श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2050, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/169-174 पहला अध्याय 33 ] (दूरीकरोति), आङ्गिकरुचिः (देहकान्तिः) अष्टापदं (सुवर्णम्) अपि कष्टां (क्लेशसमन्वितां) दशां नयति, [अतएव] राधायाः रूपं किल किमपि विचित्रं विलसति (स्फुरति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥169॥ विदग्धमाधव (5/20)में मधुमङ्गलके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति— विधुरेति दिवा विरूपतां शतपत्रं बत शर्वरीमुखे। इति केन सदाश्रियोज्ज्वलं तुलनामर्हति मत्प्रियाननम्॥170॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चन्द्रकी शोभा रात्रिमें सुन्दर होनेपर भी दिनके समय विरूपताको प्राप्त होती है, कमल दिनके समय सुन्दर होनेपर भी रात्रिमें मलिन (बन्द) हो जाता है, किन्तु हे सखे, मेरी प्रियतमा राधिकाका मुख दिन-रात सर्वदा शोभासे उज्ज्वल रहता है, इसलिये किसके साथ उसकी तुलना हो सकती है?170॥ अनुभाष्य— विधुः (चन्द्रः) दिवा (दिवसे), शतपत्रं (पद्मं) शर्वरीमुखे (सन्ध्यायां) बत विरूपतां (कान्तिराहित्यम्) एति (प्राप्नोति) इति सदा (दिवारात्रे सर्वदा) श्रिया (शोभया) उज्ज्वलं मत्प्रियाननं (श्रीराधिकामुखं) केन (उपमानेन सह) तुलनाम् अर्हति? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ विदग्धमाधव (2/51)में श्रीकृष्णकी स्वयंसे उक्ति— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलता-लास्यभाजः। मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं दधानो हृदयमिदमदाङ्क्षीत् पक्ष्मलक्ष्याः कटाक्षः॥171॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मन्द-मन्द हास्ययुक्त कपोल आनन्दकी तरङ्गोंसे युक्त हैं, जिनकी भ्रू-लता प्रमत्त-चञ्चला-भ्रमरीकी भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली भङ्गीको धारण करके कामदेवके धनुषकी भाँति नृत्य कर रही है, उनके नेत्रोंकी पलकोंसे निकले कटाक्षने मेरे हृदयको दंशन कर दिया है॥171॥ अनुभाष्य— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः (प्रमदरसतरङ्गेण आनन्द- रसप्रवाहेण स्मेरगण्डस्थलं स्मेरं मन्दहासान्वितं गण्डस्थलं यस्याः तस्याः) स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलतालास्यभाजः (कामदेवकार्मुकसदृशा या भ्रूलता, तादृशाः लास्यं नर्तनं भजति या तस्याः) पक्ष्मलक्ष्याः (पक्ष्मले प्रशस्तपक्षान्विते अक्षिणी यस्याः तस्याः राधायाः) मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं (मदेन यः कलः, तेन चला चञ्चला चपला या भृङ्गी तस्याः भ्रान्तिः भ्रमः यतः तादृशीं भङ्गीं) दधानः [राधायाः] कटाक्षः इदं [मम] हृदयं अदाङ्क्षीत् (दष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ श्रीरूपसे ललितमाधवके नान्दी-पाठका अनुरोध :— राय कहे,—“तोमार कवित्व अमृतेर धार। द्वितीय नाटकेर कह नान्दी-व्यवहार॥”172॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“हे रूप! तुम्हारा कवित्व तो अमृतकी धाराके समान है। अब तुम अपने द्वितीय (ललितमाधव) नाटकका नान्दी श्लोक पढ़ो॥”172॥ अनुभाष्य—'द्वितीय नाटकेर',—ललितमाधव नाटकका; यहाँसे श्रीरामानन्द श्रीरूपके द्वारा रचित श्रीललितमाधवके विषयकी जिज्ञासा कर रहे हैं॥172॥ श्रीरायके माहात्म्यकी तुलनाके द्वारा श्रीरूपका अपना दैन्य ज्ञापन :— रूप कहे,—“काँहा तुमि सूर्योपम भास। मुञि कोन् क्षुद्र,—येन खद्योत-प्रकाश॥173॥ तोमार आगे धाष्टर्य एइ मुख-व्यादान।” एत बलि' नान्दी-श्लोक करिला व्याख्यान॥174॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने कहा,—“कहाँ तो आप सूर्यके समान प्रकाशमान और कहाँ मैं जुगनुके समान