भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥166॥

32 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/167-169 ] ललितमाधव (1/52) में श्रीललिताके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— कुलवरतनुधर्मग्राववृन्दानि भिन्दन् सुमुखि निशितदीर्घापाङ्कटङ्कच्छटाभिः। युगपदमयपूर्वः कः पुरो विश्वकर्मा मरकतमणिलक्षैर्गोष्ठकक्षां चिनोति॥ 167 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सुमुखि, हमारे सामने ये कौन अपूर्व विश्वकर्मा हैं?—जो अपनी दीर्घ अपाङ्गरूप तीक्ष्ण छेनीकी छटाके द्वारा ही कुलवधुओंके स्वधर्मरूपी (पातिव्रत्यरूपी) पाषाणोंके टुकड़े-टुकड़े करके असंख्य मरकत-मणि-तुल्य अपने श्यामसुन्दर वपुके द्वारा गोष्ठ-प्रकोष्ठकी एक ही साथ रचना कर रहे हैं? 167 ॥ अनुभाष्य— हे सुमुखि, पुरः (अग्रे) अयं अपूर्वः (अदृष्टाश्रुतः) विश्वकर्मा कः?—यः [युगपत्] निशितदीर्घापाङ्कटङ्कच्छटाभिः (निशितः शाणितः दीर्घापाङ्ग एव टङ्कः शिलादिविदारणास्त्रविशेषः, तस्य छटाभिः दीप्तिभिः) कुलवरतनुधर्मग्राववृन्दानि (कुलवरतनूनां कुलवधूनां धर्मान् पातिव्रत्यादिरूपान् एवं ग्राववृन्दानि पाषाणसमूहान्) भिन्दन्, मरकतमणिलक्षैः (मरकतमणीनां हिरण्मणीनां लक्षसंख्याभिः, मरकतमणितयाध्यवसितैः श्यामगौन्दर्यमय-पुरैरित्यर्थः) गोष्ठ-कक्षां (गोष्ठप्रदेशं) चिनोति (रचयति पूरयतीत्यर्थ, अनेन श्लोकेन श्रीकृष्णस्य वैदग्ध्य-सौन्दर्यादि गुणदर्शनेन राधायाश्चमत्कारः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस श्लोकमें श्रीकृष्णके वैदग्धी-सौन्दर्यादि गुणोंके दर्शनसे श्रीराधाके हृदयमें चमत्कारका वर्णन है॥ 167 ॥ ललितमाधव (1/49) में श्रीराधाके प्रति श्रीललिताकी उक्ति— महेन्द्रमणिमण्डलीमदविडम्बिदेहद्युति- र्व्रजेन्द्रकुलचन्द्रमाः स्फुरति कोऽपि नव्यो युवा। सखि स्थिरकुलाङ्गना-निकर-नीवि-बन्धार्गल- च्छिदाकरणकौतुकी जयति यस्य वंशीध्वनिः ॥ 168 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 168 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, महा इन्द्रमणि-मण्डलीके गर्व-विनाशी देहकान्तियुक्त व्रजराजकुलके चन्द्रस्वरूप यह कौन नवीन युवक स्फूर्ति प्राप्त कर रहे हैं;—धैर्यशालिनी कुलाङ्गनाओंके नीविके बन्धनको ढीला करनेवाली कौतुकयुक्त इनकी वंशीकी ध्वनि जययुक्त हो रही है॥ 168 ॥ अनुभाष्य— हे सखि, यस्य स्थिरकुलाङ्गना-निकर-नीविबन्धार्गल- च्छिदाकरण-कौतुकी (स्थिरकुलाङ्गनानां साध्वीस्त्रीणां निकरस्य समूहस्य नीविबन्ध एव अर्गलः कपाटः विष्कम्भकः वा, तस्य छिदाकरणे बन्धनछेदने कौतुकं यस्याः सा) वंशीध्वनिः जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते), सः महेन्द्रमणिमण्डलीमदविडम्बिदेह-द्युतिः (महेन्द्रमणिमण्डलीनां मदं गर्वं विड़म्बयितुं शीलम् अस्याः तथाभूता देहस्य द्युतिः कान्तिः यस्यः सः) कः अपि नव्यः युवा व्रजेन्द्रकुलचन्द्रमाः (नन्दकुलशशधरः) स्फुरति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 168 ॥ वहाँ श्रीराधा जैसे :- विदग्धमाधव (1/32) में पौर्णमासीकी उक्ति— बलादक्षणोर्लक्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयं मुखोल्लासः फुल्लं कमलवनमुल्लङ्घयति च। दशां कष्टामष्टापदमपि नयत्याङ्गिरुचि- र्विचित्रं राधायाः किमपि किल रूपं विलसति ॥ 169 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके नयनोंकी शोभा नवीन नीलकमलकी शोभाको बलपूर्वक ग्रास करती है, जिनका प्रफुल्लित मुखोल्लास कमलवनका उल्लङ्घन करता है, जिनकी अङ्गकान्ति सुन्दर जाम्बूनदको (सुवर्णको) कष्टदशामें पहुँचा देती है, ऐसी श्रीराधिकाका विचित्र रूप आश्चर्य्यरूपसे विलास अर्थात् स्फूर्त्ति प्राप्त कर रहा है॥ 169 ॥ अनुभाष्य— [श्रीराधायाः] अक्ष्णोः (नयनयोः) लक्ष्मीः (शोभा) नव्यं (नवप्रस्फुटितं) कुवलयम् (उत्पलं) बलात् कवलयति (ग्रसते), मुखोल्लासः (मुखशोभा) फुल्लं (विकसितं) कमलवनम् उल्लङ्घयति

[ 1/169-174 पहला अध्याय 33 ] (दूरीकरोति), आङ्गिकरुचिः (देहकान्तिः) अष्टापदं (सुवर्णम्) अपि कष्टां (क्लेशसमन्वितां) दशां नयति, [अतएव] राधायाः रूपं किल किमपि विचित्रं विलसति (स्फुरति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥169॥ विदग्धमाधव (5/20)में मधुमङ्गलके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति— विधुरेति दिवा विरूपतां शतपत्रं बत शर्वरीमुखे। इति केन सदाश्रियोज्ज्वलं तुलनामर्हति मत्प्रियाननम्॥170॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चन्द्रकी शोभा रात्रिमें सुन्दर होनेपर भी दिनके समय विरूपताको प्राप्त होती है, कमल दिनके समय सुन्दर होनेपर भी रात्रिमें मलिन (बन्द) हो जाता है, किन्तु हे सखे, मेरी प्रियतमा राधिकाका मुख दिन-रात सर्वदा शोभासे उज्ज्वल रहता है, इसलिये किसके साथ उसकी तुलना हो सकती है?170॥ अनुभाष्य— विधुः (चन्द्रः) दिवा (दिवसे), शतपत्रं (पद्मं) शर्वरीमुखे (सन्ध्यायां) बत विरूपतां (कान्तिराहित्यम्) एति (प्राप्नोति) इति सदा (दिवारात्रे सर्वदा) श्रिया (शोभया) उज्ज्वलं मत्प्रियाननं (श्रीराधिकामुखं) केन (उपमानेन सह) तुलनाम् अर्हति? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ विदग्धमाधव (2/51)में श्रीकृष्णकी स्वयंसे उक्ति— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलता-लास्यभाजः। मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं दधानो हृदयमिदमदाङ्क्षीत् पक्ष्मलक्ष्याः कटाक्षः॥171॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मन्द-मन्द हास्ययुक्त कपोल आनन्दकी तरङ्गोंसे युक्त हैं, जिनकी भ्रू-लता प्रमत्त-चञ्चला-भ्रमरीकी भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली भङ्गीको धारण करके कामदेवके धनुषकी भाँति नृत्य कर रही है, उनके नेत्रोंकी पलकोंसे निकले कटाक्षने मेरे हृदयको दंशन कर दिया है॥171॥ अनुभाष्य— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः (प्रमदरसतरङ्गेण आनन्द- रसप्रवाहेण स्मेरगण्डस्थलं स्मेरं मन्दहासान्वितं गण्डस्थलं यस्याः तस्याः) स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलतालास्यभाजः (कामदेवकार्मुकसदृशा या भ्रूलता, तादृशाः लास्यं नर्तनं भजति या तस्याः) पक्ष्मलक्ष्याः (पक्ष्मले प्रशस्तपक्षान्विते अक्षिणी यस्याः तस्याः राधायाः) मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं (मदेन यः कलः, तेन चला चञ्चला चपला या भृङ्गी तस्याः भ्रान्तिः भ्रमः यतः तादृशीं भङ्गीं) दधानः [राधायाः] कटाक्षः इदं [मम] हृदयं अदाङ्क्षीत् (दष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ श्रीरूपसे ललितमाधवके नान्दी-पाठका अनुरोध :— राय कहे,—“तोमार कवित्व अमृतेर धार। द्वितीय नाटकेर कह नान्दी-व्यवहार॥”172॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“हे रूप! तुम्हारा कवित्व तो अमृतकी धाराके समान है। अब तुम अपने द्वितीय (ललितमाधव) नाटकका नान्दी श्लोक पढ़ो॥”172॥ अनुभाष्य—'द्वितीय नाटकेर',—ललितमाधव नाटकका; यहाँसे श्रीरामानन्द श्रीरूपके द्वारा रचित श्रीललितमाधवके विषयकी जिज्ञासा कर रहे हैं॥172॥ श्रीरायके माहात्म्यकी तुलनाके द्वारा श्रीरूपका अपना दैन्य ज्ञापन :— रूप कहे,—“काँहा तुमि सूर्योपम भास। मुञि कोन् क्षुद्र,—येन खद्योत-प्रकाश॥173॥ तोमार आगे धाष्टर्य एइ मुख-व्यादान।” एत बलि' नान्दी-श्लोक करिला व्याख्यान॥174॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने कहा,—“कहाँ तो आप सूर्यके समान प्रकाशमान और कहाँ मैं जुगनुके समान

34 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/173-179 ] अत्यन्त क्षुद्र हूँ। आपके समक्ष अपना मुख खोलना मेरी धृष्टता ही है।" यह कहकर उन्होंने ललितमाधवका नान्दी-श्लोक पढ़ा ॥ 173-174 ॥ मङ्गलाचरण-श्लोकमें असुरमर्दन सुरनन्दन मुकुन्दके यशका स्तव :- ललितमाधव (1/1)में- सुररिपुसुदृशामुरोजकोकान्मुखकमलानि च खेदयन्नखण्डः। चिरमखिलसुहृच्चकोरनन्दी दिशतु मुकुन्दयशःशशी मुदं वः ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुररिपु (नरक आदि असुरों) की पत्नियोंके स्तनरूपी चक्रवाक और मुखरूपी कमलसमूहको खिन्न अर्थात् दुःखग्रस्त करके मुकुन्दका जो अखण्ड यशरूपी चन्द्र अपने अखिल सुहृद्रूपी चकोरोंका निरन्तर आनन्द विधान करता है, वह आपका सुख विधान करे ॥ 175 ॥ अनुभाष्य- सुररिपुसुदृशां (नरकाद्यसुराङ्गनानाम्) उरोजकोकान् (उरोजाः एव कोकाः चक्रवाकाः तान् स्तनरूपचक्रवाकान्) मुखकमलानि (मुखानि एव कमलानि) च खेदयन् अखिलसुहृच्चकोरनन्दी (अखिलाः सुहृदः एव चकोराः तान् नन्दयितुं शीलं यस्य सः) अखण्डः (परिपूर्णः) मुकुन्दयशःशशी (मुकुन्दस्य यशः एव शशी चन्द्रः) वः (युष्माकं) मुदं (सुखं) चिरं दिशतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्रीरायके द्वारा श्रीरूपको स्वाभीष्टदेवके वर्णन करनेका अनुरोध, श्रीरूपकी लज्जा :- 'द्वितीय नान्दी कह देखि ?' - राय पुछिला। सङ्कोच पाञा रूप पड़िते लागिला ॥ 176 ॥ अनुवाद - श्रीरायरामानन्दने पूछा,-'हे रूप! तुमने द्वितीय नान्दी-श्लोकमें क्या लिखा है, उसका पाठ करो।" श्रीरूप कुछ सङ्कोच करते हुए श्लोक पढ़ने लगे॥ 176 ॥ स्वाभीष्ट-देवता श्रीकृष्णचैतन्यके आशीर्वादकी याचना :- ललितमाधव (1/3)में सूत्रधारका अपने इष्टदेवको प्रणाम- निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् यः क्षितौ किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः । स लुञ्चित-तमस्ततिर्मम शचीसुताख्यः शशी वशीकृतजगन्मनाः किमपि शर्म विन्यस्यतु ॥ 177 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो पृथ्वीतलपर उदित होकर अपने प्रणयरसकी सुधाका विस्तार कर रहे हैं, उन द्विजकुलके अधिराजरूपमें अवस्थितिको अङ्गीकार करनेवाले, अन्धकारके [अज्ञान और छलके] समूहको दूर करनेवाले, जगत्वासियोंके मनको वशीभूत करनेवाले शचीनन्दनके नामसे प्रसिद्ध चन्द्र मेरा मङ्गल विधान करें ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- यः क्षितौ (पृथिव्याम्) उदयं (प्राकट्यं) आप्नुवन् सन् निजप्रणयितां सुधां (स्वप्रेमामृतम्) अलम् (अतिशयेन) किरति (विस्तारयति), उरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः (उरीकृता अङ्गीकृता द्विजकुलस्य अधिराजः तस्य स्थितिः साम्राज्यमर्यादा येन सः) लुञ्चित-तमस्ततिः (लुञ्चिता ताड़िता तमस्ततिः अज्ञानकैतवपुञ्जः येन सः) वशीकृत-जगन्मनाः (वशीकृतानि जगतां मनांसि येन सः) शचीसुताख्यः (शचीनन्दन नामा) शशी (चन्द्रः) मम किमपि शर्म (कल्याणं) विन्यस्यतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ महाप्रभुके भीतरमें सन्तोष, बाहरमें रोषाभास :- शुनिया प्रभुर यदि अन्तरे उल्लास। बाहिरे कहेन किछु करि' रोषाभास ॥ 178 ॥ "काँहा तोमार कृष्णरसवाक्य-सुधासिन्धु। ता'र मध्ये मिथ्या केने स्तुति-क्षारबिन्दु ॥" 179 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको श्रवण करके महाप्रभुके भीतरमें तो उल्लास होनेपर भी वे बाहरसे कुछ रोषाभास दिखाते हुए कहने लगे,- "कहाँ तो तुम्हारे

[ 1/178-184 पहला अध्याय 35

कृष्णरस-वाक्य अमृत-सिन्धुके समान हैं, तब क्यों तुमने उसमें मेरी मिथ्या स्तुतिरूपी (कटु) क्षार-बिन्दुको मिला दिया है?”178-179 ॥ श्रीरायके द्वारा श्लोककी प्रशंसा— राय कहे,—“रूपेर काव्य अमृतेर पूर। ता'र मध्ये एक बिन्दु दियाछे कर्पूर॥”180॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“रूपका काव्य अमृतका सार है, उसने तो उसमें एक बिन्दु कर्पूरको मिला दिया है॥”180॥ प्रभु कहे,—“राय, तोमार इहाते उल्लास। शुनितेइ लज्जा, लोके करे उपहास॥”181॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे राय ! इस कवित्वको सुनकर आपको तो उल्लास हो रहा है, किन्तु मुझे तो इसे सुनते ही लज्जा आ रही है, क्योंकि इसे सुनकर लोग उपहास करेंगे॥”181॥ राय कहे,—“लोकेर सुख इहार श्रवणे। अभीष्टदेवेर स्मृति मङ्गलाचरणे॥”182॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“लोग उपहास नहीं करेंगे, अपितु अभीष्टदेवकी स्मृति करवानेवाले इस मङ्गलाचरणको सुनकर लोग प्रसन्न ही होंगे॥”182॥ श्रीरायके द्वारा ललितमाधवके विविध अङ्गों और परिचयकी जिज्ञासा, श्रीरूपके द्वारा नाटकमें लिखित श्लोकका पाठ करके उत्तर देना :— राय कहे,—“कोन् अङ्गे पात्रेर प्रवेश?” तबे रूप-गोसाञि कहे ताहार विशेष॥ 183 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने श्रीरूपसे पूछा,—“प्रस्तावनाके किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है?” तब श्रीरूप गोस्वामी उस विषयका वर्णन करने लगे॥ 183 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 1/134 वीं संख्या और उसका अनुभाष्य देखें। किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है,—'उद्घात्यक', 'कथोद्घात', 'प्रयोगातिशय', 'प्रवर्त्तक' और 'अवलगित'—ये पाँच प्रकारकी प्रस्तावना हैं; एवं भारती-वृत्तिकी 'प्ररोचना', 'वीथी' और 'प्रहसना'—ये तीन प्रकारके अङ्ग हैं। श्रीरामानन्द श्रीरूपसे जिज्ञासा कर रहे हैं,—तुमने स्वरचित नाटकमें उक्त पाँच प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें-से किस प्रकारकी प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके किस अङ्गको स्वीकार करके अभिनेता रूपी पात्रको रङ्गमञ्चमें प्रवेश करवाया है?183॥ ललितमाधव (1/11)में नटीके प्रति सूत्रधारकी उक्ति— “नटता किरातराजं निहत्य रङ्गस्थले कलानिधिना। समये तेन विधेयं गुणवति ताराकरग्रहणम्॥ 184 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नृत्य करते-करते रङ्गमञ्चपर किरातराज (कंसका) वध करके कलानिधिके (कृष्णचन्द्रके) द्वारा 'पूर्णमनोरथ'-नामक गुणयुक्त समयमें ताराका (श्रीराधाका) पाणिग्रहण-कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥ अनुभाष्य— नटता (अभिनयं कुर्वता) तेन कलानिधिना (तन्नाम्ना नटेन) रङ्गस्थले (अभिनय-क्षेत्रे) किरातराजं (किरातदेशाधिपं) निहत्य गुणवति (अनुकूल-नक्षत्राधिष्ठिते) समये ताराकरग्रहणं (तन्नाम्न्याः कन्यायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्; पक्षान्तरे,—रङ्गस्थले (रङ्गक्षेत्रे) तेन [चतुःषष्ठि-] कलानिधिना (श्रीकृष्णेन) किरातराजं (कंसं) निहत्य (हत्वा) गुणवति (दशमाङ्गाख्ये पूर्णमनोरथनाम्नि) समये ताराकरग्रहणं (श्रीराधिकायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पक्षान्तरमें-रङ्गमञ्चपर चौंसठ कलाओंके निधिस्वरूप (श्रीकृष्णचन्द्र) के द्वारा किरातराजका (कंसका) वध करनेके पश्चात् [नाटक-ग्रन्थके अन्तमें] 'पूर्णमनोरथ' नामक दशम-अङ्क समयमें तारा अर्थात् श्रीराधिकाका पाणिग्रहण कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥

36 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/185-188 ] 'उद्घात्यक' नाम एइ 'आमुख'-'वीथी' अङ्ग। तोमार आगे कहि,-इहा धार्ष्ट्येर तरङ्ग॥" 185 ॥ अनुवाद—'उद्घात्यक'-नामक आमुख अर्थात् प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके वीथी नामक अङ्गको स्वीकार करके पात्र रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुआ है। हे श्रीरामानन्द राय! आपके समक्ष ये सब बातें करना मेरी धृष्टताकी तरङ्ग ही है॥ 185 ॥ अनुभाष्य—इस श्लोकमें आमुख अर्थात् प्रस्तावनाका नाम 'उद्घात्यक' एवं भारती वृत्तिके अङ्गका नाम 'वीथी' कहा गया। साहित्यदर्पणके छठे अध्यायकी 520 (253-254) संख्यामें— “वीथ्यामेको भवेद्दङ्कः कश्चिदेकोऽत्र कल्प्यते। आकाशभाषितैरुक्तैश्चित्रां प्रत्युक्तिमाश्रितः॥ सूचयेद्बूरि शृङ्गारं किञ्चिदन्यान् रसानपि। मुखनिर्वहणे सन्धौ अर्थप्रकृतयोऽखिलाः॥” अर्थात् “वीथीमें केवल मात्र एक ही अङ्क है; इस अङ्कमें कोई एक नायक कल्पनापूर्वक आकाशवाणीके द्वारा विचित्र उक्ति-प्रत्युक्तिका आश्रय करके प्रचुररूपमें शृङ्गाररसकी और किञ्चित् रूपमें अन्यान्य रस-समूहकी भी सूचना करता है; एवं उसकी मुखबन्ध और सन्धिमें समस्त अर्थप्रकृति अथवा बीज ही प्रयोज्य है।” इस स्थानपर चन्द्रके साथ 'नटता'-शब्दके युक्त होनेसे अर्थ अस्फुट होता है, इसलिये कृष्णके साथ युक्त होनेसे परिस्फुट अर्थका बोध होनेके कारण 'उद्घात्यक' नामक प्रस्तावना हुई एवं कृष्णसम्बन्धी अर्थ मानकर ही पौर्णमासी भी रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुई। श्रीरूप श्रीराम-रायको कह रहे हैं,—आपके जैसे रसशास्त्र-पारदर्शी पण्डित व्यक्तिके सम्मुख मेरी एक-एक उक्ति-मानो धृष्टतारूपी समुद्रकी अर्थात् प्रगल्भता-सागरकी एक-एक लहरके समान है॥ 185 ॥ साहित्यदर्पणमें दृश्य-श्रव्यके निरूपणमें (6/289)[34]— पदानि त्वगताथानि तदर्थगतये नराः। योजयन्ति पदैरन्यैः स उद्घात्यक उच्यते ॥ 186 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्यगण अस्फुट (अनिश्चित) अर्थवाले पदोंके अर्थको समझनेके लिये जब उसे अन्य पदोंके साथ जोड़ते हैं, तो उसे 'उद्घात्यक' कहते हैं॥ 186 ॥ अनुभाष्य— नराः (आलङ्कारिकाः) तु अगताथानि (अप्राप्तार्थानि अबोधिताथानि) पदानि तदर्थगतये (तेषाम् अबोधिताथांनां पदानां गतये अवबोधाय) अन्यैः पदैः यं योजयन्ति, सः 'उद्घात्यकः' उच्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ राय कहे,—“कह आगे अङ्गेर विशेष।” श्रीरूप कहेन किछु संक्षेप-उद्देश ॥ 187 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“अब तुम विदग्धमाधव नाटकके समान ललितमाधव नाटकके भी विशेष अङ्गोंका वर्णन करो।” उनके विषयमें श्रीरूप गोस्वामी कुछ संक्षेपमें बतलाने लगे॥ 187 ॥ अनुभाष्य—'अङ्गेर विशेष',—पूर्ववर्ती (अन्त्यलीला 1/156 संख्यामें वर्णित) पूर्ववत् यथाक्रमसे वृन्दावन, मुरलीनिःस्वन (वंशी-स्वर), कृष्ण और राधिकाका वर्णन॥ 187 ॥ वहाँ वृन्दावन जैसे :— ललितमाधव (1/23)में गार्गीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— हरिमुद्दिशते रजोभरः पुरतः सङ्गमयत्यमुं तमः। व्रजवामदृशां न पद्धतिः, प्रकटा सर्वदृशः श्रुतेरपि ॥ 188 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गायके खुरोंसे उड़ती धूलि हरिके [आने] की सूचना दे रही है; सामने उपस्थित तमः (अन्धकार) गोपियोंके साथ उन्हें मिलवा रहा है; इसलिये गोपवधुओंकी पद्धति सर्वज्ञ श्रुतियोंके लिये भी अगोचर हो गयी है॥ 188 ॥

[ 1/188–190 पहला अध्याय 37 अनुभाष्य— रजोभरः (रजसां गोक्षुरोत्थधूलीनां भरः पुञ्जः समूहः) हरिम् उद्दिशते (सूचयति), तमः (अन्धकारः) पुरतः अमुं (कृष्णं) सङ्गमयति (संयोजयति, अतः) व्रजवामदृशां (व्रजाङ्गनानां) पद्धतिः (रीतिः) सर्वदृशः (सर्वज्ञायाः) श्रुतेः (वेदस्य) अपि प्रकटा च न (गोचरा न स्यात्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। त्रिगुण-विषयक वेदोंमें गुणातीत कृष्णका निर्देश और मिलनकी कथा अव्यक्त है। रजोगुणके द्वारा इस माया जगत्में फेंक दिये जानेके कारण कृष्णविमुख बद्धजीवोंका कृष्णके विषयमें कोई ज्ञान नहीं होता और तमोगुणके द्वारा आवरणके कारण उनका कृष्णसे मिलनका अभाव होता है। किन्तु अप्राकृत वृन्दावनमें गैयाओंके खुरोंसे उठी धूलिके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंके निकट कृष्णका आगमन सूचित होता है एवं तमः अथवा अन्धकारके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंका कृष्णसे सङ्गम सम्पादित होता है। इसलिये शुद्धसत्त्व गोपियाँ और शुद्धसत्त्व श्रीवृन्दावन, दोनों ही त्रिगुणात्मक वेदोंके अगोचर हैं,—यही श्लोकका अर्थ है ॥ 188 ॥ वहाँ मुरलीका भ्रमण जैसे :- ललितमाधव (1/24)में पौर्णमासीके प्रति गार्गीकी उक्ति— हियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षति राधां वनाय या निपुणा। सा जयति निसृष्टार्था वरवंशजकाकली दूती ॥ 189 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 189 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—निपुणा, विशेष कार्य-प्राप्त, श्रेष्ठवंशमें उत्पन्न-वंशीकी मधुर-ध्वनिरूपी दूती जो श्रीराधाकी लज्जा दूर करवाकर उन्हें उनके गृहसे वनकी ओर आकर्षित करती है, वह जययुक्त हो ॥ 189 ॥ अनुभाष्य— या हियं (लज्जाम्) अवगृह्य (विहत्य, हत्वा इत्यर्थः) गृहेभ्यः वनाय (वनगमन-निमित्ताय इत्यर्थः) राधां कर्षति सा निपुणा (दक्षा) निसृष्टार्था (विन्यस्त-कर्मभारा) वरवंशजकाकली (वंशीध्वनिरूपा) दूती जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। निसृष्टार्था,—(उःनीः दूतीभेद प्रकरणमें 7/57 श्लोक)— “विन्यस्तकार्यभारा स्याद्द्वयोरेकतरेण या। युक्त्योभौ घटयेदेषा निसृष्टार्था निगद्यते।” [अर्थात् “नायक अथवा नायिकाके द्वारा किसी विशेष कार्यका भार प्राप्त होनेपर युक्ति और विचारके द्वारा दोनोंका मिलन करवानेवाली दूतीको निसृष्टार्था-दूती कहते हैं।”] ॥ 189 ॥ वहाँ श्रीकृष्ण जैसे :- ललितमाधव (2/11)में श्रीकृष्णके दर्शनसे सखीके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— सहचरि निरातङ्कः कोऽयं युवा मुदिरद्युति- र्व्रजभुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः। अहह चटुलैरुत्सर्पद्भिर्दृगञ्चलतस्करै- र्मम धृतिधनं चेतःकोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥ 190 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि, नवमेघ-कान्तियुक्त, मदमत्त हाथीकी भाँति लीलाकारी, आशङ्का-रहित यह युवक कौन है? यह कहाँसे [व्रजभूमिमें] आया है? आहा, यह चञ्चल गतिके द्वारा और चोरकी भाँति दृष्टिके द्वारा मेरे हृदयके भण्डारसे चित्तके धैर्यरूपी धनको लूट रहा है ॥ 190 ॥ अनुभाष्य— हे सहचरि, अहह इह (वृन्दाविपिने) यः युवा चटुलैः (चपलैः) उत्सर्पद्भिः (सर्वादिक्षु भ्रमद्भिः) दृगञ्चलतस्करैः (नयनकटाक्षचौरैः) मम चेतःकोषात् (हृद्-भाण्डारतः) धृतिधनं (धैर्यरूप-धनं) विलुण्ठयति, मुदिरद्युतिः (मुदिरस्य मेघस्य द्युतिरिव द्युतिः यस्य सः नवमेघरुचिः) माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः (माद्यन् यः मतङ्गजः तद्वत् विभ्रमः विलासः यस्य सः महामत्तगजवच्चञ्चलः) निरातङ्कः (निःशङ्कः) अयं युवा कः? कुतः [च] व्रजभुवि प्राप्तः (समायातः)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥

38 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/191-197 ] वहाँ श्रीराधा जैसे :- ललितमाधव (2/10)में श्रीराधाके दर्शनसे श्रीकृष्णकी उक्ति- विहारसुरदीर्घिका मम मनःकरीन्द्रस्य या विलोचन-चकोरयोः शरदमन्दचन्द्रप्रभा। उरोऽम्बरतटस्य चाभरणचारुतारावली मयोन्नतमनोरथैरियमलम्भि सा राधिका॥ 191 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो राधिका-मेरे मनरूपी हस्तिके लिये विहारगङ्गा स्वरूपा है, मेरे चक्षुरूपी चकोरके लिये शारदीय पूर्णचन्द्रकी अतिशय प्रभास्वरूपा है एवं मेरे वक्षःस्थलरूपी आकाशके आभूषण-स्वरूप सुन्दर तारावलीकी भाँति है, आज मैंने उस राधिकाको उन्नत मनोरथके साथ [बहुत दिनोंकी अभिलाषाके बाद] प्राप्त किया॥ 191 ॥ अनुभाष्य- या (राधा) मम मनःकरीन्द्रस्य (हृदय-मातङ्गस्य) विहार- सुरदीर्घिका (स्वर्गङ्गा), या विलोचनचकोरयोः (विलोचने नयने एव चकोरौ तयोः) शरदमन्दचन्द्रप्रभा (शरदि अमन्दः पूर्णः यः चन्द्रः तस्य प्रभा), या उरोऽम्बरतटस्य (उरः वक्षः एव अम्बरं आकाशं तस्य तटे क्षेत्रे) च आभरणचारुतारावली (आभूषणेषु अलङ्कारेषु चारुतारावली सुन्दरनक्षत्रमण्डली) च, सा इयं राधिका मया (कृष्णेन) उन्नतमनोरथैः (बहुदिन-मनोवाञ्छितैः हेतुभूतैः) साम्प्रतम् अलम्भि (प्राप्तवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ श्रीरायके द्वारा सहस्त्र मुखोंसे श्रीरूपके कवित्वकी सतत-प्रशंसा :- एत शुनि' राय कहे प्रभुर चरणे। रूपेर कवित्व प्रशिंसे' सहस्र-वदने॥ 192 ॥ “कवित्व ना हय एइ अमृतेर धार। नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेर सार ॥ 193 ॥ प्रेम-परिपाटी एइ अद्भुत वर्णन। शुनि' चित्त-कर्णेर हय आनन्द-घूर्णन ॥ 194 ॥ अनुवाद-यह सुननेके बाद श्रीरायरामानन्द महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए श्रीरूपके कवित्वकी मानो सैंकड़ों मुखोंसे प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“रूपका कवित्व कवित्व नहीं, अपितु अमृतकी धारा है। नाटकके समस्त लक्षण सिद्धान्तके सार स्वरूप हैं। प्रेमकी परिपाटीका ऐसा अद्भुत वर्णन है, जिसे सुनकर मन और कर्ण आनन्दसे घूमने लगते हैं॥ 192-194 ॥ (प्राचीनकृत श्लोक)- किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः। परस्य हृदये लग्नः न घूर्णयति यच्छिरः ॥ 195 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्योंके हृदयको बींधकर यदि उसके सिरको ही चञ्चल नहीं कर पाये अर्थात् उसके सिरको ही नहीं घुमा पाये, तब कविके काव्यसे और धनुर्धारीके बाणसे क्या प्रयोजन ?195 ॥ प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य- तस्य कवेः काव्येन (रसात्मक-वाक्येन) किम्? धनुष्मतः (धनुर्धरेण) काण्डेन (बाणेन) किं (प्रयोजनम्)?-यत् काव्यं काण्डञ्च परस्य हृदये लग्नं सत्, तस्य शिरः न घूर्णयति? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपाका अनुमान :- तोमार शक्ति बिना जीवेर नहे एइ वाणी। तुमि शक्ति दिया कहाओ,-हेन अनुमानि ॥”196 ॥ अनुवाद-आपकी कृपाके बिना ऐसा कवित्व किसी भी जीवके द्वारा सम्भव नहीं है। मेरा ऐसा अनुमान है कि आप ही शक्ति प्रदान करके रूपके द्वारा यह सब कुछ कहलवा रहे हैं॥”196 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके कवित्वकी प्रशंसा :- प्रभु कहे,-“प्रयागे आमा-सने हइल मिलन। इहार गुणे इहाते आमार तुष्ट हैल मन ॥ 197 ॥

[ 1/197–204 पहला अध्याय 39 अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“प्रयागमें रूपकी मुझसे भेंट हुई थी। इसके गुणोंके कारण मेरा मन इसके प्रति सन्तुष्ट हो गया था॥197॥ मधुर प्रसङ्ग इहार काव्य सालङ्कार। ऐछे कवित्व बिना नहे रसेर प्रचार॥198॥ अनुवाद—रूपके काव्यका प्रसङ्ग अत्यन्त मधुर है और यह समस्त प्रकारके अलङ्कारोंसे विभूषित है। ऐसे कवित्वके बिना रसका प्रचार नहीं हो सकता॥198॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा परमस्नेह-कृपाभाजन श्रीरूपके प्रति भक्तोंकी कृपाकी याचना :– सबे कृपा करि' इँहारे देह' एइ वर। व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे निरन्तर॥199॥ अनुवाद—[महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंसे कहा—] आप सभी कृपा करके इसे यही वर प्रदान करें कि यह निरन्तर व्रजलीला-प्रेमरसका ही वर्णन करे॥199॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी प्रशंसा और वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति-सिद्धान्तरस-पाण्डित्यके विषयमें उन्हें श्रीरायके समान मानना :– इँहार ये ज्येष्ठभ्राता, नाम—‘सनातन’। पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर सम॥200॥ अनुवाद—इसके ज्येष्ठ भ्राता जिनका नाम 'सनातन' है, जगत्में उनके समान सुशिक्षित विद्वान अन्य कोई नहीं है॥200॥ तोमार यैछे विषयत्याग, तैछे ताँर रीति। दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्ये ताँहातेइ स्थिति॥201॥ अनुवाद—जिस प्रकारसे आपने विषयोंका त्याग किया है, उन्होंने भी वैसा ही किया है। दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यकी उनमें ही स्थिति है॥201॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे कहा,— तुम समस्त विषय परित्याग करके जिस प्रकारसे एकान्तिक कृष्णसेवा कर रहे हो, सनातन-गोस्वामी भी ठीक तुम्हारी ही भाँति कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको छोड़कर प्रतिक्षण उसी प्रकार 'तृणादपि सुनीच' अर्थात् निष्किञ्चन भावसे युक्त और कृष्णसे भिन्न भोगोंका वर्जन अर्थात् कृष्णसे भिन्न विषयोंके बन्धनसे मुक्त होकर, कृष्णसेवारूपी विषय ग्रहण करके पराभक्तिकी विद्यामें पारङ्गत हैं। निष्कपट दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यके आदर्श विग्रह सनातन शुद्ध अर्थात् युक्त-वैराग्य और प्रेमभक्तिसिद्धान्त-रस-पाण्डित्य आदिमें ठीक तुम्हारी ही भाँति कुशल और पारदर्शी हैं॥201॥ श्रीरूप-सनातनमें शक्ति सञ्चार करके व्रजमें भेजनेका वर्णन :– एइ दुइ भाइये आमि पाठाइलूँ वृन्दावने। शक्ति दिया भक्तिशास्त्र करिते प्रवर्त्तने॥”202॥ अनुवाद—मैंने इन दोनों भाइयोंको शक्ति प्रदान करके भक्ति शास्त्रका प्रवर्त्तन करनेके लिये वृन्दावन भेजा था॥”202॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुको प्रयोजक-कर्त्ता मानकर उनकी स्तुति :– राय कहे,—“ईश्वर तुमि ये चाह करिते। काठेर पुतली तुमि पार नाचाइते॥203॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप ईश्वर हैं जो चाहे कर सकते हैं। आप तो काठकी पुतली तकको भी नचा सकते हैं॥203॥ श्रीरायके कीर्तनमें और श्रीरूपके लिखनेमें एक ही प्रेम-भक्तिरसका प्रचार :– मोर मुखे ये-सब रस करिला प्रचारणे। सेइ रस देखि एइ इहार लिखने॥204॥ अनुवाद—आपने मेरे मुखसे जिस रसको प्रकाशित कराया था, वही रस मैं इसकी (रूपकी) लेखनीमें देख रहा हूँ॥204॥

40 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/205-213 ] महाप्रभु अपनी इच्छाके द्वारा चालित भक्तके द्वारा अप्राकृत व्रजरसके माहात्म्यका प्रचार करनेवाले :- भक्ते कृपा-हेतु प्रकाशिते चाह व्रज-रस। यारे कराओ, सेइ करिबे जगत् तोमार वश॥"205॥ अनुवाद-भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही आप व्रज-रसको प्रकाशित करवाना चाहते हैं। आप जिसके द्वारा करवायेंगे, वही करेगा, क्योंकि समस्त जगत् ही आपके वशमें है॥"205॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन, श्रीरूपके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :- तबे महाप्रभु कैला रूपे आलिङ्गन। ताँरे कराइला सबार चरण-वन्दन॥206॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया और उन्होंने श्रीरूपसे सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना करवायी॥206॥ श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन :- अद्वैत-नित्यानन्दादि सब भक्तगण। कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥207॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द आदि सभी भक्तोंने श्रीरूपको आलिङ्गन करके उनके ऊपर कृपाका वर्षण किया॥207॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपा और श्रीरूपके कृष्णाकर्षक गुण-दर्शनसे सभीको विस्मय :- प्रभु-कृपा रूपे, आर रूपेर सद्गुण। देखि' चमत्कार हैल सबाकार मन॥208॥ अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीरूपके प्रति कृपा तथा श्रीरूपके सद्गुण-इन्हें देखकर सभी भक्तोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥208॥ श्रीरूपका ठाकुर-श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :- तबे महाप्रभु सब भक्त लञा गेला। हरिदास-ठाकुर रूपे आलिङ्गन कैला॥209॥ अनुवाद-तब महाप्रभु अपने समस्त भक्तोंको अपने साथ लेकर चले गये। श्रीहरिदास ठाकुरने भी श्रीरूपको आलिङ्गन किया॥209॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीरूपके सौभाग्यकी प्रशंसा :- हरिदास कहे,-"तोमार भाग्येरे नाहि सीमा। ये-सब वर्णिला, इहार के जाने महिमा?"210॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,-"तुम्हारे सौभाग्यकी सीमा नहीं है। तुमने जो सब वर्णन किया है, उसकी महिमाको कौन जान सकता है?"210॥ श्रीरूपके द्वारा दैन्यज्ञापन, स्वयंको यन्त्री-महाप्रभुका यन्त्र मानना :- श्रीरूप कहेन,-"आमि किछुइ ना जानि। येइ महाप्रभु कहान, सेइ कहि वाणी॥"211॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने कहा,-"मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ। महाप्रभु मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं वही कहता हूँ॥"211॥ भःरःसिः (1/1/2) में- हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि। तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य॥212॥ अनुवाद-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥212॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 19/134 संख्या देखें॥212॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासका कृष्णकथा-आलाप :- एइमत दुइजन कृष्णकथारङ्गे। सुखे काल गोङाय रूप हरिदास-सङ्गे॥213॥

[ 1/213-222 पहला अध्याय 41 अनुवाद—इस प्रकार दोनों कृष्णकथाके आनन्दमें निमग्न हो रहे थे। श्रीरूपने श्रीहरिदासके साथ सुखपूर्वक समयको व्यतीत किया ॥ 213 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़से आये भक्तोंका गौड़में लौटना :— चारि मास रहि' सब प्रभुर भक्तगण। गोसाञि विदाय दिला, गौड़े करिला गमन ॥ 214 ॥ अनुवाद—गौड़देशसे आये महाप्रभुके भक्त चार मास तक जगन्नाथपुरीमें रहे। तब महाप्रभुने उन्हें विदायी दी और वे सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 214 ॥ दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंमें अवस्थान :— श्रीरूप प्रभुपदे नीलाद्रि रहिला। दोलयात्रा प्रभुसङ्गे आनन्दे देखिला ॥ 215 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंमें नीलाद्रिमें (श्रीजगन्नाथ पुरीमें) ही रहे और उन्होंने आनन्दपूर्वक महाप्रभुके साथ दोलयात्राके दर्शन किये ॥ 215 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपमें शक्तिसञ्चार :— दोलयात्रा रहि' प्रभु रूपे आज्ञा दिला। अनेक प्रसाद करि' शक्ति सञ्चारिला ॥ 216 ॥ वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनको पुरी भेजनेकी आज्ञा :— “वृन्दावने याह' तुमि, रहिह वृन्दावने। एकबार इँहा पाठाइह सनातने ॥ 217 ॥ वृन्दावनमें चार प्रकारकी सेवाका कार्यभार प्रदान— (1) भक्तिरसशास्त्रकी रचना, (2) लुप्ततीर्थोंका उद्धार, (3) श्रीविग्रह और मन्दिरमें सेवाका संस्थापन और (4) अप्राकृत-भक्ति-रसप्रचार :— व्रजे याइ' रसशास्त्र करिह निरूपण। लुप्त-तीर्थ सब ताँहा करिह प्रचारण ॥ 218 ॥ कृष्णसेवा, रसभक्ति करिह प्रचार। आमिह देखिते ताहा याइमु एकबार ॥ "219 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दोलयात्राके समाप्त हो जानेपर श्रीरूपपर अनेक प्रकारसे कृपा करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया और उन्हें आज्ञा दी,—“तुम वृन्दावनमें जाओ और वृन्दावनमें ही रहना। सनातनको एकबार यहाँ जगन्नाथपुरीमें भेजना। व्रजमें जाकर रसशास्त्रोंका निरूपण करना। वहाँके समस्त लुप्त-तीर्थोंको प्रकाशित करना। कृष्णविग्रह-सेवा और रसभक्तिका प्रचार करना। मैं भी एकबार वृन्दावनका दर्शन करने जाऊँगा ॥ ”216-219 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुका पुनः वृन्दावन गमन नहीं सुना जाता ॥ 219 ॥ पहले अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका आलिङ्गन, श्रीरूपका प्रणाम :— एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। रूप-गोसाञि शिरे धरे प्रभुर चरण ॥ 220 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया। श्रीरूप गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण किया ॥ 220 ॥ गौड़देशसे होते हुए श्रीरूपका व्रजमें आगमन :— प्रभुर भक्तगण-पाशे विदाय लइया। पुनरपि गौड़पथे वृन्दावने आइला ॥ 221 ॥ अनुवाद—श्रीरूपने महाप्रभुके समस्त भक्तोंसे विदायी ली और पुनः गौड़देशसे होते हुए वृन्दावन आ गये ॥ 221 ॥ महाप्रभु-रूप-मिलन-संवादके श्रवणसे अचैतन्य जीवको श्रीचैतन्य-चरणकमलोंकी प्राप्ति :— एइ त' कहिलाङ पुनः रूपेर मिलन। इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 222 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके साथ श्रीरूपके पुनः

42 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/222-223 ] मिलनका वर्णन किया। जो कोई भी इस प्रसङ्गका अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका प्राप्ति होती है॥ 222 ॥ वर्णन कर रहा है॥ 223 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 223 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सवो श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सव नाम प्रथमः परिच्छेदः। नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त।

दूसरा अध्याय


[बायाँ स्तम्भ]

**कथासार—**महाप्रभुका साक्षात्-दर्शन, आवेश और आविर्भाव जिस-जिस स्थानपर हुआ था, उसका विवरण बतलाते हुए ग्रन्थकारने नकुल ब्रह्मचारीकी कथा, नृसिंहानन्दकी महिमा तथा अन्यान्य भक्तोंकी कथाको लिखा है। भगवान्-आचार्यकी महाप्रभुके प्रति निष्ठा होनेपर भी श्रील स्वरूप-दामोदरने भगवान्के भाई गोपाल-भट्टाचार्यके मुखसे मायावादभाष्यको सुननेके लिये उन्हें निषेध किया। उसके बाद छोटे-हरिदासके द्वारा भगवान्-आचार्यकी आज्ञासे माधवी देवीके पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेपर महाप्रभुने उन्हें वैरागीके स्त्रीसे वार्तालापके दोषके कारण (अपने वासस्थानके द्वारमें प्रवेश करनेके लिये) निषेध किया और वैष्णवोंके अनुरोध करनेपर भी उन्हें पुनः ग्रहण नहीं किया। एक वर्षके बाद छोटे-हरिदासने प्रयाग-त्रिवेणीमें डूबकर प्राण त्याग करनेके बाद अप्राकृत देहसे महाप्रभुको गान सुनाया। गौड़ीय वैष्णवोंके द्वारा आकर इस संवादको कहनेपर श्रीस्वरूपादि सभी इससे अवगत हुए। —(अमृतप्रवाह भाष्य)

छह रूपोंमें विलास करनेवाले आवरण (पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्य-महाप्रभुको और सेवारत प्रेष्ठ सखियोंसे परिवेष्टित श्रीराधाकृष्णको प्रणाम :— वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च॥1॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मैं श्रीगुरुके चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं, समस्त वैष्णवों, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन


[दायाँ स्तम्भ]

गोस्वामी, गणोंसहित श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव, गणोंसहित श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अहं श्रीगुरोः (मन्त्रदीक्षागुरोः भजनशिक्षागुरोः वा) श्रीयुतपदकमलं (श्रीमच्चरणसरोजं) श्रीगुरून् (परम्परात्पर-प्रभृति-गुरुगणान् श्रीमदानन्दतीर्थ-श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी-प्रमुख गुरुवर्गान्) वैष्णवान् (चतुर्युगोद्भूतान् भागवतान्) च; साग्रजातं (अग्रेजेन श्रीमता गोस्वामिना सनातनेन सह वर्तमान), सहगणरघुनाथान्वितं (स्वभक्तैः सह रूपानुगेन श्रीरघुनाथेन दास-गोस्वामिना च सह सहितं) सजीवं (निजानुकम्पितेन रूपानुगेन श्रीजीवगोस्वामिना सह विद्यमानं) तं श्रीरूपं, साद्वैतं (अद्वैतप्रभुसहितं) सावधूतं (नित्यानन्दप्रभूसमन्वितं) परिजनसहितं (सावरण-पार्षदं) कृष्णचैतन्यदेवं (महाप्रभुं); सहगणललिता-श्रीविशाखान्वितान् (गणेन सखिमञ्जरीभिः सह वर्त्तमानाभ्यां ललिताविशाखाभ्याम् अन्वितान् युक्तान्) श्रीराधाकृष्णपादान् च वन्दे। **श्लोक-भावानुवाद—**मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं) के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परात्पर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता- विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥1॥

जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥

44 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/2-10 ] अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ २॥ तीन प्रकारसे महाप्रभुके द्वारा जीवोंका उद्धार :- सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार। निस्तारेर हेतु तांर त्रिविध प्रकार॥ ३॥ अनुवाद—सभी लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही श्रीगौर-अवतार हुआ है। उन्होंने उनका उद्धार तीन प्रकारसे किया॥ ३॥ (1) साक्षात्-दर्शन, (2) योग्य जीवमें आवेश और (3) आविर्भाव :- साक्षात्-दर्शन, आर योग्यभक्त-जीवे। ‘आवेश’ करये काँहा हञा ‘आविर्भावे’ ॥ 4 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहीं साक्षात्-दर्शन देकर जीवोंका उद्धार किया। कहीं योग्यभक्त-जीवमें ‘आवेश’रूपसे और कहीं ‘आविर्भाव’रूपसे जीवोंका उद्धार किया॥ 4॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने जीवोंको साक्षात् दर्शन देकर, किसी योग्यभक्त-जीवमें आविष्ट होकर और किसी भक्तजीवके समक्ष आविर्भूत होकर जीवोंका उद्धार किया ॥ 3-4 ॥ तीन प्रकारके प्राकट्यका वर्णन :- ‘साक्षात्-दर्शने’ प्राय सब निस्तारिला। नकुल-ब्रह्मचारीर देहे ‘आविष्ट’ हइला॥ 5 ॥ ईश्वरका स्वभाव :- प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला ‘आविर्भाव’। ‘लोक निस्तारिब’,—एइ ईश्वर-स्वभाव॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने प्रायः सभीका तो साक्षात्-दर्शन देकर ही उद्धार किया था। एक बार महाप्रभुने श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर उनके देहके विकारोंको देखनेके लिये आये गौड़भक्तोंका उद्धार किया था। महाप्रभु श्रीप्रद्युम्नके (श्रीनृसिंहानन्दके) समक्ष स्वयं आविर्भूत हुए और उन्होंने अनेक लोगोंका उद्धार किया। ईश्वरका स्वभाव ही जीवोंका उद्धार करना है॥ 5-6॥ अनुभाष्य—‘साक्षात् दर्शन’ प्रदान करके, नकुल- ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर और प्रद्युम्न अथवा नृसिंहानन्द-ब्रह्मचारीके सम्मुख ‘आविर्भूत’ होकर महाप्रभुने लोगोंका उद्धार किया। (1) श्रीशचीके गृहमन्दिरमें, (2) श्रीनित्यानन्द प्रभुके नर्त्तनस्थलपर, (3) श्रीवास-अङ्गनमें कीर्त्तनस्थलपर एवं (4) श्रीराघवके भवनमें,—इन चार स्थानोंपर महाप्रभु नित्य ‘आविर्भाव’ प्रकटित करते थे (इसी अध्यायकी 34 संख्या देखें)॥ 5-6॥ तीन प्रकारके प्राकट्योंके फलका वर्णन; महाप्रभुके ‘साक्षात्-दर्शन’का फल :- साक्षात्-दर्शने सब जगत् तारिला। एकबार ये देखिला, से कृतार्थ हइला॥ 7 ॥ अनुवाद—साक्षात्-दर्शन देकर महाप्रभुने समस्त जगत्का उद्धार किया। एकबार भी जिसने उनका दर्शन किया, वह कृतार्थ हो गया॥ 7॥ गौड़-देशेर भक्तगण प्रत्यब्द आसिया। पुनः गौड़देशे याय प्रभुरे मिलिया॥ 8 ॥ अनुवाद—गौड़-देशके भक्तगण प्रत्येक वर्ष नीलाचल आते थे। महाप्रभुसे मिलकर वे पुनः गौड़देशमें लौट जाते थे॥ 8॥ आर नाना-देशेर लोक देखि’ जगन्नाथ। चैतन्य-चरण देखि’ हइल कृतार्थ॥ 9 ॥ अनुवाद—अन्य देशोंके लोग भी श्रीजगन्नाथके दर्शन करने आते थे और पुरीमें आकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका दर्शन करके कृतार्थ हो जाते थे॥ 9॥ सप्तद्वीपेर लोक आर नवखण्डवासी। देव, गन्धर्व, किन्नर—मनुष्य-वेशे आसि’ ॥ 10 ॥