भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2053

36 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/185-188 ] 'उद्घात्यक' नाम एइ 'आमुख'-'वीथी' अङ्ग। तोमार आगे कहि,-इहा धार्ष्ट्येर तरङ्ग॥" 185 ॥ अनुवाद—'उद्घात्यक'-नामक आमुख अर्थात् प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके वीथी नामक अङ्गको स्वीकार करके पात्र रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुआ है। हे श्रीरामानन्द राय! आपके समक्ष ये सब बातें करना मेरी धृष्टताकी तरङ्ग ही है॥ 185 ॥ अनुभाष्य—इस श्लोकमें आमुख अर्थात् प्रस्तावनाका नाम 'उद्घात्यक' एवं भारती वृत्तिके अङ्गका नाम 'वीथी' कहा गया। साहित्यदर्पणके छठे अध्यायकी 520 (253-254) संख्यामें— “वीथ्यामेको भवेद्दङ्कः कश्चिदेकोऽत्र कल्प्यते। आकाशभाषितैरुक्तैश्चित्रां प्रत्युक्तिमाश्रितः॥ सूचयेद्बूरि शृङ्गारं किञ्चिदन्यान् रसानपि। मुखनिर्वहणे सन्धौ अर्थप्रकृतयोऽखिलाः॥” अर्थात् “वीथीमें केवल मात्र एक ही अङ्क है; इस अङ्कमें कोई एक नायक कल्पनापूर्वक आकाशवाणीके द्वारा विचित्र उक्ति-प्रत्युक्तिका आश्रय करके प्रचुररूपमें शृङ्गाररसकी और किञ्चित् रूपमें अन्यान्य रस-समूहकी भी सूचना करता है; एवं उसकी मुखबन्ध और सन्धिमें समस्त अर्थप्रकृति अथवा बीज ही प्रयोज्य है।” इस स्थानपर चन्द्रके साथ 'नटता'-शब्दके युक्त होनेसे अर्थ अस्फुट होता है, इसलिये कृष्णके साथ युक्त होनेसे परिस्फुट अर्थका बोध होनेके कारण 'उद्घात्यक' नामक प्रस्तावना हुई एवं कृष्णसम्बन्धी अर्थ मानकर ही पौर्णमासी भी रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुई। श्रीरूप श्रीराम-रायको कह रहे हैं,—आपके जैसे रसशास्त्र-पारदर्शी पण्डित व्यक्तिके सम्मुख मेरी एक-एक उक्ति-मानो धृष्टतारूपी समुद्रकी अर्थात् प्रगल्भता-सागरकी एक-एक लहरके समान है॥ 185 ॥ साहित्यदर्पणमें दृश्य-श्रव्यके निरूपणमें (6/289)[34]— पदानि त्वगताथानि तदर्थगतये नराः। योजयन्ति पदैरन्यैः स उद्घात्यक उच्यते ॥ 186 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्यगण अस्फुट (अनिश्चित) अर्थवाले पदोंके अर्थको समझनेके लिये जब उसे अन्य पदोंके साथ जोड़ते हैं, तो उसे 'उद्घात्यक' कहते हैं॥ 186 ॥ अनुभाष्य— नराः (आलङ्कारिकाः) तु अगताथानि (अप्राप्तार्थानि अबोधिताथानि) पदानि तदर्थगतये (तेषाम् अबोधिताथांनां पदानां गतये अवबोधाय) अन्यैः पदैः यं योजयन्ति, सः 'उद्घात्यकः' उच्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ राय कहे,—“कह आगे अङ्गेर विशेष।” श्रीरूप कहेन किछु संक्षेप-उद्देश ॥ 187 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“अब तुम विदग्धमाधव नाटकके समान ललितमाधव नाटकके भी विशेष अङ्गोंका वर्णन करो।” उनके विषयमें श्रीरूप गोस्वामी कुछ संक्षेपमें बतलाने लगे॥ 187 ॥ अनुभाष्य—'अङ्गेर विशेष',—पूर्ववर्ती (अन्त्यलीला 1/156 संख्यामें वर्णित) पूर्ववत् यथाक्रमसे वृन्दावन, मुरलीनिःस्वन (वंशी-स्वर), कृष्ण और राधिकाका वर्णन॥ 187 ॥ वहाँ वृन्दावन जैसे :— ललितमाधव (1/23)में गार्गीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— हरिमुद्दिशते रजोभरः पुरतः सङ्गमयत्यमुं तमः। व्रजवामदृशां न पद्धतिः, प्रकटा सर्वदृशः श्रुतेरपि ॥ 188 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गायके खुरोंसे उड़ती धूलि हरिके [आने] की सूचना दे रही है; सामने उपस्थित तमः (अन्धकार) गोपियोंके साथ उन्हें मिलवा रहा है; इसलिये गोपवधुओंकी पद्धति सर्वज्ञ श्रुतियोंके लिये भी अगोचर हो गयी है॥ 188 ॥