भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2051

34 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/173-179 ] अत्यन्त क्षुद्र हूँ। आपके समक्ष अपना मुख खोलना मेरी धृष्टता ही है।" यह कहकर उन्होंने ललितमाधवका नान्दी-श्लोक पढ़ा ॥ 173-174 ॥ मङ्गलाचरण-श्लोकमें असुरमर्दन सुरनन्दन मुकुन्दके यशका स्तव :- ललितमाधव (1/1)में- सुररिपुसुदृशामुरोजकोकान्मुखकमलानि च खेदयन्नखण्डः। चिरमखिलसुहृच्चकोरनन्दी दिशतु मुकुन्दयशःशशी मुदं वः ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुररिपु (नरक आदि असुरों) की पत्नियोंके स्तनरूपी चक्रवाक और मुखरूपी कमलसमूहको खिन्न अर्थात् दुःखग्रस्त करके मुकुन्दका जो अखण्ड यशरूपी चन्द्र अपने अखिल सुहृद्रूपी चकोरोंका निरन्तर आनन्द विधान करता है, वह आपका सुख विधान करे ॥ 175 ॥ अनुभाष्य- सुररिपुसुदृशां (नरकाद्यसुराङ्गनानाम्) उरोजकोकान् (उरोजाः एव कोकाः चक्रवाकाः तान् स्तनरूपचक्रवाकान्) मुखकमलानि (मुखानि एव कमलानि) च खेदयन् अखिलसुहृच्चकोरनन्दी (अखिलाः सुहृदः एव चकोराः तान् नन्दयितुं शीलं यस्य सः) अखण्डः (परिपूर्णः) मुकुन्दयशःशशी (मुकुन्दस्य यशः एव शशी चन्द्रः) वः (युष्माकं) मुदं (सुखं) चिरं दिशतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्रीरायके द्वारा श्रीरूपको स्वाभीष्टदेवके वर्णन करनेका अनुरोध, श्रीरूपकी लज्जा :- 'द्वितीय नान्दी कह देखि ?' - राय पुछिला। सङ्कोच पाञा रूप पड़िते लागिला ॥ 176 ॥ अनुवाद - श्रीरायरामानन्दने पूछा,-'हे रूप! तुमने द्वितीय नान्दी-श्लोकमें क्या लिखा है, उसका पाठ करो।" श्रीरूप कुछ सङ्कोच करते हुए श्लोक पढ़ने लगे॥ 176 ॥ स्वाभीष्ट-देवता श्रीकृष्णचैतन्यके आशीर्वादकी याचना :- ललितमाधव (1/3)में सूत्रधारका अपने इष्टदेवको प्रणाम- निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् यः क्षितौ किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः । स लुञ्चित-तमस्ततिर्मम शचीसुताख्यः शशी वशीकृतजगन्मनाः किमपि शर्म विन्यस्यतु ॥ 177 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो पृथ्वीतलपर उदित होकर अपने प्रणयरसकी सुधाका विस्तार कर रहे हैं, उन द्विजकुलके अधिराजरूपमें अवस्थितिको अङ्गीकार करनेवाले, अन्धकारके [अज्ञान और छलके] समूहको दूर करनेवाले, जगत्वासियोंके मनको वशीभूत करनेवाले शचीनन्दनके नामसे प्रसिद्ध चन्द्र मेरा मङ्गल विधान करें ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- यः क्षितौ (पृथिव्याम्) उदयं (प्राकट्यं) आप्नुवन् सन् निजप्रणयितां सुधां (स्वप्रेमामृतम्) अलम् (अतिशयेन) किरति (विस्तारयति), उरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः (उरीकृता अङ्गीकृता द्विजकुलस्य अधिराजः तस्य स्थितिः साम्राज्यमर्यादा येन सः) लुञ्चित-तमस्ततिः (लुञ्चिता ताड़िता तमस्ततिः अज्ञानकैतवपुञ्जः येन सः) वशीकृत-जगन्मनाः (वशीकृतानि जगतां मनांसि येन सः) शचीसुताख्यः (शचीनन्दन नामा) शशी (चन्द्रः) मम किमपि शर्म (कल्याणं) विन्यस्यतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ महाप्रभुके भीतरमें सन्तोष, बाहरमें रोषाभास :- शुनिया प्रभुर यदि अन्तरे उल्लास। बाहिरे कहेन किछु करि' रोषाभास ॥ 178 ॥ "काँहा तोमार कृष्णरसवाक्य-सुधासिन्धु। ता'र मध्ये मिथ्या केने स्तुति-क्षारबिन्दु ॥" 179 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको श्रवण करके महाप्रभुके भीतरमें तो उल्लास होनेपर भी वे बाहरसे कुछ रोषाभास दिखाते हुए कहने लगे,- "कहाँ तो तुम्हारे