भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2052

[ 1/178-184 पहला अध्याय 35

कृष्णरस-वाक्य अमृत-सिन्धुके समान हैं, तब क्यों तुमने उसमें मेरी मिथ्या स्तुतिरूपी (कटु) क्षार-बिन्दुको मिला दिया है?”178-179 ॥ श्रीरायके द्वारा श्लोककी प्रशंसा— राय कहे,—“रूपेर काव्य अमृतेर पूर। ता'र मध्ये एक बिन्दु दियाछे कर्पूर॥”180॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“रूपका काव्य अमृतका सार है, उसने तो उसमें एक बिन्दु कर्पूरको मिला दिया है॥”180॥ प्रभु कहे,—“राय, तोमार इहाते उल्लास। शुनितेइ लज्जा, लोके करे उपहास॥”181॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे राय ! इस कवित्वको सुनकर आपको तो उल्लास हो रहा है, किन्तु मुझे तो इसे सुनते ही लज्जा आ रही है, क्योंकि इसे सुनकर लोग उपहास करेंगे॥”181॥ राय कहे,—“लोकेर सुख इहार श्रवणे। अभीष्टदेवेर स्मृति मङ्गलाचरणे॥”182॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“लोग उपहास नहीं करेंगे, अपितु अभीष्टदेवकी स्मृति करवानेवाले इस मङ्गलाचरणको सुनकर लोग प्रसन्न ही होंगे॥”182॥ श्रीरायके द्वारा ललितमाधवके विविध अङ्गों और परिचयकी जिज्ञासा, श्रीरूपके द्वारा नाटकमें लिखित श्लोकका पाठ करके उत्तर देना :— राय कहे,—“कोन् अङ्गे पात्रेर प्रवेश?” तबे रूप-गोसाञि कहे ताहार विशेष॥ 183 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने श्रीरूपसे पूछा,—“प्रस्तावनाके किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है?” तब श्रीरूप गोस्वामी उस विषयका वर्णन करने लगे॥ 183 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 1/134 वीं संख्या और उसका अनुभाष्य देखें। किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है,—'उद्घात्यक', 'कथोद्घात', 'प्रयोगातिशय', 'प्रवर्त्तक' और 'अवलगित'—ये पाँच प्रकारकी प्रस्तावना हैं; एवं भारती-वृत्तिकी 'प्ररोचना', 'वीथी' और 'प्रहसना'—ये तीन प्रकारके अङ्ग हैं। श्रीरामानन्द श्रीरूपसे जिज्ञासा कर रहे हैं,—तुमने स्वरचित नाटकमें उक्त पाँच प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें-से किस प्रकारकी प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके किस अङ्गको स्वीकार करके अभिनेता रूपी पात्रको रङ्गमञ्चमें प्रवेश करवाया है?183॥ ललितमाधव (1/11)में नटीके प्रति सूत्रधारकी उक्ति— “नटता किरातराजं निहत्य रङ्गस्थले कलानिधिना। समये तेन विधेयं गुणवति ताराकरग्रहणम्॥ 184 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नृत्य करते-करते रङ्गमञ्चपर किरातराज (कंसका) वध करके कलानिधिके (कृष्णचन्द्रके) द्वारा 'पूर्णमनोरथ'-नामक गुणयुक्त समयमें ताराका (श्रीराधाका) पाणिग्रहण-कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥ अनुभाष्य— नटता (अभिनयं कुर्वता) तेन कलानिधिना (तन्नाम्ना नटेन) रङ्गस्थले (अभिनय-क्षेत्रे) किरातराजं (किरातदेशाधिपं) निहत्य गुणवति (अनुकूल-नक्षत्राधिष्ठिते) समये ताराकरग्रहणं (तन्नाम्न्याः कन्यायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्; पक्षान्तरे,—रङ्गस्थले (रङ्गक्षेत्रे) तेन [चतुःषष्ठि-] कलानिधिना (श्रीकृष्णेन) किरातराजं (कंसं) निहत्य (हत्वा) गुणवति (दशमाङ्गाख्ये पूर्णमनोरथनाम्नि) समये ताराकरग्रहणं (श्रीराधिकायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पक्षान्तरमें-रङ्गमञ्चपर चौंसठ कलाओंके निधिस्वरूप (श्रीकृष्णचन्द्र) के द्वारा किरातराजका (कंसका) वध करनेके पश्चात् [नाटक-ग्रन्थके अन्तमें] 'पूर्णमनोरथ' नामक दशम-अङ्क समयमें तारा अर्थात् श्रीराधिकाका पाणिग्रहण कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥